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मकर संक्रांति : सूरज रे, चलते रहना !

Bhola Tiwari Jan 15, 2020, 6:56 AM IST राष्ट्रीय
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ध्रुव गुप्त

पटना : मकर संक्रांति एक ऐसा पर्व है जो समूचे भारत में एक साथ मनाया जाता है। नामों भले अलग-अलग हों। दक्षिण भारत में इसे पोंगल. गुजरात और राजस्थान में उत्तरायणी, हरियाणा और पंजाब में माघी, असम में भोगाली बिहु, बंगाल में पौष संक्रांति तथा उत्तर प्रदेश-बिहार में इसे खिचड़ी कहा जाता है। यह सूर्य के धनु राशि से मकर राश‌ि में प्रवेश और उसकी दक्षिण से उत्तर दिशा में अर्थात उत्तरायण गति के प्रारम्भ का दिन है। महीने भर के खरमास के बाद इस दिन से मांगलिक कार्यों की शुरुआत होती है। ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा की गति के आधार पर महीने को दो भागो में बांटा गया है - कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष। इसी तरह सूर्य की गति के आधार पर वर्ष को दो भागो में बांटा गया है - उत्तरायण और दक्षिणायन। 

माना जाता है कि उत्तरायण में पृथ्वी प्रकाशमय होती है। दक्षिणायन में अंधकारमय। 'महाभारत' में इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त पितामह भीष्म ने सूर्य के उत्तरायण होने के बाद ही अपने शरीर का परित्याग किया था। कृष्ण ने उत्तरायण का महत्व बताते हुए 'महाभारत' में उत्तरायण के छह प्रकाशमय महीनों को दिव्य माना है। उन महीनों में शरीर का त्याग करने से व्यक्ति पुनर्जन्म के बंधन से मुक्त हो जाता है। इसके विपरीत दक्षिणायन के छह अंधकारमय महीनों में शरीर छोड़ने पर मनुष्य को पुन: पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ता है। एक पौराणिक कथा के अनुसार मकर सक्रांति के दिन ही गंगा ने स्वर्ग से धरती पर उतर कर सगर के सौ पुत्रों का उद्धार क‌िया था। कर्मकांड के अनुसार आज के दिन पवित्र नदियों में स्नान के बाद दान-पुण्य से श्रद्धालुओं को स्वर्ग की प्राप्ति होती है। 

हमारे जैसे लोगों को जिन्हें न ज्योतिष और खगोल शास्त्र की ज्यादा समझ है, न कर्मकांड में विश्वास और न इस खूबसूरत पृथ्वी पर जन्म-मरण के अनंत चक्र से मुक्ति अथवा मोक्ष की कोई महत्वाकांक्षा, सूर्य की उत्तरायण और दक्षिणायन गति से कोई फर्क नहीं पड़ता। हमारी इस पृथ्वी पर जो भी जीवन, सौंदर्य, रंग और रूप है वह सूर्य के कारण ही है। सूर्य न होते तो न यह पृथ्वी होती, न हम होते और न यह खूबसूरत प्रकृति। हमारे जीवन को कथित तौर पर प्रभावित करने वाले तमाम ग्रह उनसे ही टूटकर बने हैं। चांद के आकर्षण के पीछे भी सूर्य का ही तेज है। हमारे असंख्य काल्पनिक देवताओं के बीच सूर्य एकमात्र देवता हैं जो सदेह हमारे आगे उपस्थित हैं। सूर्य की हर गति, हर अंदाज, हर तेवर हमें प्यारा है। मकर संक्रांति का मतलब हमारे जैसे लोगों के लिए जीवनदाता सूर्य के प्रति आभार प्रदर्शन के अलावा सुबह के दही-चूड़ा-गुड़-सब्जी, दिन की तिलकुट-लाई-पतंगबाजी और रात की स्वादिष्ट खिचड़ी-घी-दही-पापड़ से ज्यादा कुछ नहीं। 

सूरज रे, चलते रहना !

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