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चीनी यात्री ह्वेनसांग की भारत यात्रा...

Bhola Tiwari Jan 14, 2020, 6:43 AM IST कॉलमलिस्ट
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एसडी ओझा

 ह्वेनसांग का जन्म चीन के लुओयंग में सन् 602 ईश्वी में हुआ था . चार भाई बहनों में ह्वेनसांग सबसे छोटे थे . अपने प्रतिभा के बल पर ह्वेनसांग मात्र 13 साल की उम्र में मठाधीश बन गए थे . बौद्ध पाठ्यों में मतभेद व भ्रम होने के कारण वे भारत आकर मूल पाठों का अध्ययन करना चाहते थे . सन् 626 ईस्वी में ह्वेनसांग ने संस्कृत का गहन अध्ययन कर इस भाषा में पारंगत हुए थे .

सन् 630 ईश्वी में ह्वेनसांग भारतीय उप महाद्वीप में खैबर के दर्रे से होते हुए गांधार के पुरुषपुर (पेशावर) पहुँचे . उस समय भारत में हर्षवर्धन का शासन था .ह्वेनसांग ने अपनी पुस्तक सी - यू - की में हर्ष वर्धन कालीन सामजिक , आर्थिक , धार्मिक व सांस्कृतिक अवस्था विशद विवेचित वर्णन किया है .

यात्रा करते करते सन् 645 में ह्वेनसांग अपने अंतिम पड़ाव लुम्बिनी पहुँचे . वहाँ से वे 600 से अधिक हीन यान व महायान के ग्रन्थ , 7 मूर्ति व 100 से अधिक लेख अपने साथ ले जाने की तैयारी की . अबकी यात्रा समुद्र मार्ग से करने की सोची . एक बड़ी नाव में सारी किताबें मूर्तियाँ आदि लादकर ह्वेनसांग समुद्र मार्ग से चीन (अपने देश ) के वास्ते निकल पड़े .साथ में एक मदद के लिए बौद्ध भिक्षु भारतीय बालक भी था . बीच रास्ते में भार के कारण नाव डगमगाने लगी . ह्वेनसांग ने भार कम करने के लिए कुछ किताबें समंदर में फेकना चाहा , पर ऐसा करते हुए उन्हें बहुत दुःख हो रहा था . यह देख कर बौद्ध भिक्षु बालक खुद भार कम करने के लिए समन्दर में कूद पड़ा . भारतीय बौद्ध भिक्षु बालक का यह त्याग ह्वेनसांग को द्रवित कर गया . उन्होंने अपनी पुस्तक सी - यू- की में इस घटना का जिक्र कर उस बालक को श्रद्धांजलि अर्पित की है .

चीन पहुँच कर ह्वेनसांग ने सभी पुस्तकों का चीनी भाषा में अनुवाद किया . जब कुछ बौद्ध धर्म की पुस्तकें भारत में अनुपलब्ध हो गईं तो उसी अनुवाद के माध्यम से उन पुस्तकों का पुनर्लेखन किया गया .

5 फरवरी सन् 664 ईश्वी को ह्वेनसांग की मृत्यु हो गई . उनकी खोपड़ी को को सम्भाल कर रख लिया गया . जब दलाई लामा ने भारत में शरण ली तो वह खोपड़ी भी भारत लाए और भारत सरकार को उपहार स्वरूप भेंट कर दिया . आज भी उनकी वह खोपड़ी पटना के राष्ट्रीय संग्रहालय में सुरक्षित रखी गई है , जो अपनी विद्वता की कहानी कह रही है .

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