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दान सिंह की चर्चा से यह फ़िल्मी कहानी फिर याद आयी

Bhola Tiwari Jan 14, 2020, 7:01 AM IST कॉलमलिस्ट
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डॉ प्रवीण झा

(जाने-माने चिकित्सक नार्वे)

दान सिंह की चर्चा से यह फ़िल्मी कहानी फिर याद आयी। इसमें शंकर महादेवन ने मराठी ब्राह्मण गायक का अभिनय किया है, और सचिन पिलगाँवकर (‘नदिया के पार’ वाले) ने खाँ साहब उस्ताद का। अब उस जमाने में तो संगीत की रंजिश कैसी चलती थी, यह तो मेरी किताब के पहले पन्ने से है ही। खाँ साहब हार गए, तो ख़ुदकुशी करने चले गए। उनको बचा तो लिया गया, लेकिन वह हार से घुटते रहे। बदला लेने के लिए उनकी बेग़म (साक्षी तंवर अभिनीत) ने पंडित जी को लड्डू में सिंदूर मिला कर खिला दिया, और पंडित जी की आवाज ही चली गयी।

अब पंडित जी के एक शिष्य खाँ साहब से बदला लेने जाते हैं, लेकिन वह तैयार गायक तो होते नहीं हैं। हार जाते हैं और शर्त के अनुसार उनको खाँ साहब का ग़ुलाम बनना पड़ता है। वहाँ वह बर्तन माँजते हुए खाँ साहब को सुनते रहते हैं, लेकिन शर्त के अनुसार गा नहीं सकते। खाँ साहब को सुनते सुनते ही वह ऊँचे दर्जा का संगीत सीख जाते हैं। एक दिन आँगन में गाने लगते हैं और शर्त हार जाते हैं।

दरबार में उनका सर कलम करने के लिए बुलाया जाता है। वह कहते हैं कि मरने से पहले एक बार गाने दिया जाए। उनकी गायकी खत्म होते ही सब अभिभूत हो जाते हैं। एक आध्यात्मिक शांति पसर जाती है। उस्ताद के हाथ का खंजर रुक जाता है कि ऐसी रूहानी आवाज़ का भला कोई कैसे सर कलम करे?

यह तो थी मराठी फ़िल्म (काट्यार करजत घुसली) की कहानी। अब असल ज़िंदगी में लौटता हूँ। 

जयपुर के दान सिंह जब बच्चे थे, तो उनके पिता ऐसी ही एक महफ़िल में हार गए। दान सिंह 10-12 साल के थे, लेकिन हारे हुए पिता को देख क्रोधित हो गए, और मंच पर आ गए। कहा कि मैं गाऊँगा। मुझे हराइए! सब हँसने लगे कि यह बच्चा क्या हराएगा? 

फिर दान सिंह ने गाया और तालियों की गूँज से पूरी महफ़िल रौनक हुई। आखिर इस बच्चे को विजेता घोषित किया गया।

यही दान सिंह बाद में खेमचंद प्रकाश के शिष्य बने और साठ के दशक के फ़िल्मी संगीतकार भी। इन्हीं के संगीत में मुकेश का गाया गीत है, जो इनके जीवन पर भी सही बैठता है- ‘ज़िक्र होता है जब क़यामत का, तेरे ज़लवों की बात होती है’

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