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'मुफ्तखोरी' बनाम कल्याणकारी राज्य

Bhola Tiwari Feb 12, 2020, 7:11 AM IST टॉप न्यूज़
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दिनेश श्रीनेत

नई दिल्ली  : अरविंद केजरीवाल की पार्टी आप की जीत के बाद अब विरोधी दल के पास शर्मिंदगी छिपाने का एक ही तरीका बचा है कि दिल्ली की जनता को 'मुफ्तखोर' कहकर अपमानित किया जाए। आप कुछ मत कीजिए ट्विटर पर #मुफ्तखोर_दिल्लीवाले हैशटैग सर्च करके देखिए- किस तरह ट्रोलर्स लगातार अपमानजक भाषा में दिल्लीवालों को निकम्मा, मुफ्तखोर, लालची और भिखारी कह रहे हैं। एक सभ्य कहे जाने वाले लोकतांत्रिक समाज में कितनी गंदी भाषा का इस्तेमाल किया जा सकता यह भाजपा के ट्रोलर्स से सीखा जा सकता है। 

मुफ्त बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य और परिवहन पर दिल्ली का पढ़ा-लिखा मिडल क्लास भी नाक-भौं सिकोड़ता है। स्टेट की तरफ से लोक कल्याणकारी योजनाएं चलाना कोई नई बात नहीं है। दूसरे विश्वयुद्ध की विभीषिका के बाद यूरोप के अधिकांश देशों ने इस मॉडल को अपनाया और अपने देशवासियों को 'अवसर की समानता' तथा 'एक अच्छे जीवन के लिए न्यूनतम प्रावधान' पर जोर दिया। यहां यह समझना होगा कि यह मॉडल पूरी तरह पूंजीवादी व्यवस्था पर आधारित है। यहां पर पूंजीवाद के मॉडल का इस्तेमाल लोकतांत्रिक मूल्यों और जन-कल्याण के लिए होता है। 

आजादी के बाद नेहरू के समाजवादी मॉडल की अपनी खामियां और खूबियां रही होंगी मगर आर्थिक उदारीकरण के बाद लोक कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना कहीं पीछे छूट गई। एशियन डेवलपमेंट बैंक की रिपोर्ट बताती है कि भारत इस मामले में अभी भी बहुत पीछे है। भारत में सामाजिक सहायता के मद में जीडीपी का महज 1.7 फीसद हिस्सा खर्च होता है, जबकि एशिया के कई दूसरे देशों में यह आंकड़ा 3.4 प्रतिशत, चीन में 5.4 प्रतिशत और एशिया के अधिक आमदनी वाले देशों में 10.2 प्रतिशत है। 

उदारीकरण के बाद कारपोरेट, मीडिया और राजनीतिक दलों के गंठजोड़ से जो सरकारें बनीं उन्होंने कल्याणकारी योजनाओं से हाथ पीछे खींचने शुरू किए। घाटे का तर्क देकर सरकारें सार्वजनिक उपक्रमों को एक-एक करके खत्म करने लगीं। जबकि सावर्जनिक उपक्रमों के घाटे में जाने की वजह सरकारों की अकर्मण्यता और भ्रष्टाचार था, मगर सरकारें किसी भी किस्म की जवाबदेही से मुक्त रहीं। इस बार के बजट में एयर इंडिया और भारतीय रेल के बाद एलआईसी को भी निजी हाथों में सौंपने की तैयारी हो गई। तर्क दिया गया है कि "सरकार ने अगले वित्त वर्ष में घाटे को कम करने का लक्ष्य रखा है। उस पैसे को जुटाने के लिए केंद्रीय बीमा कंपनी LIC के शेयर निजी कंपनियों को बेचेगी।"   

