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Bhola Tiwari Jan 14, 2020, 6:51 AM IST कॉलमलिस्ट
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कबीर संजय

नई दिल्ली : धरती की जिंदगी के हिसाब से वर्ष 2019 बेहद मनहूस साबित हुआ है। इस साल ने धरती को ऐसे बहुत सारे घाव दिए हैं, जिन्हें भूल पाना संभव नहीं। इसी साल ने एमेजॉन के जंगलों में अब तक की सबसे भयंकर आग देखी। तो इसी साल ने ऑस्ट्रेलिया के जंगलों को धू-धू करके जलते देखा। दोनों घटनाओं के कारकों में यूं तो थोड़ा अंतर है। लेकिन, इनके परिणाम ऐसे हैं, जिन्हें हमारी आगे की कई पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा। 

पृथ्वी पर जीवन कई संयोगों से पैदा हुआ है। अगर उनमें से एक भी संयोग अनुपस्थित होता तो शायद जीवन नहीं पनपता। हर कारक ने अपनी बराबर की भूमिका निभाई है। अभी भी इनमें से किसी एक के कम होने का मतलब सर्वनाश के अलावा कुछ नहीं है। धरती जब से बनी है, तब से उसका कुछ खास तापमान रहा है। रोज सुबह से सूरज धरती को गरम करने लगता है। रोज रात उसे ठंडा करती रहती है। जहां कहीं भी सूरज की रोशनी सीधी नहीं पड़ती, वहां पर तापमान कम होता है। जहां कहीं भी धरती की सतह एक खास ऊंचाई तक पहुंच जाती है, वहां पर बर्फ जम जाती है। यही जमा बर्फ धीरे-धीरे रिस-रिस कर न जाने कितनी नदियों को जन्म देता है। यही नदियां जब लहराते-बलखाते हुए चलती हैं तो न जाने कितनी संस्कृतियों-सभ्यताओं को जन्म देती हैं, पैदा करती हैं। 

थोड़े बहुत हेर-फेर के साथ धरती का क्रम लगभग सामान्य ही चलता रहा है। परिवर्तन आए भी तो धीरे-धीरे उसके अनुसार जीवन ने भी बदलाव कर लिया। लेकिन, बीते तीन सौ सालों में धरती ने कुछ ऐसे परिवर्तन देखे हैं, जिसकी मिसाल शायद ही पहले कहीं मिली हो। 

इंसान पहला जीव है जिसने आग पर नियंत्रण रखना सीखा। आग ने ही इंसान को इंसान बनाया है। लेकिन, आज इतनी ज्यादा आग जलाई जा रही है, ईंधन जलाया जा रहा है कि धरती का तापमान लगातार गरम होता जा रहा है। एमेजॉन के जंगलों को साफ करके ब्राजील वहां से डॉलर पैदा करना चाहता है। पूरे साल ब्राजील के जंगल धधकते रहे। यहां तक कि उसके धुएं से आसमान काला हो गया। ऑस्ट्रेलिया में पिछले कई सालों से बारिश नहीं होने के चलते नमी की मात्रा लगातार कम होती जा रही है। सूखे का शिकार होने वाले जंगल झाड़ों में लगी आग इस कदर बेकाबू हुई कि उसे बुझाने मे इंसानी प्रयास छोटे पड़ गए। माना जाता है कि इस आग में करोड़ों पशु-पक्षियों की मौत हो गई। यहां तक कि कुछ की प्रजाति के समाप्त होने का भी संकट पैदा हो गया है। यही वो साल है जब ग्लैशियरों के गायब होने की बाकायदा घोषणा हुई और कुछ के तो अंतिम संस्कार भी लोग जुटे। 

यही वह वर्ष है जिसने यूरोप में लू चलते हुए देखा। यही वो वर्ष है जब हमारे यहां लोगों को लू से बचाने के लिए धारा 144 तक लगानी लड़ी। यही वह वर्ष है जिसने पहले तो भीषण गर्मी झेली फिर भयंकर सर्दियों का सामना किया। लोगों की जान लेने वाला सूखा आया तो लोगों को डुबाने वाली बाढ़ भी आई। 

पूरे साल में प्रकृति का कहर ऐसे ही अचानक से टूटता रहा। 

हालांकि, यह साल कई शुभ संकेत भी ले आया है। वर्ष 2019 का साल ही ऐसा है जब पूरी दुनिया में क्लाईमेट क्राइसिस को इतनी गंभीरता से समझा जाने लगा है। इस पूरे साल में अगर पूरी दुनिया के अलग-अलग देशों में एक साथ चलने वाला कोई आंदोलन हुआ है तो वह है क्लाईमेट क्राइसिस का आंदोलन। इस आंदोलन में अलग-अलग देशों के अलग-अलग शहरों में लोगों ने प्रदर्शन किया। इस समस्या ने लोगों को एकजुट किया है। नए तरीके से सोचने के लिए बाध्य किया है। 

इसे एक नई शुरुआत कहा जा सकता है। धरती बार-बार चीख-चीख कर संकेत कर रही है। अच्छी बात यह है कि आम लोगों द्वारा इस संकट को समझने की शुरुआत की जा रही है। जबकि, सरकारें अभी भी पूंजीपतियों के मुनाफे के जाल से निकलने को तैयार नहीं हैं। 

नोटः ऑस्ट्रेलिया में लगी आग को लेकर कुछ गलत रुख भी देखने को मिले। ऑस्ट्रेलिया में बसे कुछ भारतीय जहां इस मामले में सरकार का बचाव करते दिखे। वहीं, ऑस्ट्रेलिया में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है जो आग पर काबू नहीं पाने और क्लाईमेट क्राइसिस को लेकर पर्याप्त कदम नहीं उठाने को लेकर अपनी सरकार से इस्तीफा भी मांग रहे हैं। 

(तस्वीर ऑस्ट्रेलिया में लगी आग की है और इंटरनेट से ली गई है।)

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