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जब पेरियार ने दलितों के साथ मंदिर में प्रवेश किया....

Bhola Tiwari Jan 25, 2020, 7:58 AM IST राष्ट्रीय
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अजय श्रीवास्तव

नई दिल्ली : ये घटना 1924-25 की है।केरल के त्रावणकोर के राजा के मंदिर की ओर जाने वाले रास्ते पर दलितों के प्रवेश को प्रतिबंधित कर दिया गया।उस समय ये भी परंपरा थी कि दलित मंदिर के अंदर प्रवेश नहीं करेंगे।वे मंदिर के द्वार पर मत्था टेक कर वापस आ जाते थे।ये राजा का आदेश था,सभी दलितों को मुनादी पीटकर ये सूचना दे दी गई।दलित समाज इस बात से बेहद आक्रोशित था और उसने राजाज्ञा का विरोध करने का निर्णय लिया।विरोध करने पर राजा ने बहुत से दलितों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया।घबराये दलितों ने पेरियार से संपर्क किया, वे तुरंत साथ देने को राजी हो गए।गौरतलब था कि राजा, पेरियार के घनिष्ठ मित्रों में से एक थे।इस आंदोलन को वायकोम सत्याग्रह के नाम से भी जाना जाता है।वायकोम नाम इसलिए पड़ा कि त्रावणकोर के वायकोम गाँव से हीं इस आंदोलन की शुरुआत हुई थी।

इस विरोध प्रर्दशन का नेतृत्व करने के लिए पेरियार ने मद्रास राज्य कांग्रेस अध्यक्ष के पद से इस्तीफा दे दिया।गाँधी नहीं चाहते थे कि पेरियार इस आंदोलन का नेतृत्व करें,क्योंकि राज्य ब्रिटिश हुकूमत के प्रति वफादार था।पेरियार गाँधीजी की बातों को अनसुना कर त्रावणकोर पहुंचे, राजा के दोस्त होने के कारण उनका राजकीय स्वागत करने की कोशिश की गई,मगर उन्होंने मना कर दिया।उन्होंने राजकीय दूत को कहा कि मैं यहाँ राजा का विरोध करने आया हूँ, इसलिए ये स्वागत ठीक नहीं है।

30 मार्च 1924 को पेरियार दलितों के एक समूह को लेकर मंदिर में प्रवेश कर गए,राजाज्ञा की अहवेलना करने के कारण राजकीय सेना ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया।उनकी गिरफ्तारी के बाद उनकी पत्नी नागमणि ने महिला विरोध प्रर्दशन का आयोजन किया था।

पेरियार की गिरफ्तारी के बाद गाँधीजी त्रावणकोर पहुंचे और उन्होंने इस आंदोलन को अपना समर्थन दिया।गाँधीजी ने महारानी से मुलाकात की,बातचीत में फैसला लिया गया कि दलितों को फिर से उस रास्ते पर चलने की अनुमति दी जाएगी, जिसपर रोक लगी थी।आंदोलन यहीँ खत्म नहीं हुआ,1936 में दलित,हरिजन समेत सभी शुद्र जातियों को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दे दी गई।

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