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ग्राम गणराज्य : गाँव बदलेगा, तो देश बदलेगा

Bhola Tiwari Jan 26, 2020, 7:11 PM IST कॉलमलिस्ट
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हिमकर श्याम
 
सिर्फ उत्सव का नहीं, आत्मनिरीक्षण का भी दिन है गणतंत्र दिवस। गणतंत्र की स्थापना के 70 वर्षों बाद हम कहां पहुंचे, मंजिल क्या थी, हासिल क्या हुआ, इस पर मंथन जरूरी है। आज के दिन हमें अपने स्वतंत्र गणराज्य की उपलब्धियों और विफलताओं का मूल्यांकन करना चाहिए। गणराज्य में लोकतन्त्र की प्रथम सीढ़ी ग्राम को माना जाता है। गांधी ने ग्राम गणराज्य की कल्पना की थी। वे आजादी का असली अर्थ गांवों की समरसता, आत्मनिर्भरता और लोकतंत्र में जनभागीदारी को मानते थे। ग्राम गणराज्य के लिए नीति नियंताओं ने कोई ठोस पहल नहीं की।
गांधी जी की कल्पना दरअसल हजारों वर्ष पूर्व के हमारे ग्राम गणराज्यों के मूल्यों पर आधारित था। ग्राम गणराज्य प्राचीन भारत में मौजूद थे। वैशाली में यह व्यवस्था तब थी जब दुनिया के अन्य देशों में इसकी कल्पना तक नहीं की गई थी। क्लादसिकल एथेंस (508-322 ई.पू.) तथा रोमन रिपब्लिोक (509 ई.-27 ई.पू.) जैसे विश्व के विख्याात प्राचीनतम गणतंत्रों से भी पहले। गांवों के गणतंत्र के लिए पंचायतों को सशक्त करना था। इसमें केन्द्र और राज्यों, दोनों की सरकारें विफल रहीं। जिस पंचायती राज व्यवस्था को लोग ग्राम स्वराज की संज्ञा दे देते हैं, वह वास्तव में ग्राम स्वराज नहीं है। पंचायतों को मजबूत किये बिना राष्ट्र का विकास नहीं हो सकता। मजबूत पंचायत ही मजबूत राष्ट्र बनाने का काम करता है। 
पंचायत व्यवस्था वस्तुतः सत्ता को जनता के हाथों में देने की संकल्पना से जुड़ी है। महात्मा गांधी की नजर में गांव गणतंत्र के लघु रूप थे, जिनकी बुनियाद पर देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की इमारत खड़ी होनी थी। गांधी ने अपने इस सपने को ग्राम स्वराज्य के रूप में परिभाषित किया था। उन्होंने आत्मनिर्भर और स्वायत्त ग्राम गणराज्य का विचार इसलिए रखा था कि जनता अपनी किस्मत का खुद फैसला करे, खुद अपने पर शासन करे, खुद अपनी अर्थव्यवस्था चलाये और उसे बाहर के मशविरे और हस्तक्षेप पर निर्भर नहीं रहना पड़े। पंचायती राज की मूल अवधारणा स्थानीय योजनाओं में आम लोगों की भागीदारी है। गणतंत्र में जनता को ही शासन का पूरा अधिकार संविधान ने दिया है।
गांवों को विकसित व सक्षम बनाने के लिय बना पंचायत उपबन्ध अधिनियम, 1996 : भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243 ड (4)(ख) संसद को कानून बनाने और उसे अनुसूचित एवं जनजातीय क्षेत्रों में विस्तारित करने का अधिकार प्रदान करता है। इस शक्ति का प्रयोग करते हुए संसद द्वारा पंचायत उपबन्ध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996 बनाया गया। संविधान के 73वें संशोधन के बाद पंचायत राज व्यवस्था की नींव रखी गयी़। राज्य के विकास के लिए त्रिस्तरीय व्यवस्था की गयी। स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, पेयजल, कृषि, स्वरोजगार केंद्र जैसी कई सुविधाएं पंचायतों को प्रदान करने का प्रयास किया गया़। यह उम्मीद की गयी थी कि इस व्यवस्था के लागू होने से गांवों में विकास को गति मिलेगी। संविधान संशोधन के बाद यह संभावना प्रबल हुई है कि गांवों की तस्वीर में काफी बदलाव देखने को मिलेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पंचायती सिस्टम ठीक से काम नहीं कर रहा। पंचायत के पास न तो अपना प्रशासन है, न वित्तीय आयोग और न ही विधायी तंत्र। सारी शक्तियां और अधिकार राज्य सरकार व उसके अफसरों के पास है। जब तक गांवों का अपना खुद का प्रशासन नहीं होगा तब तक ग्राम गणराज्य की बात करना छलावा मात्र ही रह जायेगी। पंचायत को जो स्वायत्तता और संसाधन मिलने चाहिए थे वे नहीं मिल पाए हैं, पंचायतें मजबूर और पराधीन हैं। मौजूदा व्यवस्था में ऊपर से निर्णय होते है, नीचे से नहीं। पैसा जनता का और तय करता है नौकरशाह। यह जनता के बीच तय होना चाहिए। दुर्भाग्य है कि पंचायती राज व्यवस्था नौकरशाही में बदल गयी है। पंचायतों को सशक्त बनाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गये। इसे सशक्त बनाना आवश्यक है। 
