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अनब्याही माताएं : प्राण उसके साथ हर पल है,यादों में, ख्वाबों में

Bhola Tiwari Feb 17, 2020, 8:04 AM IST टॉप न्यूज़
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सुरेंद्र किशोर

नई दिल्ली  : रेवती और उसके परिवार को अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) कानून किसी तरह की कोई जानकारी है। सनद रहे वनों पर अधिकार से लेकर भूमि के स्वामित्व के मसले पर विमर्श के कई संदर्भ हैं। 

यह सच है कि आदिमकालीन सामाजिक आधिपत्य की अवधारणा बाद में स्वामित्व में बदलती है। ऐसी परिस्थिति में आजादी मिलने के पहले के कालखण्ड में ऐसा माहौल बना जब जमीन पर जमींदारों एवं मालगुजारों के स्वामित्व की अवधारणा सामने आयी। आजादी के बाद व्यक्ति को जमीन पर किसानी करने का जो अधिकार मिला, वैसा अधिकार वनों पर आदिवासियों को नहीं मिला। यानी वनों पर राज्य के स्वामित्व को मजबूती मिलती चली गयी। नतीजतन, आदिवासी अर्थव्यवस्था और उसकी परंपरागत संस्कृति--इन दोनों को खासा नुकसान उठाना पड़ा। न जमीन मिली और न जंगल। जिंदगी के जुगाड़ तो जंगलों से जुड़े थे, जो अब खुद-ब-खुद समाप्ति के कगार पर है। जमीन पर जो पैदावार हुई, उसके प्रति आदिवासी ज्यादा गंभीर नहीं थे। उसे इस बात का मानसिक आघात पहुँचा कि उसके जंगलों पर किसी ने अधिकार कैसे जमाया। तो व्यवस्था की मार मंे आदिवासी और अनुसूचित जाति के लोग जमीन से हाथ धो बैठे। गौंतिया, जो गाँव-प्रधान थे; उनके घरों में गोती बने या कलिमूति के नाम से पुकारे जाते थे, जिनके श्रम को जमींदार या गौंतिया किसानी के लिए खरीदा करता था। कहीं-कहीं अग्रिम रकम देकर श्रमिकों को खास समय के लिए काम करने के लिए बाध्य किया जाता था।

वे प्रथाएँ आज भी हैं; जीवित और बेहद सक्रिय।रेवती के गॉंव में इन प्रथाओं का प्रचलन आज भी है और आज यह इलाका वनाधारित अर्थव्यवस्था के इतिहास, कृषि अर्थव्यवस्था के वर्तमान और नगरीय अर्थव्यवस्था के आकर्षण के परिवेश में जी रहा है। जो मानव समुदाय कुदरत की उदारता पर आश्रित था, जिसे अपने श्रम पर भरपूर भरोसा रहा है; उसे नगरीय सभ्यता का तक्षक भमोड़ने को बेचैन है। सभ्य श्रीमंत इस बात को मानते हैं कि वनों पर आदिवासी समाज का कारगर अधिकार था; कालाहाण्डी में भी। बाद में अपना अधिकार जताये बिना, सरकार ने जंगलों को काटना शुरू किया। इस दोहन की गति इतनी तेज हुई कि पर्यावरणीय संकट पैदा हुआ। पहाड़ नंगे होते चले गये, जमीन बंजर होती चली गयी। इसके बावजूद समृद्ध संसाधनवाले इस प्रदेश की वन्य संपदा आज भी कहीं-कहीं बेहद सघन है। इसे कभी भरपूर संसाधन और खराब प्रबंधनवाला इलाका घोषित किया गया, जहाँ कभी बर्फ और कुहासे का परिवेश होता था, जब अकाल नहीं पड़ते थे। आज जंगलों की कटाई से बालू-धूल और कैक्टस दिखते हैं।