पिछले दिनो जेएनयू और जामिया के आंदोलनों में एक और जुमला उछला था। उसकी तर्क श्रृंखला यह थी कि हमारे टैक्स से इन विश्वविद्यालयों में ये देशद्रोही मुफ्त में पढ़ते हैं। अब जरा देखिए कि डायरेक्ट टैक्स पेयर हैं कितने। शेखर गुप्ता ने 'द प्रिंट' के अपने एक आर्टिकल में लिखा है, "सीबीडीटी के आंकड़े बताते हैं कि पिछले वित्त वर्ष में केवल 6,351 व्यक्तियों ने 5 करोड़ से ज्यादा की आय का रिटर्न भरा, जिनकी औसत आय 13 करोड़ रुपये थी. इससे कितना अतिरिक्त राजस्व आएगा? मात्र 5,000 करोड़ रु., जो कि आईपीएल के सालाना टर्नओवर से बहुत ज्यादा नहीं है. गरीबों को यह सोचकर मजा आएगा कि अमीरों को निचोड़ा जा रहा है." जबकि हकीकत यह है कि आज भी देश की लोअर मिडिल क्लास और गरीब जनता ही असली टैक्स देती है।  

इसके बदले उन्हें मिलता क्या है? 

यहीं पर लोक कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना सामने आती है। केरल से लेकर बांग्लादेश तक, सरकार ने जहां भी स्वास्थ्य के मद में हल्का सा जोर लगाया है वहां मृत्यु-दर और जनन-दर में कमी आई है। अब यूरोपीय देशों की तरफ देखते हैं। वहां के आधुनिक कल्याणकारी राज्यों में जर्मनी और फ्रांस, बेल्जियम और नीदरलैंड शामिल हैं। इसके अलावा स्कैंडेनेवियन देशों में भी बहुत सी ऐसी योजनाएँ चलती हैं जो वहां के सामान्य लोगों के जीवन स्तर और हैपिनेस इंडैक्स को बेहतर बनाती हैं। 

जर्मनी में अनइंप्लाइमेंट इंश्योरेंस स्कीम चलाई जाती है। जिसमें बेरोजगार लोगों को लिविंग अलाउंस देने के अलावा उन्हें रोजगार तलाशने में मदद और ट्रेनिंग की भी व्यवस्था है। इसके अलावा जर्मनी में बच्चों के डे-केयर सेंटर बड़ी संख्या में नॉन प्रॉफिट आर्गेनाइजेशन द्वारा चलाए जाते हैं और सरकार से उन्हें पर्याप्त आर्थिक सहयोग मिलता है। यूरोप के लगभग सभी देशों में डिसएबल लोगों तथा उम्रदराज़ लोगों के पुनर्वास के लिए सरकार की तरफ से योजनाएं चलती हैं। स्वीडेन में जो लोग घर का खर्च वहन नहीं कर सकते उन्हें हाउसिंग अलाउंस दिया जाता है। यूके में स्वास्थ्य सुविधाएं एनएसएच के अधीन हैं। ये स्थानीय प्रशासन की तरफ से चलाए जाने वाले स्वास्थ्य केंद्र थे जो अमूमन निःशुल्क होते थे। हालांकि पिछले कुछ सालों वहां पर भी निजीकरण की कवायद और उसका विरोध जारी है।

केजरीवाल ने लंबे समय बाद सरकार को पुनः कल्याणकारी योजनाओं के लिए जवाबदेह बनाने का प्रयास किया है। इस बात की प्रसंशा करनी होगी कि सारी नफरत फैलाने की कोशिशों, जबरदस्त पैसा झोंकने और मीडिया का सहारा लेने के बाद भी उन्होंने अपनी भाषा संतुलित रखी, अपने काम पर फोकस किया और एक शानदार जीत हासिल की। 

हमारे समय के सबसे महत्वपूर्ण लेखक Uday Prakash अपनी पोस्ट में लिखते हैं, "उनके (मनीष सिसोदिया) विरुद्ध भाजपा ही नहीं, दिल्ली में बेहद ताकतवर ‘शिक्षा-माफ़िया’ भी लगा हुआ था। शिक्षा और स्वास्थ्य ये दो मुख्य मुद्दे थे। स्पष्ट है कि देश की राजधानी दिल्ली ने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को नागरिक सौहार्द्रता की भावना से नकार दिया है। यह समाज में किसी भी स्वस्थ विकास के लिए अनिवार्य अहिंसा के साधनों की भी जीत है।"

तो अगली बार अगर आपको कोई मुफ्तखोर वाला जुमला सुनाए तो... 

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