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यही प्रथा विदेशों में भी....

Bhola Tiwari Feb 15, 2020, 8:11 AM IST टॉप न्यूज़
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डॉ प्रवीण झा

(जाने वाले चिकित्सक नार्वे)

मेरे शहर में लगभग सौ-डेढ़ सौ भारतीय इंजीनियर होंगे। उनमें कई आते-जाते रहते हैं। यहाँ की कंपनियाँ उनमें से कुछ को स्थायी नौकरी देना चाहती है, पर वे लेना नहीं चाहते। सीधी बात है कि कॉन्ट्रैक्ट में रकम अधिक मिलती है। बाकी सुविधाएँ और स्थायित्व उनको चाहिए ही नहीं। वे तो खैर प्रवासी हुए। जो यहाँ के स्थानीय हैं, वे तो बिल्कुल भी नहीं चाहते कि उन्हें स्थायी नौकरी मिले। एक-एक आदमी ने कंपनी बना रखी है, पूरे महीने एक बड़ी कंपनी में वैसे ही काम करते हैं जैसे बाकी लोग। लेकिन वे वेतन नहीं लेते। वे फीस लेते हैं।डॉक्टरी में तो यह भारत में भी दशकों से रहा ही है। एक ही डॉक्टर पूरे शहर में घूमते मिल जाएँगे। हालांकि बड़े कॉरपोरेट अस्पताल उनको अनुबंधित करना चाहती हैं और कर भी लेती हैं, लेकिन इसके लिए वे वेतन भी काफी ऊँचा माँगते हैं। अधिकतर लोग किसी अनुबंध में बँधना नहीं चाहते। अब इसमें मैं नैतिकता नहीं घुसेड़ रहा कि वे ऐसा क्यों करते हैं, लेकिन प्रैक्टिस यही है। कि अपना क्षेत्र बढ़ा कर रखो। सोम को एक अस्पताल में तो मंगल को दूसरे, और शाम को अपनी क्लिनिक में। यही प्रथा विदेशों में भी धड़ल्ले से चल रही है। कई समर्थ लोगों ने यह ट्रेंड बना लिया है कि तीन-चार साल से अधिक एक कंपनी में नहीं टिकेंगे। नए-नए मैनेजमेंट रंगरूटों का भी लिंक्ड-इन स्टेटस यूँ बदलता है जैसे फेसबुक पर डीपी। अब तो पूछना भी छोड़ दिया कि किस कंपनी में हो।

मैं प्रशांत किशोर का साक्षात्कार देख रहा था कि वह प्रधानमंत्री जी के साथ थे, और गवर्नेंस का हिस्सा बनने वाले थे, लेकिन मोदीजी स्वयं नए-नए जॉब में आए थे। उनको वक्त लग रहा था तो पीके स्विच कर गए। सोचिए! आदमी प्रधानमंत्री के साथ भी टिकना नहीं चाहता कि कहीं दूसरा बढ़िया ऑप्शन मिल जाए। ऐम्बीशन लेवल कहाँ पहुँच गया है!

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