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राजनीति में अपराधियों की एंट्री पर सुप्रीमकोर्ट सख्त, चुनाव आयोग और याचिकाकर्ता को दिये जरूरी निर्देश

Bhola Tiwari Feb 14, 2020, 7:57 AM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

नई दिल्ली : सुप्रीमकोर्ट के न्यायमूर्ति आर.एफ. नरीमन और न्यायमूर्ति एस.रवींद्र भट्ट की पीठ ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि वह देश में राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के मद्देनजर एक सप्ताह के भीतर इसकी रूपरेखा पेश करे।सुप्रीमकोर्ट ने याचिकाकर्ता और निर्वाचन आयोग से कहा कि वे साथ मिलकर विचार करें और सुझाव दें जिससे राजनीति में अपराधीकरण पर रोक लगाने में मदद मिले।

गौरतलब है कि सितंबर 2018 में पाँच सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से फैसला सुनाया था कि सभी उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से पहले चुनाव आयोग के समक्ष अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि की घोषणा करनी होगी।फैसले में ये भी कहा गया था कि उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि के बारे में प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में व्यापक प्रचार किया जाना चाहिए।इस फैसले के बाद 10 अक्टूबर,2018 को निर्वाचन आयोग ने फार्म-26 में संशोधन करने के बारे में अधिसूचना जारी की थी और सभी राजनीतिक दलों तथा प्रत्याशियों को आपराधिक पृष्ठभूमि प्रकाशित करने का निर्देश दिया था।भाजपा नेता और वकील अश्विन उपाध्याय ने याचिका दायर कर चुनाव आयोग पर ये आरोप लगाया है कि निर्वाचन आयोग ने न तो चुनाव चिन्ह आदेश,1968 में संशोधन किया है और न ही आचार संहिता में ऐसा किया।अतः इस अधिसूचना का कोई कान महत्व नहीं था।याचिकाकर्ता ने ये भी कहा कि निर्वाचन आयोग ने इस मकसद के लिए प्रमुख समाचार पत्रों और समाचार चैनलों में ऐसी कोई सूची प्रकाशित नहीं की और न हीं इसमें प्रत्याशियों द्वारा आपराधिक पृष्ठभूमि की घोषणा के लिए समय के बारे में स्पष्ट किया था।याचिका के अनुसार इस वजह से प्रत्याशियों ने बेतुके समय पर उन समाचार पत्रों और समाचार चैनलों में यह जानकारी प्रकाशित की जो बहुत लोकप्रिय नहीं थे।

निर्वाचन आयोग ने उच्चतम न्यायालय में कहा कि चुनावी उम्मीदवारों को इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि के बारे में घोषणा करने के 2018 के उनके निर्देश से राजनीति के अपराधीकरण पर रोक लगाने में मदद नहीं मिल रही है।आयोग ने कहा कि उम्मीदवारों से उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि के बारे में कहने के बजाय राजनीतिक दलों से कहा जाना चाहिए कि वे आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को टिकट हीं न दें।

चुनाव आयोग का भी कहना सही है कि अगर सभी राजनीतिक दल ये प्रण कर लें कि वे आपराधिक छवि वाले उम्मीदवार को टिकट हीं नहीं देंगे तो वो स्वंय हीं चुनाव नहीं लड़ पाएगा।मगर इसमें एक पेंच ये भी है कि उम्मीदवार पर केस विचाराधीन है, उन पर फैसला नहीं आया है तो उन्हें अपराधी कैसे घोषित कर दें।

राजनीतिक दलों की ये मजबूरी है कि ऐसे दबंग और आपराधिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवार जीताऊ होते हैं और वे धन-बल से चुनाव जीत भी जाते हैं।कभीकभी सरकार बनाने और बिगाड़ने के लिए ऐसे हीं नेताओं की जरूरत पड़ती है, इस वजह से सभी राजनीतिक दल इन्हें अपने साथ रखते हैं।उम्मीदवार कहता है कि उनके विरुद्ध अभी कोर्ट से फैसला नहीं आया है तो आप हमें कैसे आपराधिक पृष्ठभूमि का घोषित कर सकते हैं।

मेरे ख्याल से इसके लिए एक सख्त गाइडलाइंस की जरूरत है जो सुप्रीमकोर्ट हीं दे सकता है।उसे कानून बनाकर सख्ती से अमल करना होगा नहीं तो परिणाम वही ढाक के तीन पात हीं रहेंगे ये तो तय मानिए।

चुनाव के पूर्व तो सभी राजनीतिक दल आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को टिकट न देने की बात करते हैं मगर चुनाव के समय उनकी कथनी और करनी में बड़ा फर्क आ जाता है।

चुनाव सुधार के लिए काम करनेवाली संस्था "एडीआर" ने अपने अध्ययन में खुलासा किया है कि पिछले लोकसभा चुनाव के प्रथम चरण में भारतीय जनता पार्टी ने 36 फीसदी(कुल 83 उम्मीदवारों में से 35 यानी 42% अपराधी उम्मीदवारों को टिकट थमाया है जिनमें 22 यानी 27 फीसदी पर गंभीर मामले चल रहें हैं।बहुजन समाज पार्टी ने इस चरण में 32 उम्मीदवार उतारे हैं।इनमें आठ पर आपराधिक और चार पर गंभीर आपराधिक मामले चल रहें हैं।कमोबेश समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का भी यही हाल है।

दिल्ली विधानसभा चुनाव पर एडीआर और दिल्ली इलेक्शन वाच का कहना है कि इस बार सभी दलों ने विधानसभा चुनाव में अपराधियों को टिकट पिछले बार के मुकाबले ज्यादा बांटा है।2008 के विधानसभा चुनाव में 79 उम्मीदवारों में से 111 उम्मीदवारों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामलों का खुलासा किया था।2013 में कुल 796 उम्मीदवारों में से 129 प्रत्याशियों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे।2015 में 673 कैंडिडेट्स में से 114 के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे।

सुप्रीमकोर्ट के क्लीयर दिशा निर्देश के बिना ये सख्त कानून नहीं बन पाएगा।माननीय सुप्रीमकोर्ट को इस मसले पर साफ एंव स्पष्ट फैसला देना चाहिए और संभव हो सके तो वो इस मामले को खुद देखे तभी बात बनेगी नहीं तो कानून में लोच का फायदा उठाकर यूँहीं सभी आपराधिक पृष्ठभूमि के लोग चुनाव लगते रहेंगे और हम इसी तरह छाती पीटते फिरेंगे।

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