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गुरूवर रविंद्रनाथ टैगोर की मशहूर कविता "एकला चलो रे" की राह पर सपा प्रमुख अखिलेश यादव

Bhola Tiwari Jan 19, 2020, 10:35 AM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

नई दिल्ली  : सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा है कि समाजवादी पार्टी किसी दल के साथ नहीं खड़ी होगी।हम किसी से गठबंधन नहीं करने जा रहे हैं,जो बीत गई वो बात गई।पत्रकारों ने जब अखिलेश यादव से सवाल किया कि मायावती ने आपके बर्थडे संदेश का जवाब नहीं दिया है तब उनका दर्द छलक गया और उन्होंने कहा कि "मेरा व्यवहार है,मुझे बधाई देनी चाहिए थी।उन्होंने जवाब नहीं दिया तो भी मुझे अच्छा लगा कि अब अगली बार से बधाई नहीं देंगे।"

ये सही है कि अखिलेश यादव ने गठबंधन के पूर्व तथा पश्चात हमेशा मायावती का सम्मान किया है मगर खुदगर्ज मायावती गठबंधन तोड़ने के बाद अपनी कही गई बातों को भूल गई।गठबंधन का ऐलान करते समय उन्होंने कहा था कि हमारा संबंध दीर्घकालिक है और लंबे समय तक चलेगा मगर मायावती ने तो सामान्य शिष्टाचार को भी ताक पर रख दिया,कम से कम धन्यवाद कहना तो बनता हीं था।ये वही अखिलेश हैं जिन्होंने पिछले साल मायावती के जन्मदिन पर उनके घर जाकर बधाई दी थी।15 जनवरी को अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव का भी जन्मदिन था मगर मायावती ने बधाई के एक शब्द भी नहीं बोले।जो मायावती के खुदगर्ज स्वभाव को जानता है उसके लिए ये कोई आश्चर्य की बात नहीं है मगर अखिलेश यादव को इस बात की गहरी ठेस पहुँचीं है ये उनके चेहरे से हीं पता लग रहा था।

अपने पिता मुलायम सिंह के उलट अखिलेश बेहद मिलनसार और सौम्य माने जाते हैं।वे विरोधियों पर हमला तो करते हैं मगर एक दायरे में रहकर।व्यक्तिगत आक्षेप लगाने की उनकी आदत नहीं है ये सभी जानते हैं।2016 के विधानसभा चुनाव के समय मायावती ने पहली बार अखिलेश यादव को बबुआ और इससे भी आगे समाजवादी बबुआ कहा था लेकिन अखिलेश यादव हमेशा उन्हें बुआ हीं कहते रहे।विधानसभा चुनाव के वक्त उन्होंने मीडिया में मायावती की बढ़ती खबरों पर कहा था कि बुआ ब्राडकास्टिंग कारपोरेशन जैसे मीडिया हो गया है।2016 के विधानसभा चुनाव में सपा और बसपा दोनों की बुरी तरह हार हुई और भाजपा ने 325 सीटें जीतकर उ.प्र में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई।योगी आदित्यनाथ जी मुख्यमंत्री बनें जो गोरखपुर से सांसद थे।

उ.प्र के विधानसभा चुनाव के समय मोदी की लोकप्रियता अपने चरम पर थी।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दलित और पिछडे वर्ग को भाजपा के पीछे गोलबंद कर चुका था और इसकी कानोकान खबर मायावती और अखिलेश को न लगी।वे ये मुगालते में जी रहे थे कि पूरा दलित और पिछडा वर्ग उनके साथ है।कांशीराम-मुलायम की तर्ज पर सत्ता उन्हें हीं हासिल होने वाली है मगर दलित में जाटव जो मायावती की जाति है और पिछडों में यादव को छोड़कर सभी भाजपा के साथ हो लिए थे,ये चुनाव परिणाम आने के बाद पता लगा।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जमीन पर कैसे काम करती है इसका इससे बेहतरीन नमूना नहीं देखने को मिल सकता था।

आपको बता दें चुनाव परिणाम आने के पहले हीं अखिलेश को परिणाम का अंदेशा हो गया था मगर परिणाम इतना खराब होगा,इसकी कल्पना उन्होंने भी नहीं की होगी।उन्होंने परिणाम आने से पहले पत्रकारों को कहा था कि अगर सरकार बनाने में कुछ सीटें कम पड़ती है तो वो मायावती से समर्थन मांग सकते हैं मगर भाजपा ने उन्हें इसका मौका हीं नहीं दिया।

विधानसभा चुनाव के एक साल बाद लोकसभा का उपचुनाव आया।गोरखपुर से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी सांसद थे और फूलपुर से उपमुख्यमंत्री केशव मौर्या।दोनों के इस्तीफे के बाद सीटें रिक्त हुईं थी।बहुजन समाज पार्टी कभी उपचुनाव में शिरकत नहीं करती है ये बात अखिलेश यादव जानते थे।उन्होंने अपने सूत्रों से मायावती से संपर्क किया,हार से बौखलाई मायावती सपा के उम्मीदवारों का समर्थन करने की सहमति दे दीं।दोनों प्रतिष्ठित सीटों पर सपा के उम्मीदवार जीत गए और दोनों दलों में गठबंधन की चर्चा शुरू हो गई।15 मार्च 2018 को अखिलेश यादव मायावती को धन्यवाद देने उनके आवास गए।मायावती ने घर के दरवाजे पर आकर उनकी आगवानी की थी,जो मायावती के स्वभाव से मेल नहीं खाती थी।उसी दिन राजनीतिक गलियारों में ये चर्चा आम हो गई थी कि लोकसभा चुनाव दोनों साथ मिलकर लड़ेंगे।

