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सत्ता पर दबदबा रखनेवाले जूना पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर से लेकर तमाम शंकराचार्यों की जमात कहां हैं?

Bhola Tiwari Feb 15, 2020, 11:56 AM IST टॉप न्यूज़
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अमरेंद्र किशोर

नई दिल्ली  : ओडिशा में गरीबों के नाम की तीन दर्जन से कहीं अधिक राहत कार्यक्रम की दुकानदारियाँ दशकों से चल रहीं हैं मगर अनब्याही मां बुई जानी उस लोकतंत्र की परिधि में शामिल भारत की वैसी नागरिक नहीं है जो सरकारी सुविधाओं से पलकर अपने पलों को खुशनुमा कर पाती क्योंकि बुई विधवा नहीं है, परित्यक्ता नहीं है। वह सरकार द्वारा तय किसी भी दर्जे की स्त्री नहीं है। न सरकार ने और न समाज ने उसका दर्जा तय किया। 

भले ही कथासरित्सागर और उसके पहले बौद्ध साहित्य में ढेरों अनब्याही माताओं का प्रसंग पढ़ने को मिलता है मगर सरकार की नजरों में अनब्याही माँ होना कोई समस्या नहीं है। लेकिन 'बुद्धयायन धर्मसूत्र' और उसके आगे इतिहास और पुराण की उन तमाम स्त्रियों की अनदेखी कर किसी कल्याण या उद्धार योजना से दूर किया जाना क्या उचित है ? आज की ऐसी स्त्रियां जो महाभारत और उसके पहले भगवान् श्रीराम के जमाने की हैं, वे अपने गुनाहों' का हिसाब माँग रहीं हैं। 

कमाल की बात है कि एक ओर सत्ता की नपुंसक विवशता है और दूसरी ओर गैर-आदिवासी समाज जो हिन्दू मन-मानस है उसने बेटियों की निश्चित उम्र में शादी किये जाने के अलार्म लगा दिए ताकि कन्या का पिता शादी की बात भूल न जाए-- उस बात पर आज का लोकमानस और उसके मत निर्माता खामोश क्यों हैं। केंद्र की सत्ता पर दबदबा रखनेवाले जूना पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर से लेकर तमाम शंकराचार्यों की जमात भी अनब्याही माताओं के मुद्दे पर चुप है। यह किस प्रकार की चालाकी है कि अपनी संस्कृति और उसके साहित्य की दुहाइयाँ देता हिन्दू लोकमानस इस माइलस्टोन को क्यों नहीं याद करता कि आठ वर्ष की बालिका गौरी, नौ वर्ष की बालिका रोहिणी, दस साल की बालिका को न्या और बारह साल की बेटी को रजस्वला कहता समाज अपनी कुल वधुओं और कन्यायों की शील-शुचिता को लेकर इतना सतर्क तथा संवेदनशील है लेकिन राष्ट्र की तथाकथित मुख्यधारा से इतर समाज की स्त्रियों की दुर्दशा पर मौन साधक बन चुका है । यह ऐसा देश है कि कहाँ तो किसी भी कुल की कन्या को गर्भवती किये जाने से समर्थ मर्द नहीं चूकते और दूसरी ओर अपनी बेटियों को रजस्वला होने से पहले ब्याहने की ताकीद भी करते हैं।  

बेटी को बुई जानी बनने से रोकने के सख्त प्रावधान पर नजर डालिये—‘विष्णुपुराण’ नसीहत देता है कि गौरी के कन्यादान से बैकुंठ मिलता है तो रोहिणी के कन्यादान से ब्रह्मलोक हासिल होता है। लेकिन रजस्वला के कन्यादान से नरकभोग होता है। आज अपने समाज को इन तमाम गंदगियों से अलग कर जैसे नियम-विधान बनाये गए हैं वहाँ किसी बिटिया के बुई जानी बनने की गुंजाइश नहीं बनती। हिन्दू समाज ने इतिहास से और पौराणिक आख्यानों से सबक लिया है-- वह नहीं भूलता सोम के पुत्र बुध की नादानी-- आश्रम के निकट घूमती कुमारी इला पर अनुरक्त होकर उसने सम्भोग किया था। इस सम्बन्ध से पुरुरवा पैदा हुए। 

कहने का मतलब हर युग में बुध हैं और उनके साथ इला है। जब ये दोनों पात्र हैं तो पुरुरवा भी पैदा होगा। इसलिए बुई की घटना को गंभीरता से लेने का कोई मतलब नहीं है। मगर 'उपयोग' में आयी ऐसी कन्याएं औरत बनकर हमसे, हमारी सभ्यता से सवाल पूछ रहीं हैं।               

 हिंदुत्व के ताबेदारों को इन पुराणकालीन और वर्तमान की बुई जानी जैसी सभी स्त्रियों के मौलिक प्रश्नों पर ध्यान देना होगा क्योंकि उन स्त्रियों को अब जवाब चाहिए। मिलेगा कभी? तमाम शंकराचार्यों, हिन्दू अस्मिता के सुदर्शनमुखी जूना पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर से लेकर तमाम शंकराचार्यों की जमात व आध्यात्मिक जगत के अद्वितीय गुरुओं और जगह-जगह धार्मिक और सामाजिक सुधार आंदोलन के बिगुल फूंकते धर्मनाचार्यों से किसी तरह की उम्मीद की जाए या अयोध्या के राम मंदिर के निर्माण को तमाम समस्याओं का निवारण समझा जाए ?

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