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पूर्वजो के शब्द बनते ये देशज शब्द

Bhola Tiwari Feb 13, 2020, 7:48 AM IST टॉप न्यूज़
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अमरेंद्र किशोर

नई दिल्ली  : 'खेती किसानी छूट रहा है। अपना देस मर रहा है।' कहते हैं पाली विक्रम के सुधीर कुमार। बिहार के सोन तटीय इलाके के मानिंद खेतिहर हैं सुधीर भाई। दिल्ली में ज़िन्दगी के 6 बहुमूल्य साल नौकरी में गवांकर आज अपने पैतृक गांव में 'मेरा गांव मेरा देश' का नारा बुलंद कर रहे हैं। आज घर पर मिलने आये तो खेती बाड़ी पर चर्चा हुई। इन दिनों जैविक उपज के मजे ले रहे हैं भाई साहब। 


उनके पास तीनों तरह के खेत हैं, अहरी-केवाला और इंग्लिशिया। अहरी खेत बेहद उपजाऊ होता है। इसमें धान से लेकर सब्जियां पैदा करने का प्रचलन है। केवाला थोड़ी नीचे की ज़मीन है जिसमें धान की पैदावार होती है।उनके गांव में डीह ज़मीन भी है जहां किसान सब्जी, सरसों से लेकर आलू पैदा करते हैं। यहां पहले लट्ठा से पानी का जुगाड़ किया जाता था। लट्ठा और रहट अब अतीत के दामन में फेंके जा चुके हैं। डीह तक नहर का पानी नहीं आता। टांड़ ज़मीन ऊसर, पथरीली और अव्यवस्थित सी होती है।यह सबसे ऊंचाई की ज़मीन होने के चलते जलजमाव से मुक्त रहता है। अमूमन नहर यहां से गुजरते हुए माल, खाल और अहरी खेतों तक पहुंचता है। माल और खाल पर चर्चा बाद में। टांड़ भूमि पर ईंट भट्ठों की चिमनियाँ धुआं धौंकती नजर आती हैं। 


नहर बर्बाद हो रहे हैं। क्योंकि नदियों में पानी रहा कहां। सुधीर सोन नहर प्रणाली की बात कर रहे थे। इस प्रणाली की आयु कमतर रह गयी है। वजहें एक नहीं अनेक है। लोग खेती छोड़ रहे हैं, तो नहरों को लेकर उदासी उभर आई है। सुधीर भाई ने बताया कि नहरों से निकलनेवाला करहा के जरिये पानी खेतों तक पहुंचता था। किसान जगह जगह पाइन बना लेते थे। मतलब करहा जगह जगह चौड़ा किया जाता था। पाइन मौर्यकालीन जल व्यवस्था है। 

खेती से नाता टूटते समाज का क्या होगा, यह सवाल है। यह सवाल सभ्यता के उस संकट से जुड़ा है जो इंसानी वजूद के लिए गम्भीर चुनौती बनता जा रहा है। क्या सत्ता के सट्टेबाज इस बात को समझेंगे या टैक्स बचाने के लिए अपना नाता खेती से जोड़कर अमानत में खयानत करते रहेंगे?

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