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निर्भया के बहाने...

Bhola Tiwari Jan 15, 2020, 7:10 AM IST कॉलमलिस्ट
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डॉ प्रवीण झा

(जाने-माने चिकित्सक नार्वे)

एक होता है- डायिंग डिक्लेरेशन। यानी मरते वक्त कोई व्यक्ति अगर गवाही दे, तो वह पत्थर की लकीर मानी जाती है। ऐसी वैश्विक अवधारणा है कि गोलोक जाते वक्त कितना भी बड़ा पापी, झूठ नहीं बोलेगा। हालांकि यह वैज्ञानिक तर्क नहीं है, फिर भी कानूनविदों ने इसे एक मजबूत तर्क माना है। और इसे बाकी सभी तर्कों पर भारी भी माना है, ख़ास कर अगर मजिस्ट्रेट के सामने रिकॉर्ड किया गया हो। जैसे निर्भया का केस भी मजबूत इसलिए बना कि वह मरते-मरते सब कह गयी। 

इसी तरह कोई भी स्त्री अमूमन अपना यौन-शोषित इतिहास यूँ ही हँसी-मजाक या लोकप्रियता के लिए कहेगी, इसकी संभावना कम होती है। अक्सर वह पत्थर की लकीर मान ली जाती है। विचलन हो सकते हैं, अगर कोई जीवन से भी महत्वपूर्ण लाभ हो। लेकिन, फिर भी, स्त्री के कथन का अपना वजन होता है। जो बाप अपनी बेटियों से बतियाते हैं, उन्हें कई बार यौन भले न सही, लेकिन कुछ शोषण की तस्वीर मिलेगी जब वह कहेगी कि ग़लती से हो गया। यह भी कह सकती है कि मेरी ग़लती से हो गया। वह छुपा लेगी। इसे अगर हम नहीं पढ़ पाते, तो यह हमारा दोष है।

मैंने अपने व्यवसाय में हज़ारों काग़ज पर हस्ताक्षर किए, जिसमें अभिभावकों ने मेरे साथ हस्ताक्षर किया कि हमने किसी तरह की भ्रूण जाँच नहीं की। इस हस्ताक्षर के बिना मैं अल्ट्रासाउंड नहीं कर सकता। यह एक कॉन्ट्रैक्ट है। सोचिए, स्त्री को जब उनके माता-पिता से ही अपना भ्रूण बचाने के लिए कॉन्ट्रैक्ट बनाना पड़ता है, तो एक बच्चे या वयस्क स्त्री की स्थिति की तो बात ही छोड़ दें। बाकी कहते रहिए बदचलन, त्रियाचरित्र। लेकिन अगर वह है भी, तो भी उन्हें यह कहने का अधिकार हम खो चुके हैं।

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