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तीस साल बीतने के बावजूद कश्मीरी पंडितों की सुध लेने वाला कोई नहीं, सरकार की प्राथमिकता में कश्मीर के अन्य मुद्दे

Bhola Tiwari Jan 21, 2020, 7:23 AM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

नई दिल्ली : 19 जनवरी 1990 की वो मनहूस रात,तकरीबन आठ बजे कट्टरपंथी जिहादी इस्लामिक ताकतों ने पूरी घाटी के मस्जिदों में लाउडस्पीकर से ऐलान किया कि "असि गछि पाकिस्तान, बटव रोअर त बटनेव सान" मतलब हमें पाकिस्तान चाहिए, पंड़ितों के बगैर,पर उनकी औरतों के साथ।कश्मीरी पंडित घाटी छोड़ो,यहाँ सिर्फ "निजामी मुस्तफा चलेगा....।

मस्जिद में ऐलान के बाद कश्मीरी पंडितों के घरों में आग लगाना शुरू हुआ, मर्दों की निर्मम हत्या कर दी जाती थी और औरतों के साथ सामूहिक बलात्कार होता था।जेहादी जत्था बनाकर आते थे,लूटपाट, हत्या और बलात्कार कर वापस चले जाते थे।पुलिस,प्रशासन और सिविल सोसायटी किसी की हिम्मत नहीं थी कि उनके खिलाफ कार्रवाई कर सकें।नवनियुक्त राज्यपाल जगमोहन ने हालात बिगड़ता देखकर सेना को बुला लिया मगर तबतक सैकड़ो कश्मीरी पंडितों की हत्या हो चुकी थी,उनके घरों को आग के हवाले किया जा चुका था,औरतों की आबरू तार-तार हो चुकीं थीं।बताते हैं कि राज्यपाल जगमोहन ने अगर सेना को नहीं बुलाया होता तो ये संख्या कई हजारों में होतीं।

अगले दिन से हीं कश्मीरी पंडितों का पलायन शुरू हो गया,उन्हें जम्मू के कई अस्थायी कैंपों में रखा गया जो आज भी वहाँ रह रहे हैं।वे इस आस में हैं कि सरकार उनकी घर वापसी सुनिश्चित करवाएगी मगर इन तीस सालों में बहुत सी सरकारें बनी बिगडीं मगर उनकी घर वापसी के लिए कुछ भी नहीं किया गया।

नरेंद्र मोदी की सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35(ए) को खत्म तो कर दी है मगर आज भी कश्मीरी पंडित घर वापसी की राह जोह रहें हैं।सरकार ने उनके पुनर्वास के लिए कोई घोषणा नहीं की है।यद्यपि नरेंद्र मोदी ने 2015 में कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास के लिए दो हजार करोड़ रुपए के पैकेज की घोषणा की थी पर इतने लोगों का इससे क्या होगा?ये रकम ऊँट के मुँह में जीरा के समान है और कश्मीरी पंडितों का कहना है कि उन्हें राहत नहीं सुरक्षित पुनर्वास चाहिए।वे अपने घरों को लौटना चाहते हैं जहाँ उनकी मिट्टी की सोंधी खुशबू आती है।वे अपनी संस्कृति और रीति रिवाज को जिंदा रखना चाहते हैं जो बाहर संभव नहीं है।वे अपने मकानों और खेतों को वापस पाना चाहते हैं जो कट्टरपंथियों के कब्जे में है।

हर जनवरी के 19 तारीख को कश्मीरी पंडित काला दिवस मनाते हैं।19 जनवरी प्रतीक बन चुका है उस त्रासदी का जो कश्मीर में 1990 में घटित हुई।जिहादी इस्लामिक ताकतों ने ऐसा जुल्मोसितम ढ़ाया कि उनके पास केवल तीन विकल्प थे,या तो धर्म बदलो...मरो...या पलायन करो।पलायन हीं सबसे बेहतर विकल्प था और वही कश्मीरी पंडितों ने चुना।


