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इतिहास तो पूछेगा...

Bhola Tiwari Jan 20, 2020, 10:30 AM IST टॉप न्यूज़
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● जनवरी की वह काली रात जिसे याद कर आज भी सिहर उठते हैं कश्मीरी हिन्दू ..


 रंजीत कुमार

पटना : इतिहास तो पूछेगा ही कि 19 जनवरी 1990 को दिल्ली में किसकी सरकार थी। क्या वह स्वतंत्र भारत की स्वतंत्र सरकार थी, क्या वह सेकुलर सरकार थी? या उस दिन दिल्ली के तख्त पर कोई सिकंदर लोदी विराजमान था। इतिहास तो पूछेगा ही तब देश में जो अखबार छपते थे, उसके संपादक कौन-कौन थे। कश्मीर के रिपोर्टरों का क्या नाम था... हिंदुओं के सामूहिक जेनोसाइड और बलात्कार की खबर को खा जाने वाले उन रिपोर्टरों के खिलाफ अखबार , टीवी और रेडियो (बीबीसी समेत) के सम्पादकों ने क्या कार्रवाई की? इस घटना को चुपचाप पचा जाने वाली राजनीतिक पार्टियों को पुनः जनता से वोट मांगने की हिम्मत कैसे हुई?

धर्म बदलो, मरो या पलायन करो, हमे कश्मीर चाहिए पंडिताइन सहित और पंडित रहित , आजादी का मतलब क्या .ला इलाही लिल्लिलाह जैसे इस्लामी नारों से कश्मीर घाटी थर्राने के साथ हिन्दू रक्त और बलात्कार से कराह उठी थी .....

करीब 30 साल पहले कश्मीर से अल्पसंख्यक कश्मीरी हिन्दुओ का पलायान हुआ। इस बीच कितनी ही सरकारें बदलीं, कितने मौसम आए...गए, पीढ़ियां तक बदल गईं, लेकिन कश्मीरी पंडितों की घर वापसी और न्याय के लिए लड़ाई जारी रही । पलायन की कहानी किसी से छिपी नहीं है। लेकिन भारत की मक्कार शेखुलर मीडिया , आज के विपक्षी नेताओं ,मानवाधिकार पर गला फाड़ने वाले NGO , महिला आयोग , शेष भारत के मुसलमानों ने कभी इसका संज्ञान नही लिया सन् 1989-1990 में जो हुआ, उसका उल्लेख करते-करते तीस साल बीत गए, लेकिन इस पीड़ित समुदाय के लिए कुछ नहीं बदला ।

लेकिन जो बदल रहा है उससे इस समुदाय के अस्तित्व, संस्कृति, रीति-रिवाज, भाषा, मंदिर और अन्य धार्मिक स्थल धीरे-धीरे समय चक्र के व्यूह में लुप्त होने के कगार पर है। जनवरी का महीना पूरी दुनिया में नए साल के लिए एक उम्मीद ले कर आता है, लेकिन कश्मीरी पंडितों के लिए यह महीना दुख, दर्द और निराशा से भरा है। 19 जनवरी प्रतीक बन चुका है उस त्रासदी का, जो कश्मीर में 1990 में घटित हुई। जिहादी इस्लामिक ताकतों ने कश्मीरी हिन्दुओ पर ऐसा कहर ढाया कि उनके लिए सिर्फ तीन ही विकल्प थे- या तो धर्म बदलो, मरो या पलायन करो।

मुसलमान आतंकवादियों ने सैकड़ों अल्पसंख्यक कश्मीरी हिन्दुओ को मौत के घाट उतार दिया था। कई महिलाओं के साथ सामूहिक दुष्कर्म कर उनकी हत्या कर दी गई। उन दिनों कितने ही लोगों की आए दिन अपहरण कर मार-पीट की जाती थी। हिन्दुओ के घरों पर पत्थरबाजी, मंदिरों पर हमले लगातार हो रहे थे।

घाटी में उस समय कश्मीरी हिन्दुओ की मदद के लिए कोई नहीं था, ना तो पुलिस, ना प्रशासन, ना कोई नेता और ना ही कोई मानवाधिकार के लोग। उस समय हालात इतने खराब थे कि अस्पतालों में भी समुदाय के लोगों के साथ भेदभाव हो रहा था। सड़कों पर चलना तक मुश्किल हो गया था। कश्मीरी पंडितों के साथ सड़क से लेकर स्कूल-कॉलेज, दफ्तरों में प्रताड़ना हो रही थी- मानसिक, शारीरिक और सांस्कृतिक।


19 जनवरी, 1990 की रात को अगर उस समय के नवनियुक्त राज्यपाल जगमोहन ने घाटी में सेना नहीं बुलाई होती, तो कश्मीरी हिन्दुओ का कत्लेआम व महिलाओं के साथ सामूहिक दुष्कर्म और ज्यादा होता। उस रात पूरी घाटी में मस्जिदों से लाउडस्पीकरों से ऐलान हो रहा था कि 'काफिरो को मारो, हमें कश्मीर चाहिए पंडित महिलाओं के साथ ना कि पंडित पुरुषों के साथ, यहां सिर्फ निजाम-ए-मुस्तफा चलेगा...।'

लाखों की तादाद में कश्मीरी मुसलमान सड़कों पर मौत के तांडव की तैयारी कर रहे थे। अंत में सेना कश्मीरी पंडितों के बचाव में आई। ना कोई पुलिसवाला, ना नेता और ना ही सिविल सोसाइटी के लोग। लाखों की तादाद में पीड़ित कश्मीरी हिंदू समुदाय के लोग जम्मू, दिल्ली और देश के अन्य शहरों में काफी दयनीय स्थिति में जीने लगे, लेकिन किसी सिविल सोसाइटी ने उनकी पीड़ा पर कुछ नहीं किया। उस समय की केंद्र सरकार ने भी कश्मीरी पंडितों के पलायन या उनके साथ हुई बर्बरता पर कुछ नहीं किया।

कश्मीरी हिन्दुओ के मुताबिक, 300 से ज्यादा लोगों को 1989-1990 में मारा गया। इसके बाद भी हिन्दुओ का नरसंहार जारी रहा। 26 जनवरी 1998 में वंदहामा में 24, 2003 में नदिमर्ग गांव में 23 कश्मीरी हिन्दुओ का कत्ल किया गया।  

हैरानी की बात यह कि सैकड़ों मामलों में तो पुलिस ने एफआईआर तक दर्ज नहीं की। पलायन के बाद, कश्मीरी हिन्दुओ के घरों की लूटापट की गई, कई मकान जलाए गए। कितने ही हिन्दुओ के मकानों, बाग-बगीचों पर कब्जे किए गए। कई मंदिरों को तोड़ा गया और जमीन भी हड़पी गई।

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