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केंद्र सरकार ने "भीमा कोरेगांव केस" की जाँच महाराष्ट्र सरकार की अनुमति के बगैर "एनआईए" को सौंपा, महाराष्ट्र सरकार नाराज

Bhola Tiwari Jan 26, 2020, 7:47 AM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

नई दिल्ली : कांग्रेस के समय में हमेशा ये आरोप लगते थे कि केंद्र सरकार विपक्षी राज्य सरकारों से राजनीतिक द्वेष के कारण टकराव रखती थी।अब नरेंद्र मोदी सरकार भी कांग्रेस के पद चिन्हों पर चलना शुरू कर दी है।ताजा मामला महाराष्ट्र का है।केंद्र सरकार ने महाराष्ट्र सरकार की बिना इजाजत भीमा कोरेगांव केस को एनआईए को सौप दिया है।आपको बता दें एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने कुछ दिनों पहले महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देशमुख को एक पत्र लिखकर इस मामले की स्वत्रंत और निष्पक्ष जांच की माँग की थी।महाराष्ट्र के गृहमंत्री ने तत्काल संज्ञान लेते हुए प्रदेश के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की बैठक बुलाकर इस मामले की समीक्षा शुरू की तो केंद्र सरकार द्वारा इस जाँच को केंद्रीय जाँच एजेंसी को सौंपने का निर्णय ले लिया गया।महाराष्ट्र सरकार का कहना है कि केंद्र सरकार इस मामले में राजनीति कर रही है।राजनीतिक विश्लेषक इसे केंद्र-राज्य संबंधों के टकराव के रूप में देख रहें हैं।उनका मानना है कि ये जो नई परिपाटी शुरू हो रही है इससे केंद्र और राज्य में टकराव बढ़ेगा,तनाव बढ़ेगा।

गौरतलब है कि शरद पवार ने महाराष्ट्र के गृहमंत्री को लिखे पत्र में ये आरोप लगाया था कि पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भीमा कोरेगांव का षड्यंत्र पुलिस अधिकारियों को दवाब में डालकर करवाया था।पवार ने यह भी कहा था कि भीमा कोरेगांव प्रकरण से "अर्बन नक्सल" जैसे शब्द की उत्पत्ति की गयी और सामाजिक तथा मानवाधिकार के लिए कार्य करने वाले कुछ कार्यकर्ताओं का माओवादी संगठनों से संबंध बताकर उन्हें गिरफ्तार किया गया।

राज्य सरकार एसआईटी बनाकर जाँच करवाने वाली थी तभी इसकी भनक महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को लग गई।अगर एसआईटी जाँच होती तो इसमें देवेंद्र फडणवीस की भूमिका की भी जाँच होती जो देवेंद्र फडणवीस नहीं चाहते थे।उनके कहने पर हीं केंद्र सरकार ने इस जाँच को एनआईए को सौपा है।महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देशमुख ने केंद्र के इस निर्णय की कडी आलोचना की है।उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि जब महाराष्ट्र सरकार ने इस प्रकरण की जाँच नए सिरे से करवाने का निर्णय कर लिया था,ऐसे में बिना राज्य सरकार से अनुमति लिए केंद्र सरकार ने यह फैसला क्यों कर लिया?उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार का यह निर्णय राज्य के संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ है।उनका मानना है कि राज्य की कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होती है, ऐसे में जब राज्य सरकार इस मामले की विस्तारित जाँच के लिए आगे बढ़ रही थी तो केंद्र क्यों दखल दिया?

शरद पवार ने जिस तरह ये मामला उठाया है और केंद्र सरकार जाँच को अपने हाथों में ले लिया है, लगता है कि दाल में अवश्य काला है।केंद्र सरकार इस मामले की एनआईए जाँच कराकर क्या देवेंद्र फडणवीस को बचाना चाह रही है जो हत्याकांड में बुरी तरह से घिरे हैं?अब ये जानना महत्वपूर्ण है कि आखिर भीमा कोरेगांव का मामला है क्या और इसको लेकर इतना बवाल क्यों मचा है।

एक जनवरी 2018 को पुणे के पास स्थित भीमा कोरेगांव में हिंसा भड़की थी।इसके एक दिन पहले वहां यलगार परिषद नाम से एक रैली हुई थी और पुलिस मानती है कि इस रैली में हिंसा भड़काने की भूमिका बनाई गई।इस मामले में यलगार परिषद के पाँच कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया था।दक्षिणपंथी संस्था समस्त हिंद अघाडी के नेता मिलिंग एकबोटे और शिव प्रतिष्ठान के संस्थापक संभाजी भिड़े के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई मगर वे सभी विभिन्न हिंदूवादी संगठनों से जुड़े थे इस वजह से उन्हें छोड दिया गया था।

