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क्या चंद्रशेखर आजाद बसपा सुप्रीमो मायावती का विकल्प बन सकते हैं?

Bhola Tiwari Jan 18, 2020, 8:26 AM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

 नई दिल्ली : अभी थोडे हीं दिनों पहले भीम आर्मी के चीफ चंद्रशेखर आजाद को दिल्ली पुलिस ने नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के खिलाफ दिल्ली की जामा मस्जिद में विरोध प्रर्दशन करने के कारण गिरफ्तार कर लिया गया था।चंद्रशेखर जमानत मिलने के चौबीस घंटे के अंदर फिर जामा मस्जिद पहुंच गए और उनका हजारों की भीड़ ने ताली और नारे लगाकर इस्तेकबाल किया।आपको बता दें कोर्ट ने उन्हें जमानत देते हुए कहा था कि उन्हें 24 घंटे के अंदर दिल्ली छोड़ना होगा।

एडिशनल सेशन जज कामिनी ने भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर आजाद को कुछ शर्तों के साथ जमानत दी है।कोर्ट ने उन्हें 16 फरवरी तक दिल्ली में किसी तरह का प्रर्दशन न करने के आदेश दिए हैं।दरअसल, गत 20 दिसंबर को भीम आर्मी ने सीएए के खिलाफ जामा मस्जिद से जंतरमंतर तक मार्च का आयोजन किया था और पुलिस से इसकी इजाजत नहीं ली थी।इस मामले में अरेस्ट किए गए अन्य 15 लोगों को 09 जनवरी को जमानत मिल गई है।जज ने आजाद को 25 हजार रूपये का जमानत बाँन्ड भी पेश करने को कहा।अदालत ने यह भी कहा कि सहारनपुर जाने से पहले आजाद जामा मस्जिद समेत दिल्ली में कहीं भी जाना चाहते हैं तो पुलिस उन्हें एस्कार्ट करेगी।जज ने कहा कि विशेष परिस्थितियों में विशेष शर्तों की जरूरत होती है।

विद्वान जज ने दिल्ली पुलिस को फटकार लगाते हुए पूछा कि किस कानून में लिखा है कि धार्मिक स्थान के बाहर प्रर्दशन नहीं किया जा सकता?कोर्ट ने कहा लोग शांति से कहीं भी प्रर्दशन कर सकते हैं।जामा मस्जिद पाकिस्तान में नहीं है जो वहां प्रर्दशन नहीं करने दिया जाए।शांतिपूर्ण तरीके से प्रर्दशन तो पाकिस्तान में भी होने दिया जाता है।

चंद्रशेखर आजाद ने जामा मस्जिद के पास लोगों को कहा कि हमारा आंदोलन तब तक संवैधानिक रूप से जारी रहेगा जब तक यह कानून वापस नहीं लिया जाता है।जो लोग मुल्क को बांटना चाहते हैं हम उनके खिलाफ हैं।

आपको बता दें चंद्रशेखर आजाद को 21 दिसंबर को दिल्ली पुलिस ने दरियागंज में हिंसा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार किया था।20 दिसंबर को दिल्ली में जामा मस्जिद परिसर में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ भीड़ जुटी थी और शाम होते होते दरियागंज में हिंसा भड़क उठी थी।

कौन है दलित नेता चंद्रशेखर आजाद?जिससे उ.प्र की योगी आदित्यनाथ की सरकार और दिल्ली पुलिस खार खाई हुई है।चंद्रशेखर आजाद का जन्म सहारनपुर में चटमलपुर के पास धडकूलि गाँव में हुआ था।जिले के एक स्थानीय काँलेज से उन्होंने कानून की पढ़ाई की है।वो पहलीबार 2015 में तब चर्चा में आए जब उन्होंने अपने मूल स्थान पर एक बोर्ड लगाया था, जिसमें "धडकाली वेलकम यू द ग्रेट चमार्स" लिखा था।उनके बोर्ड लगाने गाँव के दबंग ठाकुर उनसे नाराज हो गए।दोनों वर्गों में संघर्ष की शुरुआत का यही प्रमुख कारण बना।दलितों ने चंद्रशेखर आजाद और उसकी पार्टी भीम आर्मी का खूलकर सपोर्ट करना शुरू कर दिया।दलित मायावती से नाराज थे, इसका फायदा चंद्रशेखर को खूब मिला।2014 में गठित भीम आर्मी से दलित और शोषित समाज के लोग जुड़ते चले गए और अपने संगठन के बलपर चंद्रशेखर आजाद ने दबंग ठाकुरों का विरोध शुरू कर दिया था।05 मई 2017 को सहारनपुर से 25 किलोमीटर दूर शब्बीरपुर गाँव में दबंग राजपूतों और दलितों के बीच हिंसा हुई थी।इस हिंसा में कथित तौर पर दलितों के 25 घर जला दिये गए थे और एक शख्स की मौत हुई थी।इस हिंसा के विरोध में जब प्रर्दशन किया गया तो पुलिस ने 37 लोगों को जेल में डाल दिया और 300 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया।इस पूरे मामले के बाद चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में भीम आर्मी ने दिल्ली के जंतरमंतर पर विरोध प्रर्दशन किया था।यू.पी पुलिस ने एकतरफा कार्रवाई करते हुए चंद्रशेखर आजाद को विभिन्न धाराओं में गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया था।

चंद्रशेखर आजाद में लोग बहुजन समाज के लिए कांशीराम जैसा जज्बा और मुलायम सिंह यादव जैसा जुझारूपन देखते हैं।उन्होंने कम समय में हीं अपने संगठन को अपने बलबूते लोकप्रिय कर मायावती के पेशानी पे बल डाल दिया है।प्रतिद्वंदिता के बावजूद वे मायावती और बीएसपी के प्रति नर्म रूख अख्तियार करे हुऐ हैं कारण वे जानते हैं कि शुरुआती दिनों में मायावती के विरोध से दलित समाज उनसे नाराज हो सकता है।लोकसभा चुनाव में उन्होंने मायावती को कहा था कि अगर बसपा भीम आर्मी से गठबंधन कर चुनाव लडेगी तो उन्हें खुशी होगी।मायावती को उन्होंने अखिलेश यादव की तरह बुआ कहा था जिसके जवाब में मायावती ने कहा था कि वो किसी की बुआ नहीं हैं और चंद्रशेखर आजाद भाजपा से मिले हुए हैं।

चंद्रशेखर आजाद मुलायम सिंह जैसे जुझारू नेता साबित हो रहें हैं जो कांशीराम के दलित मिशन को आगे ले जाने में सक्षम दिख रहें हैं।मायावती ने तो कुर्सी के लिए बहुजन समाज का कई बार सौदा कर ये साबित कर दिया है कि उनके लिए दौलत और कुर्सी सबसे बड़ी चीझ है।दलित समाज बडी आशाभरी नजर से अपने युवा नेता चंद्रशेखर की तरफ देख रहा है,उम्मीद है वो भीमराव अंबेडकर और कांशीराम के मिशन को उनके मुकाम पर पहुँचाएंगे जो मायावती नहीं कर सकीं हैं।

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