आपको बता दें कश्मीर में कट्टरपंथी और पाकिस्तान बंटवारे के समय से हीं चाहता था कि कश्मीर का पाकिस्तान में विलय हो जाय या उन्हें आत्मनिर्णय का अधिकार दिया जाय।पाकिस्तान को भरोसा था कि अगर कश्मीरियों को ये विकल्प मिलेगा तो वो पाकिस्तान के साथ जाना पसंद करेंगे क्योंकि कश्मीरी भाषा, धर्म एंव रीतिरिवाजों के हिसाब से पाकिस्तान के ज्यादा करीबी है।1948 में भारतीय हुक्मरान जनमतसंग्रह के लिए भी तैयार हो गए थे मगर बाद में उन्हें आभास हुआ कि अगर जनमतसंग्रह हुआ तो कश्मीर भारत के हाथ से निकल जाएगा,फिर उन्होंने जनमतसंग्रह की बात को ठुकरा दिया था।समय समय पर पाकिस्तान कश्मीर के कट्टरपंथियों को भारत के विरुद्ध भडकाता रहता था।1987 के विधानसभा चुनाव में कट्टरपंथियों की बुरी तरह हार हुई तब उन्होंने ये आरोप लगाया कि चुनाव में धांधली की गई है।चुनाव में हारे हुए लोगों और पाकिस्तान समर्थित लोगों ने जुलाई 1988 में "जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट" नाम के चरमपंथी संगठन का निर्माण किया जिसका उद्देश्य था कि हथियार के दम पर कश्मीर को भारत से अलग करना।

जेकेएलएफ ने मांग रखी कि कश्मीर में केवल इस्लाम को मानने वाले हीं रहेंगे, हिंदुओं को कश्मीर छोड़ना होगा।14 सितंबर 1989 को भाजपा के नेता पंड़ित टीकालाल टपलू को कई लोगों के सामने मार दिया गया, वे कश्मीरी पंडितों को अपना घर छोड़कर जाने से मना कर रहे थे।दहशत का ये आलम था कि किसी ने भी हत्यारों को पहचानने से इंकार कर दिया और वे पकड़े नहीं गए।बताते हैं कि हत्यारे स्थानीय लड़के थे जिन्हें जेकेएलएफ में ये कहकर भर्ती की गई थी कि इस्लाम खतरे में है और उन्हें भारत के खिलाफ जेहाद करना है।जेकेएलएफ को हथियार और पैसा पाकिस्तान से मिल रहा था,रोज नये रंगरूटों की भर्ती कराई जा रही थी।बहुत हद तक पुलिस प्रशासन अप्रत्यक्ष रूप से उनकी मदद कर रहा था।कश्मीर से हिंदुओं को भगाने के लिए पंडित टीकालाल टपलू की पहली हत्या थी।ठीक डेढ़ महीने बाद रिटायर्ड जज नीलकंठ गंजू की हत्या चरमपंथियों ने कर दी।जज गंजू ने जेकेएलएफ के नेता मकबूल भट्ट को मौत की सजा सुनाई थी।गंजू की पत्नी का अपहरण कर लिया गया फिर वो कभी नहीं मिलीं।रिटायर्ड जज की मौत ने सभी सरकारी हिंदू अधिकारियों के जेहन में खौफ भर दिया।रात के अंधेरे में कोई भी सरकारी अधिकारी चाहे कितनी भी इमेरजेंसी हो बाहर नहीं निकलता था।गंजू हत्याकांड अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था.कि मशहूर वकील प्रेमनाथ भट्ट की हत्या कर दी गई।13 फरवरी 1990 को श्रीनगर के टेलीविजन केंद्र के निदेशक लासा कौल की हत्या गोली मारकर कर दी गई।ये सारे बडे लोग थे,रोजाना दो चार कश्मीरी पंडितों की हत्या तो आम बात थी।

