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नेपाल का माओवाद

Bhola Tiwari Jan 10, 2020, 8:02 AM IST टॉप न्यूज़
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एसडी ओझा 

 नेपाल के माओवादी प्रमुख पुष्प कमल दहल उर्फ़ प्रचण्ड ने कहा है कि जब नेपाल में हम भूमिगत थे तो हमारा भारत के माओवादी नेताओं के साथ वैचारिक स्तर पर सम्बन्ध कायम था . वो हमें दक्षिण पंथी व उग्रवाद के समर्थक समझते थे और हम उन्हें कठमुल्ला व किसी निर्णय पर न पहुँचने वाला समझते थे . यदि भारत के माओवादियों को अपने सिद्धान्त को अमली जामा पहनाना है तो हमारी राह पर हीं चलना होगा . 

ज्ञातब्य है कि नेपाल में 13 साल तक माओवादियों ने भूमिगत रहकर सशस्त्र संघर्ष किया , परिणाम स्वरूप लगभग 15 हज़ार लोग इस संघर्ष में मारे गए. कितने विकलांग हुए . इसका कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है . मैंने खुद मिर्थी ITBP की अग्रिम चौकियों पर जाते हुए बुद्धि , छियालेख से काली नदी के पार उनके कैंप लगे हुए देखे थे .

बात सन् 2003 की है , जब मैं असिस्टेंट कमांडेंट इंजीनयर था . उस समय मैं गर्ब्यांग पोस्ट पर Sos mess का निर्माण करवा रहा था . गर्ब्यांग पोस्ट के नजदीक से एक रास्ता काली नदी के पार नेपाल के छांगरू गाँव तक जाता है . उस गाँव में गर्ब्यांग गाँव वालों के बहुत से रिश्ते हैं . गर्ब्यांग और छांगरू को जोड़ने के लिए काली नदी पर एक पुल बना हुआ है , जिसे सीता पुल कहते हैं . उस पार के पुल के किनारे नेपाल पुलिस की चेक पोस्ट थी , जहां से पुलिस वाले फ़ोन करने के लिए हमारी पोस्ट पर आया करते थे . उनमें एक सब इंस्पेक्टर जोशी थे , जिनसे हमारी अक्सर बात चीत होती रहती थी . उन्हीं के मार्फत मुझे पता चला कि ओझा लोग नेपाल में भी होते हैं .

गर्ब्यांग पोस्ट पर मेरा काम खत्म हो गया था . मैंने जरूरी किये गए पैमाईशों की टेस्ट चेक कर ली थी . जिस दिन मुझे चलना था उसी दिन पता चला कि नेपाली पुलिस चेक पोस्ट पर माओवादियों ने रात को हमला कर दिया था , जिसमें सब इंस्पेक्टर जोशी व दो सिपाहियों की मौत हो गई है . एक सिपाही जिन्दा बचा था , वह भाग कर सूचना देने हमारी पोस्ट पर आया है . एक घायल सिपाही भी है , जिसे गाँव वालों की मदद से अभी लाया जा रहा है . मैं PWD हट में नाश्ता कर रहा था ( उस समय तक गर्ब्यांग में ऑफिसर मेस नहीं बना था ) . जल्दी से नाश्ता छोड़ बाहर आया . 

जो सिपाही भागकर आया था वह बेहद डरा हुआ था. उसे मैंने चाय पानी पिलाने को कहा . घायल सिपाही के पाँव में खुखरी से वार किया गया था . उसकी रिश्तेदारी बुद्धि गाँव में थी . मेडिक्स भी नया था . उसने किसी प्रकार मरहम पट्टी की . मैंने उसे डेकाड्रान इंजेक्शन लगाने के लिए कहा . पोस्ट कमांडर को बटालियन मुख्यालय भेजने के लिए मेसेज बना कर दिया . Sos मेस निर्माण कर रहे मजदूरों से अनुरोध किया की उसे बुद्धि गाँव तक छोड़ दें . परोपकार का काम समझ वे राजी हो गए . 

बुद्धि पहुचने पर वहाँ पहले से खबर थी . घायल सिपाही के रिश्तेदार पहले से खड़े थे . उन लोगों ने उसे तरल खाना खिलाया . रास्ते में पहाड़ से टपके पानी से उसका बचाव हो सके - इसके लिए उसके इर्द गिर्द बरसाती प्लास्टिक लपेट दी गई .जो मजदूर लेके आए थे , उन्हीं से आगे ले जाने के लिए मजदूरी तय कर उसे धारचूला रवाना किया गया . 

एक साल बाद सन् 2004 में जब मैं कमांडेंट शालिग्राम साहब के साथ गर्ब्यांग पोस्ट पर पहुँचा तो पता चला कि नेपाली चेक पोस्ट पर अब माओवादियों का कब्जा हो गया है . वो अब आने जाने वालों से उगाही कर रहे हैं . जब हम दूसरे दिन गुंजी की तरफ जा रहे थे तो सीता पुल पर एक लड़का मिला जो छांगरू से अपने मामा से मिलकर आ रहा था . उसने बताया कि पुल पर एक माओवादी बैठा हुआ है जो उससे उसके बारे में एवम् भारतीय चौकी के बारे में पूछ रहा था . आगे चलने पर हमें पार एक माओवादी नज़र आया जो हथियार से लैस था और पेड़ों के झुरमुटों से निकल रहा था . 

उसी माओवादी पुष्प कमल दहल उर्फ़ प्रचण्ड को नेपाली जनता ने इस आश्वासन पर कि वो नेपाल में अमन शान्ति कायम करेंगे प्रचण्ड बहुमत दिया था . सरकार बनाते हीं वो माओवादियों को नेपाली सेना में भर्ती कराने के लिए सेना पर दबाव बनाने लगे . ये अच्छा हीं हुआ कि उस समय के सेना प्रमुख ने उनकी बात नहीं मानी . मजबूर हो कर पुष्प कमल दहल को त्याग पत्र देना पड़ा . दुबारा जब चुनाव हुआ तो पुष्प कमल दहल उर्फ़ प्रचण्ड तीसरे स्थान पर आ गए . 

कोठे पर रहने वाले अब जीने पे आ गए .

आहिस्ता आहिस्ता अपने करीने पे आ गए .

आज प्रचण्ड जब अपने हीं देश में अस्तित्व हीन हो गए हैं , जिनका खुद का लड़का विवाहेत्तर सम्बन्ध के चलते पार्टी से निलम्बित चल रहा है और जब नेपाल में एक सर्वमान्य संविधान बनने के कगार पर है तो ऐसे में प्रचण्ड का भारतीय माओवाद को नेपाली माओवाद के पुरानी राह पर चलने का परामर्श देना हास्यास्यपद लगता है .

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