भारत गांव, कस्बों और नगरों का एक विशाल ढांचा है। देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा आज भी गांवों में रहता है। जब गांव बदलेगा तभी देश में परिवर्तन दिखाई देगा। आजाद भारत के शासकों ने विकास का जो मॉडल अपनाया था उससे आजादी के सात दशकों में गांवों की हालत लगातार बद से बदतर होती गई। गांवों का मूलाधार है खेती और उस पर आधारित लघु उद्योग, लेकिन देश की विकास नीतियां इनके लिए घातक साबित हुई हैं। आजादी के बाद आयी तमाम सरकारों की प्राथमिकताओं में खेती-बाड़ी की जगह काफी नीचे रही। खेती अब मुनाफे का धंधा कतई नहीं रह गई है। किसान ख़ुदकुशी करने को मजबूर हो गये है। 
झारखंड गांवों में अभी और बढ़ानी होंगी बुनियादी सुविधाएं : झारखंड सरीखे विषम भौगोलिक परिस्थिति वाले राज्य के लिए पंचायतों का सशक्त होना आवश्यक है। झारखंड प्रदेश के गठन के 10 वर्षों बाद 2010 में पहली बार झारखंड में पंचायत प्रशासन की नींव पड़ी। राज्य में 32 साल बाद पंचायत चुनाव हुए। सत्ता के विकेंद्रीकरण की दिशा में इस पहल की प्रशंसा हुई थी। लोगों को यह भरोसा हुआ कि अब गाँव में अपनी सरकार होगी। सत्ता की बागडोर गाँव के लोगों के हाथों में होगी। गाँव के फैसले गाँव में लिए जाएंगे। गांवों की तस्वीर बदल जायेगी, मगर ऐसा नहीं हुआ। झारखंड के गांवों में जीने के लिए आवश्यक बुनियादी चीजें नहीं हैं। विकास की कीमत भी गांवों को ही चुकानी पड़ी है। गांव के छोटे-मोटे उद्योग-धंधे और व्यवसाय चौपट हो गए। गाँवों में न तो ढंग के स्कूल बन पाए, न अस्पताल और न ही शौचालय। बदहाली और मजबूरी के इसी माहौल के चलते गांवों से लोगों के पलायन का दौर शुरू हो गया, जो आज भी चिंताजनक रूप से जारी है। गांव से पलायन के दौर में कृषि की स्थिति खराब होती जा रही है। 
अब भी बरकरार हैं उम्मीदें : ग्राम गणराज्य को लेकर आशाएं टूटी जरूर है, मगर उम्मीदें बरकरार हैं। पंचायती राज व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए पंचायतों को ज्यादा से ज्यादा अधिकार मिलना चाहिए। सत्ता के विकेंद्रीकरण से ही पंचायतों का विकास होगा। अगर हम ग्राम सभा को मजबूत बनाते हैं तभी लोकतंत्र की अवधारणा कारगर होगी। पेसा ग्राम सभा को लोगों की परंपराओं और रिवाजों, और उनकी सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने, सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए योजनाओं, कार्यक्रमों और परियोजनाओं को मंजूरी देने, गरीबी उन्मूलन और अन्य कार्यक्रमों के अंतर्गत लाभार्थियों के रूप में व्यक्तियों की पहचान करने का शक्ति प्रदान करती है। पंचायत को भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और विस्थापित व्यक्तियों के पुनर्वास में अनिवार्य परामर्श देने, खान और खनिजों के लिए संभावित लाइसेंस पट्टा एवं रियायतें देने, मादक द्रव्यों की बिक्री / खपत को विनियमित करने और लघु वनोपजों का स्वामित्व का भी अधिकार है। पेसा के इन उपबन्धों का प्रभावी क्रियान्वयन न केवल झारखंड जैसे जनजातीय क्षेत्र में विकास को गति देगा बल्कि इससे लोकतंत्र भी और गहरा होगा।

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