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पेरियार विवाद : क्या तमिल सुपरस्टार रजनीकांत की बातें सही हैं जो उन्होंने कही थी ?

Bhola Tiwari Jan 23, 2020, 10:51 AM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

नई दिल्ली :  एक हफ्ते पहले तमिल फिल्मों के सुपरस्टार रजनीकांत ने तमिल मैगजीन "तुगलक" को दिए एक साक्षात्कार में दावा किया था कि पेरियार ने 1971 में सलेम में एक रैली निकाली थी जिसमें भगवान राम और सीता की वस्त्रहीन तस्वीरों को लगाया गया था।साक्षात्कार के प्रकाशित होने पर पूरे तमिलनाडु में बवाल मचा गया, मचता भी क्यों न वो तमिलनाडु के सबसे बड़े नेता थे।पेरियार ने हीं द्रविड़ आंदोलन की शुरुआत की थी।डीएमके,एमडीएमके और बहुत से राजनीतिक दल उन्हीं के पद चिन्हों पर चलने का दावा करते हैं।द्रविदार विधुतलाई कझगम सदस्यों ने रजनीकांत के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज करवाया है और मांग की गई है कि वे सार्वजनिक रूप से माफी मांगे।

माफी मांगने के सवाल पर रजनीकांत का कहना है कि मैं अपनी बात पर अडिग हूँ और मैं माफी नहीं मांगूंगा।रजनीकांत ने मीडिया से बातचीत में कहा कि उन्होंने जो पेरियार के बारे में कहा है, वह बिल्कुल सत्य है और रिपोर्ट पर आधारित है,इसलिए वह माफी नहीं मांगेंगे।आपको बता दें रजनीकांत ने तमिलनाडु की मुख्य विपक्षी पार्टी डीएमके पर भी निशाना साधा था।उन्होंने कहा था कि पेरियार हिंदू देवताओं के कट्टर आलोचक थे लेकिन उस समय किसी ने पेरियार की आलोचना नहीं की।

अब ये जानना जरूरी है कि पेरियार कौन थे और उनपर तमिलनाडु के सुपरस्टार रजनीकांत ने ये आरोप क्यों लगाए हैं।पेरियार ई.वी.रामास्वामी नायकर का जन्म दक्षिण भारत के ईरोड(तमिलनाडु)नामक स्थान पर 17 सितंबर 1879 को हुआ था।शुद्र पेरियार के पिता एक बडे व्यापारी थे और वे बेहद धार्मिक थे,जिस वजह से वे अपने क्षेत्र में बेहद लोकप्रिय थे।पेरियार रामास्वामी केवल चौथी कक्षा तक पढ़े उसके बाद उनका मन पढ़ने में नहीं लगा।पिता ने उन्हें व्यवसाय में जोड़ लिया और 19 वर्ष की अवस्था में उनका विवाह बडे धूमधाम से नागम्मई के साथ कराया।


पेरियार का परिवार बेहद धार्मिक और रूढ़िवादी था लेकिन इनकी सोच बिल्कुल अलग थी।वे बचपन से हीं तर्क-वितर्क किया करते थे।जब भी उनके घर में पूजापाठ होता तो वे ब्राह्मणों से पूजा पद्धति पर तरह तरह के सवाल करते।बाल्यावस्था में तो ब्राह्मण हँसीं में बात टाल जाते थे मगर फिर उनके तर्क-वितर्क का विरोध होना शुरू हो गया।औरतों के गले में पहने जाने वाला आभूषण बाली या हंसुली को वे गुलामी का प्रतीक मानते थे, इस वजह से उन्होंने अपनी पत्नी के गले से ये आभूषण उतरवा दिया था।वे अपनी पत्नी व परिवार के अन्य सदस्यों को मंदिर नहीं जाने देते थे।अस्पृश्य मित्रों को अपने घर बुलाकर उनके साथ भोजन करना उनके दिनचर्या में शामिल हो गया था।

जब बात बर्दाश्त के बाहर हो गई तो परिवार के सदस्य उनके खिलाफ हो गए।पिता जो कर्मकांडी थे उन्हें ईश्वरीय शक्ति पर बेहद विश्वास था।मतभेद इतने बढ़ गए कि पेरियार ने घर छोड दिया और संन्यासियों के साथ संन्यासी बन गए।वहाँ भी उनका मन नहीं लगा,जिस आडंबर के वे खिलाफ थे वही आडंबर संन्यासी करते थे।थोड़े हीं दिनों में उन्हें लगा कि उन्हें इन सब चीजों से उबरना चाहिए और फिर एक दिन चुपचाप संन्यास जीवन त्याग कर घर लौट आए।संन्यास के दिनों में हीं वे कुछ दिन बनारस में भी रहे मगर वे जिस चीझ की तलाश कर रहे थे, वो वहां नहीं मिला।गृहस्थ जीवन में फिर वापस आने का एक फायदा यह हुआ कि वे स्वभाव से थोड़े शांत भी हो गए और गंभीरता भी आ गई। मगर उनके विचार वही थे।उन्होंने तय किया कि किसी बात पर सैद्धांतिक वाद-विवाद करने,उससे टकराने या उससे बिल्कुल मुँह मोड़ लेने की अपेक्षा, उचित यह है कि उपस्थित समस्याओं पर मतभेद रखने वाले व्यक्तियों के साथ सहयोग करके उनके विचारों को बदलने का प्रयास किया जाय।इस प्रकार रामास्वामी ने अपने विचारों में परिवर्तन किये बिना, अपनी कार्यपद्धति में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया।कार्य पद्धति में परिवर्तन के कारण शीघ्र हीं वे अपने क्षेत्र में एक सर्वप्रिय और निःस्वार्थ समाजसेवक के रूप में जन-जन के हृदय में स्थान पा गये।वे कांग्रेस के नीतियों से प्रभावित होकर पार्टी में शामिल हो गए।सन् 1920 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन का दक्षिण भारत में पेरियार रामास्वामी को नेतृत्व का दायित्व सौंपा गया।रामास्वामी ने अपने दायित्वों को बेहद गंभीरता से लिया।वे समर्पित होकर काम करना चाहते थे इस वजह से उन्होंने अपने पारिवारिक और व्यापारिक दायित्व को अपने छोटे भाई कृष्णा स्वामी को सौंप दिया।बताते हैं कि उन दिनों पेरियार 29 सामाजिक संस्थाओं से जुडे थे,एक झटके में उन्होंने सभी से संबंध विच्छेद कर लिया।