"इस्लाम खतरे में है" का जहर सर्वप्रथम गुलाम मोहम्मद शाह ने 1986 में जब वो अपने बहनोई फारूक अब्दुल्ला से सत्ता छीनकर मुख्यमंत्री बने थे तब बोया था।खुद को मुसलमानों का सच्चा रहनुमा साबित करने के लिए उन्होंने एक खतरनाक निर्णय लिया, जो बाद में सारी फसाद की जड बनी थी।गुलाम मोहम्मद शाह सरकार ने ऐलान किया कि जम्मू के न्यू सिविल सेक्रेटेरिएट एरिया में एक पूराने मंदिर को गिराकर भव्य शाह मस्जिद बनवाया जाएगा।विरोध होना हीं था और हिंदुओं ने पूरजोर विरोध भी किया।उसी वक्त शाह के नुमाइंदों ने ये नारा जोरशोर से उछाला कि इस्लाम खतरे में है।ये बात कट्टरपंथी मुसलमानों के जेहन में चढ़ गया और उन्होंने हिंदुओं से मारपीट और उनकी हत्या शुरू कर दी।साउथ कश्मीर और सोपोर में सबसे ज्यादा हमले हुऐ।कानून व्यवस्था बुरी तरह चरमरा गई थी तब 12 मार्च 1986 को जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल जगमोहन ने गुलाम मोहम्मद शाह की सरकार को बर्खास्त कर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया था।

90 के शुरुआती दिनों में आतंक चरम पर पहुंच चुका था,एक तरह से बेलगाम।04 जनवरी 1990 को उर्दू अखबार आफताब में आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन ने छपवाया कि सारे पंड़ित कश्मीर की घाटी छोड़ दें।अखबार अल-सफा ने इस चीज को दोबारा प्रकाशित किया।चौराहों और मस्जिदों में लाउडस्पीकर लगाकर कहा जाने लगा कि पंड़ित यहां से चलें जाएं।उस समय जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला थे,वे आतंक को रोकने में बुरी तरह नाकाम साबित हुऐ थे,तब केंद्र की वीपी सिंह सरकार ने भाजपा के कहने पर जगमोहन को दूसरी बार राज्यपाल बनाने का निर्णय लिया।उन दिनों केंद्र में गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद थे कहा जाता है कि उन्होंने जगमोहन की नियुक्ति का विरोध किया था मगर भाजपा के सहयोग से सरकार चल रही थी और भाजपा की बात सभी को मानना पड़ा था।फारूक अब्दुल्ला ने जगमोहन की नियुक्ति का कडा विरोध किया मगर वीपी सिंह बीजेपी के आगे मजबूर थे।इस नियुक्ति के विरोध में फारूक अब्दुल्ला ने इस्तीफा दे दिया था और प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा।

राज्यपाल जगमोहन ने अगर 19 जनवरी 1990 की रात सेना नहीं बुलाई होती तो वहाँ इतने कत्लेआम होते कि लाश गिनना भी मुश्किल होता।आज कश्मीरी पंडित अपने घरों को वापस जाना चाहते हैं।उनकी चिंता ये है कि समय के बदलाव से उनके अस्तित्व, संस्कृति, रीति रिवाज, भाषा, मंदिर और अन्य धार्मिक स्थल धीरे धीरे समय के चक्रव्यूह में लुप्त होने की कगार पर हैं।वे सरकार से अनुदान नहीं चाहते, उनकी मांग केवल इतनी है कि उनका सुरक्षित पुनर्वास हो और सरकार उन्हें पूर्ण सुरक्षा दे।

आज नरेंद्र मोदी सरकार की प्राथमिकता में कश्मीरी पंडितों का पुनर्वास नहीं है,वे तत्कालिक फायदे वाले मुद्दे एनआरसी, नागरिकता संशोधन एक्ट पर ज्यादा फोकस कर रही है।कश्मीरी पंडितों का कहना है कि सरकार नागरिकता संशोधन एक्ट के माध्यम से विदेश में प्रताडित हिंदू लोगों को देश में बसाना चाहती है जबकि अपने घर में बेघर हुऐ कश्मीरी पंडितों की कोई सुध नहीं ले रहा।सरकार उन्हें भी देखे मगर हमारे लिए भी सार्थक प्रयास होने चाहिए।

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