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चुनावी रणनीति के शहंशाह हैं शाह

Bhola Tiwari Feb 09, 2020, 9:21 AM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

नई दिल्ली : चुनाव कैसे लड़ा जाता है और माहौल कैसे बनाया जाता है ये सीखना हो तो आप अमित शाह से सीख सकते हैं।यूँहीं नहीं नरेंद्र मोदी अपने सबसे विश्वस्त सिपहसालार पर आँख मुंद कर विश्वास करते हैं।चुनावी रणनीति बनाने से लेकर बूथ मैनेजमेंट तक में वे माहिर खिलाड़ी हैं ये सभी ने अच्छी तरह देख लिया है।दरअसल उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत पोस्टर चिपकाने और बांटने से की है।थोड़ा वरिष्ठ होने पर वे बूथ कार्यकर्ता बन गए उसके बाद उन्होंने छात्रसंघ की राजनीति में कदम रखा।छात्रसंघ के चुनाव में वे भारी मतों से जीते थे।बताते हैं कि यहीं नरेंद्र मोदी की नजर अमित शाह पर पड़ी,फिर क्या था कुछ हीं दिनों में अमित शाह नरेंद्र मोदी के गुडबुक में शामिल हो गए।

प्रधानमंत्री बनने के बाद जब नरेंद्र मोदी ने अमित शाह को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया तो अन्य लोगों के साथ मैं भी थोड़ा हैरान था,लगा कि मोदी ने कुछ जल्दबाजी कर दी है।उसके बाद तो अमित शाह की अगुवाई में भाजपा नित्य नई ऊँचाईयों को हासिल करती गई।आपको याद होगा लोकसभा चुनाव जीतने के बाद भाजपा मुख्यालय पर नरेंद्र मोदी का वो संबोधन, जिसमें नरेंद्र मोदी ने अमित शाह की भूरी भूरी प्रशंसा की थी और जीत का श्रेय जनता के साथ अमित भाई को भी दिया था।

आपको मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा की हार तो याद हीं होगी।ये हार और हाहाकारी हो सकती थी अगर इसमें अमित शाह कठोर मेहनत नहीं करते तो।राजस्थान में भाजपा की हालत बहुत पतली थी,वसुंधरा राजे सिंधिया अपने आगे किसी को कुछ समझती नहीं थीं।हद तो तब हो गई जब उन्होंने राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का भी विरोध करना शुरू कर दिया था।नरेंद्र मोदी के हस्तक्षेप के बाद अमित शाह राजस्थान गए और बहुत हद तक उन्होंने डैमेज कंट्रोल कर लिया।वसुंधरा राजे से सभी नाराज थे हार तो होनी हीं थी मगर अमित शाह के जुझारू नेतृत्व ने इस हार को काफी हद तक कम कर दिया।मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में हार किसानों के नाराजगी के कारण हुई थी जिसे भांपने में शिवराज सिंह और रमण सिंह बुरी तरह असफल रहे थे,वहाँ भी नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने हार के फासले को बेहद कम कर दिया था।

आप छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव को देख लिजिए, रघुवर दास के खिलाफ समाज के सभी वर्ग एकजुट हो गए थे।पाँच वर्षों से रघुवर दास झारखंड को अपने अहंकार और मनमर्जी से चला रहे थे।वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों के साथ उनका व्यवहार किसी से छुपा नहीं है।मंच से आईपीएस अधिकारियों को भलाबुरा कहना उनकी आदत सी बन गई थी, आदिवासी उनसे बेहद नाराज थे और उन्होंने भाजपा के खिलाफ मतदान करने का मन बना लिया था।सब कुछ भांपते हुए भी अमित शाह समाज के सभी वर्गों के बीच गए और उन्हें मनाने की कोशिश की।बहुत तो नहीं मगर इतने लोग मान गए कि ये हार हाहाकारी नहीं हुई,नहीं तो भाजपा पाँच सीट के लिए भी तरस जाती ये तो तय था।

चुनाव कैसे लडा जाता है ये अमित शाह से सीखना चाहिए, चाहे वो विरोधी दल के क्यों न हों।रणनीति तो सभी बनाते हैं मगर उसका कार्यान्वयन जमीनी स्तर पर कैसे हो ये वर्तमान लौहपुरुष अमित शाह से सीखना चाहिए।

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