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नए दशक में देश के विकास में सबसे ज्यादा 10वीं-12वीं के छात्रों की होगी भूमिका : मोदी

Bhola Tiwari Jan 20, 2020, 1:03 PM IST टॉप न्यूज़
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● छात्रों को मोदी का मंत्र : टेक्नोलॉजी दोस्त, उसका गुलाम मत बनिए


सिद्धार्थ सौरभ

नई दिल्ली : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने‘परीक्षा पे चर्चा 2020’ कार्यक्रम के दौरान छात्रों, शिक्षकों और अभिभावकों के साथ चर्चा कर रहे हैं। मोदी ने कहा कि 2020 केवल नयासाल ही नहीं, बल्कि नए दशक की शुरुआत है। इस दौरान देश के विकास में सबसे ज्यादा 10वीं-12वीं के छात्रों की भूमिका होगी। प्रधानमंत्री ने चंद्रयान-2 की नाकामी का जिक्र करते हुए यह भी कहा कि विफलता दिखाती है कि आप सफलता की ओर बढ़ गए। इस कार्यक्रम का उद्देश्य छात्रों का परीक्षा का तनाव दूर करना था। स्कूली छात्रों के साथ प्रधानमंत्री के संवाद कार्यक्रम का यह तीसरा संस्करण है।

मोदी ने कहा, ‘‘मैं सबसे पहले नए साल 2020 की शुभकामनाएं देता हूं। यह केवल नया साल नहीं, बल्कि नए दशक की शुरुआत है। इस दशक में देश जो भी करेगा, उसमें 10वीं-12वीं के छात्रों का सबसे ज्यादा योगदान होगा। देश नई ऊंचाइयों को पाने वाला बने, नई सिद्धियों के साथ आगे बढ़े। यह सब इस पीढ़ी पर निर्भर करता है। इसलिए इस दशक के लिए मैं आपको अनेक अनेक शुभकामनाएं देता हूं।’’

‘‘अगर कोई मुझे कहे कि सारे इतने कार्यक्रमों के बीच कौन सा कार्यक्रम दिल के करीब है, तो वह है परीक्षा पर चर्चा। मुझे अच्छा लगता है कि जब इसकी तैयारी होती है, तब युवा क्या सोच रहा है, इस बात को मैं महसूस कर सकता हूं। हमारे बीच हैशटैग विदआउट फिल्टर यानी खुल कर बातें होनी चाहिए। दोस्त की तरह बातें करेंगे, तो गलती हो सकती है, आपसे भी और मुझसे भी। मुझसे गलती होगी तो टीवी वालों को भी मजा आएगा।’’

 ना परीक्षा का भय ना टेक्नोलॉजी का

उन्होंने छात्रों से कहा कि तकनीक का भय अपने जीवन में आने नहीं देना चाहिए। तकनीक को हम अपना दोस्त माने, बदलती तकनीक की हम पहले से जानकारी जुटाएं, ये जरूरी है। स्मार्ट फोन जितना समय आपका समय चोरी करता है, उसमें से 10 प्रतिशत कम करके आप अपने मां, बाप, दादा, दादी के साथ बिताएं। तकनीक हमें खींचकर ले जाए, उससे हमें बचकर रहना चाहिए। हमारे अंदर ये भावना होनी चाहिए कि मैं तकनीक को अपनी मर्जी से उपयोग करूंगा।

 पीएम मोदी ने कहा की यदि आप पढ़ाई के अलावा कोई अतिरिक्त गतिविधि नहीं करेंगे, तो आप एक रोबोट की तरह बन जाएंगे। क्या हम चाहते हैं कि हमारा युवा रोबोट में बदल जाए? नहीं वह ऊर्जा और सपनों से भरे हुए हैं।

 2001 में भारत-ऑस्ट्रेलिया टेस्ट सीरीज याद है? हमारी टीम को असफलताओं का सामना करना पड़ रहा था और मूड अच्छा नहीं था। लेकिन, हम यह कभी नहीं भूल सकते कि राहुल द्रविड़ और वीवीएस लक्ष्मण ने कैसे मैच को पलट दिया। यह सकारात्मक सोच और प्रेरणा की शक्ति है।