इसी बीच राज्यसभा का चुनाव आ गया, सपा ने बसपा के उम्मीदवार भीमराव अंबेडकर को अपना समर्थन दिया मगर वो उन्हें जीता नहीं सके।बसपा प्रत्याशी के हार पर व्यंग करते हुए योगी आदित्यनाथ ने कहा कि समाजवादी पार्टी का अवसरवादी चेहरा लोगों ने देखा है,वो दूसरे से ले तो सकती है, दूसरे को दे नहीं सकती।इस हार ने अखिलेश को परेशान कर दिया था, वे भी गठबंधन को लेकर सशंकित थे लेकिन बसपा सुप्रीमो मायावती ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि समाजवादी पार्टी पर उनका भरोसा कायम है।मेरी इस प्रेस कॉन्फ्रेंस से भाजपा वालों को नींद नहीं आएगी।अखिलेश यादव ने बाद में कहा सीटों के बंटवारे पर उनकी तरफ से कोई अड़चन नहीं आएगी और वे गठबंधन के लिए दो कदम पीछे हटने को भी तैयार हैं।

गठबंधन की सुगबुगाहट के बीच मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश को राय दी की वो अकेले चुनाव में जाएं, मायावती भरोसा करने के लायक नहीं हैं।अखिलेश यादव अपने पिता की बात से सहमत नहीं थे,उनके दिमाग में पूर्व में हुआ गठबंधन और उसका परिणाम था।लोकसभा चुनाव के समय गठबंधन हुआ,मायावती और अखिलेश यादव आश्वस्त थे कि हर हाल में भाजपा की हार तय है।इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यूपी दौरा शुरू हुआ और उन्होंने दोनों नेताओं पर अवसरवादी होने का आरोप मढ़ा।मोदी ने तो गठबंधन टूटने के तारीख की भी घोषणा कर दी थे,उन्होंने कहा कि चुनाव परिणाम आने के दिन गठबंधन टूट जाएगा और हुआ भी यही।बसपा को दस सीटों पर संतोष करना पडा और समाजवादी पार्टी पाँच सीटों पर सिमट के रह गई थी।

गठबंधन के स्वास्थ्य के ऊपर तो सभी को शंका थी मगर गठबंधन इतनी जल्दी टूटेगी किसी को उम्मीद नहीं थी।परिणाम के बाद मायावती ने ट्वीट किया "बसपा ने प्रदेश में सपा सरकार के दौरान हुऐ दलित विरोधी फैसलों को दरकिनार कर देशहित में पूरी तरह गठबंधन धर्म निभाया।चुनाव के बाद सपा का व्यवहार सोचने के लिए मजबूर करता है कि क्या ऐसा करके बीजेपी को आगे हरा पाना संभव होगा?जो संभव नहीं है।अतः पार्टी के हित में बसपा आगे होने वाले सभी छोटे-बड़े चुनाव अकेले अपने बूते पर ही लड़ेगी।"

मायावती ने ये भी आरोप मढा कि सपा अपना वोट बसपा को ट्रांसफर नहीं करा पाई जबकि बसपा के वोट सपा को मिले थे।मायावती ये बताने में असफल रही कि सपा के मुसलमान वोट जो बसपा को मिले थे,उसके बिना बसपा से इतने मुस्लिम सांसद कैसे जीते?

आज अखिलेश यादव ने एकला चलो की राह पकडी है,उनका ये निर्णय सही है या गलत, परिणाम भविष्य के गर्भ में छूपा है।आज के दिनों में समाजवादी पार्टी को एक तरफ बसपा से लड़ना होगा तो दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, नरेंद्र मोदी और भाजपा से लड़ना होगा।लोकसभा चुनाव में जमीनी स्तर पर संघ के कामों को आप नजरअंदाज नहीं कर सकते, जिस प्रकार सभी जातियों के अंदर खासकर दलितों के बीच संघ ने घुसपैठ की है वो काबिलेतारीफ है।समाजवादी पार्टी को नरेंद्र मोदी के विशाल व्यक्तित्व से लड़ना होगा, जिनकी स्वीकारिता पर फिलहाल यूपी में शक नहीं किया जा सकता है।तीसरा भाजपा का विशाल संगठन है जो किसी भी दल के नेताओं को छठी का दूध याद दिला सकता है।अखिलेश का विरोध अपने परिवार में भी शुरू हो गया है, शिवपाल के अलहदा और लोग भी नाराज बताये जा रहें हैं उनसे निपटना भी अखिलेश के लिए चुनौती होगी।मुलायम सिंह अब.बुढ़े हो गए हैं वे ज्यादा चल फिर नहीं सकते।उनसे संघर्ष की उम्मीद बेमानी है फिर अखिलेश की सौतेली माँ और बहू ऐसा क्यों चाहेंगे।वे योगी आदित्यनाथ के करीबी बने हुए हैं और आज नहीं तो कल वे भाजपा में शामिल हो जाएंगे ये तो तय है।

इतनी सारी चुनौतियों से अखिलेश को पार पाना होगा तब कुछ उम्मीद बन सकती है।आजकल वो ट्विटर पर राजनीति कर रहें हैं जिसे छोड़कर प्रदेश भ्रमण पर निकलना होगा।मुलायम सिंह यादव हार के भी पूरी तरह सक्रिय रहते थे, कार्यकर्ताओं में जोश भरते रहते थे।वही काम अब अखिलेश को करना होगा नहीं तो विरासत में मिली राजनीति का क्या हश्र होता है ये राहुल गांधी को देखकर समझा जा सकता है।

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