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सियासत के नये बाहुबली...

Bhola Tiwari Feb 11, 2020, 4:15 PM IST टॉप न्यूज़
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रमेश कुमार रिपु

रायपुर  : नरेन्द्र मोदी दिल्ली में होकर भी, दिल्ली को अपने करीब नहीं ला सके। दिल्ली उनसे दूर हो गई। यह हैरानी और बेचैंनी दोनों बात है। दिल्ली ऊंचा न केवल सुनती है,बल्कि ऊंचा सोचती भी है। आप के मुखिया अरविंदं केजरीवाल की बात को दिल्ली ने कान लगाकर सुना। मोदी और अमित शाह के बयानी प्रपंच को दरकिनार कर दिया। प्रशासनिक शख्सियत ने राजनीति के सिंकदरों को पानी पिला दिया। अमित शाह का मैनेजमेंट केजरीवाल के सामने फेल हो गया। और केजरीवाल सियासत के नये बाहुबली बनकर उभरे है। जाहिर सी बात है कि काम काज की जीत हुई है।

कुछ चैनल वालों ने उनके काम काज पर खूब ऊंगलियां उठाई थी। गोदी मीडिया में बने रहने की मजबूरी थी। कामयाबी नहीं मिली। बहुत लोगों की सियासी भविष्यवाणी फेल हो गई। अपने टाइमलाइन में मै ने केजरीवाल का विधान सभा में बोलते उन बातों का वीडियो लगाया था ,जिसमें उन्होंने क्या क्या किया। कइयों का कहना था कि आप के दिन लद गये।

मध्यप्रदेश,राजस्थान,छत्तीसगढ़,महाराष्ट्र और झारखंड मोदी के हाथ से निकलने के बाद दिल्ली भी फिसल गई। जाहिर सी बात है कि बीजेपी के सामने बेचैनी बेहिसाब है। 

दिल्ली की पत्रकारिता में रामबहादुर एक स्थापित नाम है। वे मूलतः आरएसएस और बेजीपी से प्रभावित पत्रकार हैं। गोदी मीडिया के समर्थकों में उनका भी नाम आता है। कहते हैं कि अनुभवी पत्रकार दूर से जान जाता है कि, क्या हो सकता है। यथावत पत्रिका के वे संपादक है। उन्होंने केजरीवाल को लेकर कई अंक निकालें। उनके हर अंक में शुरू से ही केजरीवाल निशाने पर रहे है। नया अंक में वे दावा किये कि केजरीवाल से ही मुकाबला। अंदर तो एक से बढ़कर एक केजरीवाल के खिलाफ मैटर हैं। निश्चय ही केजरीवाल की सरकार न बनती, तो रामबहादुर राय जी छा जाते। लेकिन उनका यह अंक इस बात का प्रमाण है कि पत्रकारिता के संदर्भ में उनकी राय सही नहीं है। अब रविश कुमार जैसे लोग उन्हें गोदी मीडिया का समर्थक कहें तो हैरानी वाली बात नहीं है। किसी के विचार से सहमत होना या न होना अलग बात है, लेकिन किसी के खिलाफ लिखना अलग बात है। राजनीतिक पत्रकारिता का निश्चय ही पैमाना बड़े लोगों ने बदल दिया है। पत्रकारिता का यह दौर प्रभाष जोशी जी की विचार धारा का पोषक नहीं है।

बहरहाल अरविंद केजरीवाल की यह जीत यह बताती है कि देश में जो पार्टी काम करेगी जनता के हित की, उसे जनता हर बार चुनेगी। मोदी सरकार की चमक फीकी पड़ गई है। देश को मंदी के ढलान पर पहुंचा कर शब्दों की मिठाई खिलाने से ट्यूबलाइट सी खुशियों की चमक नहीं आती। सात महीने में ही इतनी फजीहत होगी,यकीन नहीं होता।

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