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“बरबाद मेरी जिंदगी .....इन फिरोजी होठों पर” !!

Bhola Tiwari Feb 14, 2020, 8:15 AM IST कॉलमलिस्ट
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नीरज कृष्ण 

पटना : वो प्यार जिसे चाहते सब हैं लेकिन छिपकर। ज्यादातर बुजुर्ग इसे “कैसा जमाना आ गया है” समझते हैं, जो अपने वक़्त में बिना मां की इजाजत लिए अपनी पत्नियों के पास नहीं जा सकते थे। पत्नियों का चेहरे तक नहीं देख सकते थे। सड़क पर पत्नियां उनसे ढाई कदम पीछे ही चलती थीं, वो अपनी पत्नियों के आगे-आगे। वक्त कुछ दशक फलांगकर आगे बढ़ा तो जोड़े रेस्त्रा में बैठने लग गए, साथ घूमने-फिरने लग गए। कुछ दशक फलांगकर ज़माना फिर बदला। एक दूसरे को देख लेने भर से प्यार हो जाने, और एक दूसरे को छू लेने भर से सिहर उठनेवाले लोग देख रहे हैं, नए लड़के-लड़कियां बेपरवाही से एक दूसरे के कंधे पर धौल जमाकर चल यार कह रहे हैं। सबकुछ नॉर्मल है। लड़कों के हाथ खींचकर लड़कियां सड़क पर ले जा रही हैं। हां इसी ज़माने में अब भी लड़कियों की जींस और मोबाइल पर फतवे जारी हो रहे हैं। इसी खींचतान में ज़माना बदल रहा है।

चुम्बन एक ऐसी कला है जिसमे कोमलता का भाव निहित है, यह प्रेम का वाहक, युगल प्रेम में कामोद्वेग का वर्धक, हृदय के विचारों का वाहक, जीवन मे नवक्रान्ति का उत्पादक और आनंदानुभूति का द्बार है, सशब्द और निशब्द चुम्बन दो तरह के होते है, ओठो के द्वारा स्त्री या पुरुष के शरीर के किसी अंग का स्पर्श चुम्बन कहलाता है, आलिंगन और चुम्बन दोनों में ही प्रेम का अद्भुत संचार होता है। 

धर्मवीर भारती गुनाहों के देवता में आलिंगन और चुम्बन के सन्दर्भ में क्या खूब लिखा है-  

"अगर पुरुषों के होंठों में तीखी प्यास न हो, बाहुपाशों में जहर न हो, तो वासना की इस शिथिलता से नारी फौरन समझ जाती है कि सम्बन्धो में दूरी आती जा रही है। संबंधों की घनिष्ठता को नापने का नारी के पास एक ही मापदंड है, चुंबन का तीखापन"। "बस ऐसा हो कि आदमी अपने प्रेमास्पद को अपने निकट लाकर छोड़ दे, उसको बांधे न। कुछ ऐसा हो कि होंठों के पास खींचकर छोड़ दे"।

किसलय की भांति कोमल.... बिम्बफल के समान रक्तवर्ण ओष्ठ किसे आकर्षित नही करते। कालिदास ने अधरः किसलयराग यूँ ही नही कहा ...., कोमल पुष्प की भांति अधर की कल्पना यूँ ही नही की है-

अधरः किसलय-रागः कोमल-विटपानुकारिणौ बाहू।

कुसुमम् इव लोभनीयं यौवनम् अङ्गेषु संनद्धम्॥

रीतिकाल के प्रसिद्ध कवि #देव ने युवती के होठों के आकर्षण का जिक्र करते हुए जो छंद लिखा है-

दाड़िम दाख रसाल सिता मधु ऊख पिये औ पियूख सौं पानी

पै न तऊ तरुनी तिय के अधरान के पीबे की प्यास बुझानी

अर्थात यों तो मैंने अनार, अंगूर, आम, चीनी, शहद, ईंख और अमृत जैसा मधुर जल भी पिया है, फिर भी युवती स्त्री के मधुर होठों के रसपान की प्यास अब भी नहीं बुझी है।

निराला ने क्या खूब लिखा है-

"है चूम रही इस रात को वही तुम्हारे मधु अधर

जिनमें हैं भाव भरे हु‌ए सकल-शोक-सन्तापहर!"

सुमित्रानंदन पंत ने तो अपनी कविता में चुंबन को भजन और पूजन तक बता दिया है। खास बात ये है कि उन्‍होंने होठों की उपमा के लिए मदिरा को चुना है-

मदिराधर चुंबन, प्रसन्न मन 

मेरा यही भजन औ’पूजन!

प्रकृति वधू से पूछा मैंने

प्रेयसि, तुझको दूं क्या स्त्री-धन?

बोली, प्रिय, तेरा प्रसन्न मन

मेरा यौतुक, मेरा स्त्री धन!

चुम्बन के अनेक प्रकार भी होते है ...परन्तु सबका उल्लेख सम्भव नही और मर्यादित भी नही, वात्सयायन के प्रसिद्द कामसूत्र में चुम्बन का विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है जहाँ आप पढ़ सकते है! ....क्यूंकि सोशल साइट्स पर लोग अश्लीलता का नाम दे देते है।

सार्वजनिक तौर पर अश्लीलता को लेकर कानून हैं। अगर कहीं कोई अश्लीलता हो रही हो तो उससे कानून के दायरे में निपटा जाना चाहिए। संविधान के अनुच्छेद 294(ए) के तहत अगर कोई सार्वजनिक स्थल पर अश्लील क्रिया करते देखा जाता है तो उसे तीन महीने तक की सज़ा हो सकती है, या जुर्माना, या दोनों ही। नौजवान कानून की सीमाएं जानते हैं और मॉरल पुलिसिंग को दरकिनार करते हुए देश का युवा अपने लिए प्रेम के इज़हार की आज़ादी का दावा कर रहा है।

माता करे तो प्रेरणा, प्रिय करे तो प्यार

प्रफुल्लित करे मन को, स्फूर्ति दे तन को 

यह है चुम्बन की गाथा, अश्लीलता मत समझो मेरे यार।

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