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कवि और सामाजिक कार्यकर्ता अंशु मालवीय पर जानलेवा हमला

Bhola Tiwari Jan 17, 2020, 7:18 AM IST टॉप न्यूज़
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यश मालवीय

इलाहाबाद : हम कैसे हिंसक समाज में जी रहे हैं । कल रात 11बजे चार बाइक सवारों ने , एक एक बाइक पर जिनपर तीन तीन कथित भारत माता के बेटे सवार थे ,उन्होंने कवि और सामाजिक कार्यकर्ता अंशु मालवीय पर जानलेवा हमला किया । मोबाइल , नकदी , हेलमेट , गाड़ी की चाभी सब कुछ छीन लिया और यही रट लगाए रहे पकड़ो -पकड़ो , मारो -मारो यही है । ये कैसी व्यवस्था है जिसे कविता और सामाजिक कर्म से ही ख़तरा महसूस हो रहा है । शासन -प्रशासन शान से अराजक तत्वों को पाल पोस रहा है । नागरिकता लेने देने की राष्ट्रीय मुहिम में सुसभ्य नागरिक की जान ही ख़तरे में है । प्रदेश से लेकर देश तक सुशासन की महिमा गायी जा रही है। आम आदमी के ऊपर नंगी तलवारें लटक रही हैं । मेक इन इण्डिया का ज़ोर शोर से संकीर्तन चल रहा है । कोई कीमत नहीं रह गई है आदमी के ख़ून की । ज़िंदगियाँ दाँव पर हैं । रामराज्य की दुहाई देकर गुंडाराज प्रोत्साहित किया जा रहा है । अधर्म ही धर्म है । संस्कृति का चीर हरण ही सांस्कृतिक बोध है। भगवा और ख़ाकी का नंगा तांडव चल रहा है , उजली ख़ादी की सरपरस्ती में। बोलना गुनाह है और उस पर भी सच बोलना गहरा पातक। फैज़ अहमद फैज़ से लेकर अंशु मालवीय तक सभी निशाने पर हैं। अभिव्यक्ति और कविता का दम घोटा जा रहा है। तिरंगे के तीनों रंग असमंजस में हैं । धर्मचक्र पर कालिख पोती जा रही है । राष्ट्रवाद के एक सौ पाँच डिग्री के तेज़ बुखार में सारा देश तप रहा है । देशभक्ति और देशद्रोह की मनमाना व्यख्याएँ की जा रही हैं । अपराधियों के शिकार हुए स्वयं कवि अंशु मालवीय को अपराधी की तरह ट्रीट किया जा रहा है। यूँ तो आज मकर संक्रांति का दिन है ,पूरे शहर में धर्मध्वजा लहरा रही है ।मगर क्या कीजिएगा जब मानव धर्म ही ख़ून का प्यासा हो गया हो । फिर भी छोड़िए इस प्रलाप को । आइए अपने देश पर गर्व करें जो पूरी तरह से कश्मीर और गुजरात में तब्दील हो चुका है । असम से लेकर इलाहाबाद तक एक सी आँधी चल रही है । अच्छे दिन तो आ ही चुके थे , अब बहुत अच्छे दिन आ रहे हैं । इन अच्छे दिनों में सपने देखने पर पाबंदी है , बेहतर समाज के बारे में सोचना अपराध है। यह आँखें मूँदकर रहने का समय है । एक अघोषित आपातकाल लागू है । कथित लेखकों की कलमें व्यवस्था के पायजामे में नारे डाल रहीं हैं । सच की ज़बान पर छाले हैं । अंशु मालवीय जैसे जियालों ने सिर पर क़फ़न बाँध लिया है । इन्हें मौजूदा तंत्र से कोई खौफ़ नहीं है । आइनों में आँखें डालकर बात करने की इनमें कूवत है ,इसलिए बार बार निदा फ़ाज़ली का एक शेर याद आ रहा है --

जिन चिरागों को हवाओं का कोई ख़ौफ़ नहीं 

उन चिरागों को हवाओं से बचाया जाए

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