लकड़हाड़ों के मनोनुकूल जंगल टिटलागढ़ में नहीं हैं मतलब आस-पास में जंगल कम झाड़ ज्यादा हैं। ग्रेनाइट पहाड़ों की तलहटी में बसे इस शहर का मिजाज जेठ में इतना गर्म हो जाता है कि सरकार दोपहर में किसी को सड़क पर निकलने की इजाजत नहीं देती। क्योंकि पिछले साल ही यहाँ देश में सबसे अधिक तापमान दर्ज किया गया। अब टिटलागढ़ में ऐसा नहीं रह गया है कि गाँव के आसपास किसी जंगल से लकड़ियाँ चुनीं और लाकर बेची जा सकें। अब तो लकड़हारों की जान साँसत में पड़ गयी है। आसपास जंगल कहीं नजर ही नहीं आते। सुबह जो आदमी जंगल जाता है वह इकट्ठे शाम को ही वापस आ पाता है। जो जल्दी लौट गया वह तो शाम को ही अपनी लकड़ी बेच कर फुरसत पा लेता है, किन्तु जो अँधेरा होने के साथ-साथ या उसके बाद वापस होते हैं, वे दूसरे दिन सुबह ही उसे बेच पाते हैं। फिर सरकारी नुमाइन्दों के उन पर पड़ने वाले दबाव का भय भी उन्हें हमेशा सताता रहता है। कभी लकड़ी उतार कर घर पर रखवा ली जाती है और कभी कुल्हाड़ी छीन कर उनकी पिटाई तक किये जाने की घटना एक आम बात है। 

प्राण रातों-रात टिटलागढ़ छोड़कर जा चुका था। माथे पर लकड़ियों के बोझ से मुक्ति के लिए उसने प्राण से दोस्ती की थी लेकिन दोस्ती इतनी गाढ़ी हुई की माथे का बोझ पेड़ू पर आकर समाज के सामने कई सवाल खड़ा करने लगा। अपने परिवार और समाज के बीच रेवती का रहना और जीना मुश्किल होने लगा। अपमान-निरादर और तिरस्कार की रोटियां आंसुओं में घुलकर ज़िन्दगी को वृथा साबित करने लगीं। कोई उपाय नहीं सूझा। जहाँ भी फ़रियाद लेकर गयी वहां ताना और फटकार ने उसे और भी नीचा कर दिया। हारकर, हताश होकर मायूसी में वह घर में कैद हो गयी। उसने प्राण से कहा था कि 'मन भर जाए तो छोड़कर मत जाना। अभी भी देर नहीं हुई है, छोड़ सकते हो।' लेकिन प्राण ने अपना सब कुछ उसपर न्योछावर करने का स्वांग खेला। उसका यह खेल रेवती की ज़िन्दगी पर भारी साबित हुआ। तभी तो आज लिखने की नौबत आयी है कि रेवती की कहानी छलावों और प्रलोभन की चाशनी में लिपटी दुर्भाग्य की नीम-सरीखी कड़वाहट है जिसकी कल्पना मात्र से मन बजबजा जाता है। सम्बन्ध विच्छेद के चार महीने बाद प्राण का पूरा परिवार सड़क दुर्घटना की भेंट चढ़ गया। अकेला-तनहा और एकाकी होकर रोता-बिलखता वह अपने ममेरे भाई के साथ जाकर रायपुर रहने लगा। अलग होते वक़्त रेवती ने उसे श्राप नहीं दिया, उलाहने नहीं दिए और न ही कुछ अपशब्द कहा।              नारकीय हालात में रेवती एक बच्चे की माँ बन गयी। उसके दुःख-उसकी पीड़ा और वेदना का अंत नहीं। जंजाल हुई ज़िन्दगी में कोई उम्मीद नहीं, आसरा और भरोसा नहीं। विश्वास को उसने बनते देखा और बनकर दरकते देखा। आज एक रेवती की बात मत कीजिये, जैसे बात एक बुई जानी की नहीं, किसी एक लुचना की नहीं है।

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