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विकास का मॉडल देखना हो तो चीन को देखिए...

Bhola Tiwari Jan 19, 2020, 10:12 AM IST टॉप न्यूज़
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रंजीत कुमार

पटना : विकास का मॉडल देखना हो तो चीन को देखिए। उसे पता था कि विकास के लिए सामाजिक स्थायित्व अनिवार्य है और एक विशाल देश में परस्पर विरोधी मजहबी शक्ति के रहते यह संभव नहीं है। अमेरिका जैसे देश को इसकी आवश्यकता नहीं हुई, क्योंकि वहां परस्पर विरोधी मजहबी शक्ति नहीं थी, उसे बाई डीफॉल्ट एक लगभग स्थिर समाज मिला। लेकिन चीन के सामने यह चुनौती थी। उसने कल्चरल रीवॉल्यूशन को अंजाम दिया। हर एक मजहबी शक्ति को नष्ट कर दिया। क्या भारत में ऐसा संभव है? कतई नहीं, तो फिर उपाय क्या है? मजहबी शक्ति की मंशा पर लगाम लगाना। दसों दिशा से चलाए जा रहे जेहाद को नेस्तनाबूत करना। भारत की प्राकृतिक आस्था परंपरा को मजबूत करना। हर किसी की आस्था को पूरा सम्मान मिले, लेकिन न तो कोई हिंदू राष्ट्र का सपना देखे न ही कोई गजबा ए हिंद की साजिश रचे। यह देश इस ओर चल निकला है। लेकिन जो भारत विरोधी शक्तियां हैं, वह ऐसा नहीं चाहती। वह भारत का सौ टुकड़ा करना चाहती है। उनके कारिंदे विकास का फुटकर बहाना बनाकर पुनर्जागरण के इस सूर्योदय को रोकने की कोशिश कर रहे हैं। विकास कोई वन टाइम शो नहीं है, कोई फास्ट फूड नहीं है। विकास एक सतत प्रक्रिया है जिसके लिए सामाजिक स्थायित्व जरूरी है। अब समय आ गया है कि हम विकास की कांग्रेसी परिभाषा को भूलकर इसका वास्तविक अर्थ समझें। 

जरा तारिक फतेह की बातों पर गौर करें उन्होंने कहा कि भारत एकमात्र बड़ा सभ्यतागत देश है जहां आपको व्यवस्थित रूप से अपनी विरासत से घृणा और इस सभ्यता को खत्म करने की चाह रखने वाले हमलावरों की बड़ाई करना सिखाया जाता है। और, इस विद्रूप को ‘सेक्युलरवाद’ कहा जाता है।

जेनेटिक्स विज्ञान में एक सिद्धांत है- थ्योरी ऑफ रीकैपिचुलेशन। अगर इस सिद्धांत को सरलता से व्याख्या करें तो यह कहता है कि किसी भी व्यक्ति का बेहतरीन या बदतरीन जीन कई पीढ़ियों के बाद दोबारा किसी संतति में प्रकट होता है। सच के प्रति तारिक फतह की समझ, निर्लिप्त भाव और अभिव्यक्ति के साहस को देखकर ऐसा लगता है कि निश्चित ही इस व्यक्ति के पूर्वज भारतीय अनुसंधान परंपरा के कोई महान तपश्वी ऋषि रहे होंगे। पद-प्रतिष्ठा-लॉबिंग से बुरी तरह संक्रमित समकालीन बौद्धिक दुनिया में बेलाग सच बोलना ऋषि बल के बिना संभव नहीं है। तारिक फतह पर फक्र कीजिए...।

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