इसी दरमियान उत्तराखंड के कोटद्वार के छात्र मयंक ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पूछा कि क्या जीवन में सफलता का मापदंड परीक्षा में प्राप्त अंक ही हैं? इस पर पीएम मोदी ने कहा कि परीक्षा में अंक को महत्वपूर्ण पड़ाव मानना चाहिए, लेकिन इसे ही सब कुछ नहीं मानना चाहिए।

  उन्होंने माता पिता से निवेदन किया कि बच्चों को 'ये नहीं तो कुछ नहीं' का गुण न सिखाएं। किसी विषय में 'सफलता नहीं पाई तो जीवन में कुछ नहीं पाया' ऐसी सोच न बनाएं। उन पर किसी भी टारगेट को पाने के लिए दबाव न बनाएं। 

नौजवानों का मूड ऑफ होना ही नहीं चाहिए

प्रधानमंत्री ने कहा, ‘‘नौजवानों का मूड ऑफ होना ही नहीं चाहिए। लेकिन क्या कभी हमने सोचा है कि मूड ऑफ क्यों होता है। अपने खुद के कारण से या बाहर की परिस्थिति से। ज्यादातर मामलों में दिमाग खराब होता है, काम का मन नहीं करता। उसमें बाहर की परिस्थितियां ज्यादा जिम्मेदार होती हैं। आप पढ़ रहे हैं और अगर आपकी चाय 15 मिनट लेट हो जाए, तो आपका दिमाग खराब हो जाता है। लेकिन अगर आपने यह सोचा कि मां इतनी मेहनत करती है, इतनी सेवा करती है, जरूर कुछ हुआ होगा, जो मां चाय समय से नहीं दे पाई। तो आपका मूड अचानक से चार्ज हो जाता है। अपनी अपेक्षा पूरी न हो पाने के कारण हमारा मूड ऑफ होता है।’’

हर प्रयास में हम भर सकते हैं उत्साह 


मोदी ने बताया, ‘‘जीवन में शायद ही कोई व्यक्ति हो, जिन्हें नाकामी से गुजरना न पड़ता हो। कभी कुछ करने के लिए मोटिवेटेड होते हैं, अचानक असफलता मिलने पर डिमोटिवेट हो जाते हैं। चंद्रयान-2 के लिए हम रातभर जागे। आपका उसमें कोई कॉन्ट्रीब्यूशन नहीं था, लेकिन जब वह मिशन असफल हुआ तो आप सब डिमोटिवेट हो गए। कभी-कभी विफलता आपको परेशान कर देती है। कई लोगों ने मुझसे कहा था कि आपको उस कार्यक्रम में नहीं जाना चाहिए। आप जाएंगे और फेल हो गया तो क्या कहेंगे। मैंने कहा- इसलिए तो मुझे जाना चाहिए। जब आखिरी कुछ मिनट थे, तो मुझे दिखा कि वैज्ञानिकों के चेहरे पर तनाव है, परेशान हैं। मुझे लगा कि कुछ अनहोनी हो गई है। फिर थोड़ी देर बाद उन्होंने बताया तो मैंने कहा- ट्राई कीजिए। मैं बैठा हूं।मैंने वहां साइंटिस्ट्स के साथ बातें कीं। कुछ देर बाद अपनी होटल चला गया।’’

‘‘मैं वहां भी चैन से बैठ नहीं पाया। सोने का मन नहीं किया। हमारी पीएमओ की टीम अपने कमरों में चली गई। आधा पौने घंटे बाद मैंने सबको बुलाया। मैंने कहा- सुबह हमें जाना है, तो सुबह थोड़ा देर से जाएंगे। मैं सुबह उन साइंटिस्टों से मिला। मैंने उनके परिश्रम की जितनी सराहना की जा सकती थी, की। देखा कि पूरा माहौल बदल गया। सिर्फ वैज्ञानिकों का नहीं, पूरे हिंदुस्तान का माहौल बदल गया। हम विफलताओं में भी सफलताओं की शिक्षा पा सकते हैं। हर प्रयास में हम उत्साह भर सकते हैं। किसी चीज में विफल हुए हैं तो इसका मतलब यह है कि अब आप सफलता की ओर चल पड़े हैं।

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