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अनब्याही माताएं : गीता बिहार नहीं जायेगी

Bhola Tiwari Feb 16, 2020, 8:27 AM IST टॉप न्यूज़
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अमरेंद्र किशोर

नई दिल्ली  : उन दिनों बिहार में भूमि के सवाल पर और मजदूरी करने-नहीं करने के मुद्दे पर सघर्ष तेज़ होता जा रहा था। कहीं नक्सलवाद की आड़ में ज़मीन हथियाने की होड़ मच गयी तो वहीं अपनी ज़मीन बचाते ज़मींदार और भू-स्वामी नींद में बेसुध दलितों पर ताबड़-तोड़ गोलियां बरसा रहे थे और लोगों को घेरकर उनका सामूहिक नरमेध कर रहे थे। कहीं आपस में लाठियां बज रहीं थीं तो कहीं गोलियों के गर्जन-तर्जन का तांडव मचा था। 

इन तमाम घटनाओं के बीच बिहार से मजदूर लगातार बाहर जा रहे थे।एक ओर पंजाब-सूरत की ओर भागते मजदूर और दूसरी ओर ओडिशा और दक्षिण बिहार से आती मजदूरों की खेप के बीच जहानाबाद के अमीनाबाद में साल 1986 में मजदूरी के सवाल पर अपने ढंग का एक अकेला नरसंहार सबका ध्यान अपनी ओर खींचता है। ख़ास तौर से अपराधशास्त्र को नए तरीके से सोचने केलिए बाध्य करता है जब तथाकथित ऊंची जाति के ज़मींदारों ने तीन बीड़ी मजदूरों की हत्या कर दी। हालाँकि मृतकों की संख्या डेढ़ दर्जन से कहीं ज्यादा थी। बाहर से आने वाले मजदूर सहम गए। उसी साल के अंत में नरसंहार के परिप्रेक्ष्य में एक अंतर देखने को मिला जब औरंगाबाद के दरमिआन में तथाकथित पिछड़ी जाति के संपन्न लोगों ने तथाकथित ऊंची जाति के 11 भूपतियों को मौत के घाट उतार दिया। वजह वही पुरानी अदावत थी जिसकी बगावत उन्हीं दिनों हुई जब लालू बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता थे। 

लालू के सामाजिक न्याय के एकमात्र पैरोकार थे जिनके आगे वामपंथी ताकतें दम तोड़ने लगी थीं। ध्यान देने की बात है वामपंथी आंदोलन को बिहार के मध्य भाग में जमीनी स्तर पर जनसमर्थन मिला करता था, वह अब खत्म होने लगा था। लालू प्रसाद के राज में ब्रह्मेश्वर मुखिया ने इसी मौके का जमकर फ़ायदा उठाया। साल 1993-94 के दौरान उसने अपने पूर्व के किसान संगठन (जो उसने वर्ष 1974 के आसपास खड़ा किया था) को रणबीर सेना की संज्ञा दी। व्यापक पैमाने पर उसने मध्य बिहार और विशेषकर भोजपुर के कई इलाकों में दलितों और पिछड़ों को गाजर-मूली की तरह काट डाला। रणबीर सेना द्वारा किए हर ऑपरेशन इसकी नृशंसता की गवाही देते हैं। इस घटना के बाद धान का कटोरा मजदूर बिना सूना पड़ गया। जिनकी ज़मीन थी जो बड़े जोतदार थे उनपर नक्सली संगठनों का कहर बरस रहा था। गीता के दादा-नाना जो कभी भोजपुर आये थे, रणबीर सेना के आतंक से डरकर अपने गाँव में रहकर साग-चकोर खाकर जीना मुनासिब समझा।        

लालू प्रसाद के सामाजिक न्याय से जुडी खबरें राष्ट्रीय अखबारों की सुर्ख़ियों में चमकतीं थीं। हर तरह के अखबारों में हर भाषा के अखबारों में लालू कहीं गायों को चारा खिलाते दिखते थे तो कहीं गाय दुहते हुए, कहीं आम सभा सम्बोधित करते हुए। कहीं खून से लथपथ लाशों की तसवीरें होतीं, मुखपृष्ठ पर सामूहिक नर आखेट की खबरें खोंसी हुई रहतीं थीं। हद तो तब हो गयी जब दरमिआन की घटना की प्रतिक्रिया में अगले साल तथाकथित ऊंची जाति के लोगों ने सत्येंद्र सेना के सहयोग से छोटकी छेछनी गॉंव में पिछड़ी जाति के संपन्न तबके के 11 लोगों को मार दिया। फिर से प्रतिक्रिया होना तय था। इस बार दलेलचक बघुआरा में तथाकथित पिछड़ी जाति के संपन्न लोगों ने तथाकथित ऊंची जाति के 52 लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी। देश दहल गया। बिहार कसाईघर बन गया। 

लालू के मुख्यमंत्री बनने तक जहानाबाद में सक्रिय निजी सेना का खौफ परवान चढ़ा जब नोनही नगवां में 18 दलितों को मारा और दुम्हा में 9 दलित निजी सेना की गोली के शिकार बने तो सामाजिक न्याय की रट लगाते लालू के सामने दलितों की लाशें बिछतीं रहीं और उसकी प्रतिक्रया में सवर्णों की आबादी में असमय होती विधवाओं की आबादी बढ़ने लगी। लालू सामाजिक समीकरण संतुलित करने में व्यस्त थे। 

इस प्रकार समय के साथ देखते-देखते नक्सलवादी घटनाओं ने लगभग पूरे बिहार को अपने चपेट में ले लिया जिसने दलितों और पिछड़ों के हिंसक आंदोलन को गति प्रदान कर दी। जब औरंगाबाद और रोहतास के बड़े किसानों ने मजदूरों की कमी के चलते फसल काटने वाली मशीन खरीदकर किसानी को जारी रखने का फैसला किया तो नक्सलियों ने उनकी मशीनों को आग के हवाले कर दिया। नक्सली मजदूरों की वापसी चाहते थे, जो मजदूर अपने टोला-टप्पर छोड़कर पंजाब और सूरत में बेहतर ज़िन्दगी जी रहे थे। कोई भला बिहार क्यों आता ?   

अब उन परिस्थितियों पर गौर करें तो बात साफ़ होगी कि आखिर में ऐसी कौन सी परिस्थिति थी जिससे ओडिशा की गीता को बिहार आना पड़ा।

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