वे कांग्रेस के प्रति पूर्ण समर्पित थे और उन्होंने उसके चलाए गए विभिन्न आंदोलनों में बढ चढकर भाग लेना शुरू कर दिया।कांग्रेस द्वारा चलाए गए नशाबंदी आंदोलन के कारण अपने बाग के एक हजार से भी अधिक ताड़ के पेड़ कटवा दिया क्योंकि नशाबंदी आंदोलन के नेतृत्वकर्ता का ताड के पेड़ों का मालिक बने रहना हास्यास्पद था।इसी प्रकार अदालतों का वहिष्कार आंदोलन में रामास्वामी ने सहर्ष भारी आर्थिक हानि उठाना पसंद किया।रामास्वामी के पास उस समय लगभग पचास हजार रूपये के प्रोनोट व दस्तावेज आदि थे,जिन्हें सरकारी अदालतों की सहायता से हीं प्राप्त किया जा सकता था।उन्होंने अदालतों का वहिष्कार आंदोलन को सार्थकता प्रदान करने के लिए प्रोनोट व दस्तावेजों को फाड़कर फेंक दिया।इस आर्थिक हानि की उन्होंने कभी चर्चा भी नहीं की।वाइकोम आंदोलन जो अछूतों के अधिकारों के लिए कांग्रेस ने चलाया था का नेतृत्व भी रामास्वामी नायकर ने हीं किया तथा उनके गिरफ्तार होने के बाद उनकी पत्नी ने आंदोलन की बागडोर संभाली थी।

1925 में कांग्रेस से मतभेद होने के कारण उन्होंने कांग्रेस छोड़ दिया।दरअसल वे कांग्रेस में ब्राहमणवाद से परेशान थे और इसका जिक्र उन्होंने गाँधीजी को लिखे पत्र में किया था।1926 में उन्होंने जस्टिस पार्टी ज्वाइन किया जो ब्राह्मण विरोध पर आधारित था।1938 में वे जस्टिस पार्टी के अध्यक्ष बने।1944 में उन्होंने स्वाभिमान आंदोलन और जस्टिस पार्टी के गठबंधन से "द्रविड़ कषगम" नामक संस्था की स्थापना किया।1951 में तमिलनाडु सरकार का साम्प्रदायिक जीओ,सुप्रीमकोर्ट द्वारा निरस्त कर दिये जाने का रामास्वामी ने प्रबल विरोध किया।

15 दिसंबर,1973 को वेल्लोर के एक अस्पताल में पेरियार रामास्वामी ने अंतिम सांसें ली।

पेरियार ने हीं 1924 में केरल के त्रावणकोर के राजा के मंदिर की जाने वाले रास्ते पर दलितों के प्रवेश को प्रतिबंधित करने का त्रीव विरोध किया था।गाँधीजी के समझाने के बावजूद वो मद्रास राज्य कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर आंदोलन का नेतृत्व किया था।

उन्होंने कहा था कि मैंने ब्राह्मण देवी देवताओं की मूर्ति को तोडा था और मैं इन पर विश्वास नहीं करता हूँ।दूनिया भर के सभी संगठित धर्मों से मुझे सख्त नफरत है।वे कहते थे कि शास्त्र और पुराण में मेरी आस्था नहीं है।मैं जनता से उनकी फोटो को जलाने की अपील करता हूँ।वे ब्राहमणवादी और वर्ण व्यवस्था का अंत कर देना चाहते थे और इसका आह्वान उन्होंने कई बार किया था।उनका कहना था कि ब्राह्मण हमें अंधविश्वास का रास्ता दिखाता है और खुद आरामदायक जीवन व्यतीत करता है।ब्राहमणों ने शूद्रों को शास्त्र और पुराण के माध्यम से गुलाम बनाया है।अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए मंदिर, ईश्वर और देवी देवताओं की रचना की है।जब सभी मनुष्य समान पैदा हुए हैं तो फिर अकेले ब्राह्मण उच्च व अन्य को नीच कैसे ठहराया जा सकता है।आप अपनी मेहनत की कमाई इन मंदिरों पर लुटाते हो और ब्राह्मण इसका उपभोग करते हैं।उनका कहना था कि हमारे देश को आजादी तभी मिली समझी जानी चाहिए, जब ग्रामीण लोग देवता, अधर्म, जाति और अंधविश्वास से छुटकारा पा जाएंगे।

पेरियार द्रविड़ आंदोलन के सबसे बड़े नायक थे और तमिलनाडु में उनका कद बहुत बडा है।ये भी सच है कि 1971 की सलेम रैली में हिंदू देवी देवताओं के चित्र नग्न रूप में प्रर्दशित किया गया था।इसमें उनकी मुक सहमति मानी गई थी।बहुत से अखबारों ने इस खबर को प्रमुखता से छापा था।रजनीकांत जो कह रहें हैं वो बिल्कुल सही है मगर अब गडे मुर्दे उखाड़ने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है।

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