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ऑस्ट्रेलिया का क्या होगा...

Bhola Tiwari Jan 18, 2020, 8:43 AM IST टॉप न्यूज़
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कबीर संजय

नई दिल्ली : मैंने कहीं पढ़ा था कि उनसे ज्यादा बहरा कोई नहीं होता जो सुनना नहीं चाहता। हमारी दुनिया भी शायद आज इसी रास्ते पर चल पड़ी है। प्रकृति लगातार खतरे की घंटी बजा रही है। लेकिन, हम उसे सुनना ही नहीं चाहते। 

लगभग दस दिन पहले तक ऑस्ट्रेलिया भयंकर आग की चपेट में था। पूरे महाद्वीप का एक बड़ा हिस्सा जल रहा था। माना जाता है कि यहां पर बेल्जियम के आकार से बड़ा भी बड़ा हिस्सा जलकर खाक हो चुका है। एक अरब से भी ज्यादा पशु-पक्षी जलकर मारे गए। आग से झुलसे जानवरों की दिल तोड़ने वाली तमाम तस्वीरों में से कुछ आपकी आंखों से भी जरूर गुजरी होंगी। यह आग इतनी बड़ी थी कि इसका धुआं ब्राजील तक पहुंच गया। धुएं से ऑस्ट्रेलिया का आसमान भी काला हो गया और यहां के शहरों में लोगों के लिए सांस लेना भी मुहाल हो गया। 

ऐसे समय में हर किसी की उम्मीदें सिर्फ आसमान से बरसने वाली बूंदों पर टिकी हुई थीं। लंबे इंतजार के बाद बरसात शुरू हुई और आग से राहत मिली। लेकिन, आग बुझाने के लिए आई बरसात भी अब अनियंत्रित हो गई है। ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिस्सों में इतनी ज्यादा बरसात हो रही है कि बाढ़ का खतरा पैदा हो गया है। दूर-दूर तक जमीन पानी में डूब गई है। दस हजार से ज्यादा लोगों को बाढ़ में निकाला गया है। दस दिन पहले तक आग बुझाने में जुटा ऑस्ट्रेलिया अब बाढ़ की मुसीबत से निकलने का उपाय ढूंढ रहा है। 

आखिर ऐसा क्यों है। इसमें ऐसा क्या खास है। दोस्तों, पर्यावरण संकट या जलवायु संकट का यह एक सबसे बड़ा संकेत है। मौसम चक्र बिगड़ने के चलते सर्दी-गर्मी और बरसात का चक्र भी बिगड़ जाता है। ठंड भी भीषण पड़ती है और गर्मियां भी भयंकर होती हैं। बरसात और हिमपात भी अपने साथ ऐसी मुसीबतें लेकर आती हैं जिनके बारे में पहले कभी सोचा भी नहीं गया होता। 


ऑस्ट्रेलिया ही नहीं दुनिया के तमाम हिस्से मौसम चक्र बिगड़ने के इन्हीं परिणामों को भुगत रहे हैं। लेकिन, इससे निपटने की किसी को फिक्र नहीं है। दुनिया भर की सरकारें पूंजीपतियों की गुलाम है और दिन रात इसी फिक्र में लगी रहती हैं कि कैसे उनका मुनाफा और बढ़े। उन्हें लोगों के जान-माल की कोई फिक्र नहीं है। पृथ्वी बरबाद होती है, तहस-नहस होती है तो उन्हें इससे कोई मतलब नहीं है। शायद वे सोचते होंगे कि सबकुछ बरबाद होने के बाद भी वे अपने लिए किसी न किसी स्वर्ग का निर्माण कर ही लेंगे। 

इसलिए उम्मीद अब जनता पर ही टिकी हुई है। पर्यावरण संकट के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानना और अपनी सरकारों को इसके लिए कदम उठाने के लिए मजबूर करने का काम भी जनता की जिम्मेदारी है। वर्ष 2019 में दुनिया भर में एक ही उद्देश्य को लेकर किया जाने वाला अगर कोई आंदोलन था तो वह पर्यावरण संकट का आंदोलन ही था। इस आंदोलन ने दुनिया भर के लोगों को एकजुट किया है। इस साल भी ऐसा ही कुछ रहने की उम्मीद है।

(दोनों तस्वीरें ऑस्ट्रेलिया की हैं। एक में बाढ़ में डूबे अपने घर को देखता एक कोआला है तो दूसरी में आग में कालकवलित हुए जानवरों की तस्वीर है।)

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