आपको बता दें भीमा कोरेगांव पेशवाओं के नेतृत्व वाले मराठा साम्राज्य और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुऐ युद्ध के लिए जाना जाता है।01 जनवरी 1818 को भीमा कोरेगांव युद्ध में ईस्ट इंडिया कंपनी की एक छोटी टुकडी ने पेशवा बाजीराव द्वितीय की अपेक्षाकृत बडी सेना को बुरी तरह हरा दिया था।इस लडाई में कंपनी की तरफ से लडनेवाले ज्यादातर सैनिक महाराष्ट्र की दलित महार जाति से ताल्लुक रखते थे।वैसे तो महार शिवाजी के समय से हीं मराठा सेना का हिस्सा रहे थे लेकिन बाजीराव द्वितीय ने अपनी ब्राहमणवादी संकीर्णता की वजह से उनको सेना में भर्ती करने से इंकार कर दिया था।यह युद्ध ढलती हुई पेशवाई के लिए एक निर्णायक पराजय सिद्ध हुआ।मराठों की पेशवा परंपरा के सबसे कमजोर प्रतिनिधि बाजीराव द्वितीय की इस हार के बाद मराठा पेशवा कंपनी सरकार के वेतनयाफ्ता कैदी होकर रह गए।एक तरह से यह शिवाजी के स्वराज का औपचारिक अंत था।

महाराष्ट्र में मराठे और पेशवा उच्चवर्गीय माने जाते हैं और वे इस दिन को याद नहीं रखना चाहते, जबकि दलित इसे अपने स्वाभिमान से जोड़ते हैं।महाराष्ट्र के महान समाज सुधारक ज्योतिबाफुले ने पहली बार महारों के भीतर जातिगत अस्मिता का बोध पैदा किया।उसके बाद भीमराव अंबेडकर जब तक वे जिंदा रहे भीमा कोरेगांव जाते रहे।डा.अंबेडकर ने इस लडाई को ब्राहमणवाद बनाम दलित में परिवर्तित कर दिया, जिसकी वजह से हर साल इस दिन को तनाव अपने चरम पर रहता है।


एक जनवरी 2018 को इस युद्ध की 200 वीं सालगिरह थी।मराठा सेना यह युद्ध हार गई थी और कहा जाता है कि ईस्ट इंडिया कंपनी को महार रेजीमेंट के सैनिकों की बहादुरी की वजह से जीत हासिल हुई थी।बाद में भीमराव अंबेडकर यहां हर साल आते रहे।यह जगह पेशवाओं पर महारों यानी दलितों की जीत के एक स्मारक के तौर पर स्थापित हो गई, जहाँ हर साल उत्सव मनाया जाने लगा।31 दिसंबर 2017 को जब इस युद्ध की 200 वीं सालगिरह थी,भीमा कोरेगांव शौर्य दिन प्रेरणा अभियान के बैनर तले कई संगठनों ने मिलकर एक रैली आयोजित की, जिसका नाम यलगार परिषद रखा गया।

पेशवा नहीं चाहते थे कि दलित वहाँ रैली करें या शौर्य दिवस मनाएं।इस वजह से जब रैली बंसावाडी पहुँची तो भीड पर पथराव शुरू हो गया फिर तो हिंसा भड़कना हीं था और भड़की भी।दलितों ने आरोप लगाए कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस पेशवाओं का साथ दे रहें हैं।उनका आरोप था कि एक तरफ उनके खिलाफ हिंसा हुई है और उनके हीं लोगों को गिरफ्तार भी किया गया।रैली में मौजूद जिग्नेश मेवानी और उमर खालिद के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज किया गया,तब से आज तक ये मामला न्यायालय में विचाराधीन है।

विपक्ष ने आरोप लगाया था कि इस हिंसा में देवेंद्र फडणवीस ने दक्षिणपंथी ताकतों का साथ दिया था।शरद पवार ने घोषणा की थी कि सरकार बनने पर इसकी स्वत्रंत जाँच कराई जाएगी।महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देशमुख ने कहा कि अब निष्पक्ष जांच की बात बेमानी है, केंद्र सरकार ने अपने दोषी मुख्यमंत्री को बचाने का पुख्ता इंतजाम कर लिया है।

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