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क्या भाजपा राज ठाकरे की पार्टी "मनसे" से गठबंधन करेगी?फडणवीस और राज ठाकरे के बीच गुपचुप मुलाकात

Bhola Tiwari Jan 09, 2020, 8:26 AM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

नई दिल्ली : कल महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और एमएनएस चीफ राज ठाकरे के बीच बंद कमरे में दो घंटे बात हुई।दोनों के बीच क्या बातचीत हुई इसका खुलासा तो नहीं हुआ है मगर दोनों के बीच संभावित गठबंधन की बात कही जा रही है।लगभग हासिये पर आ चुके राज ठाकरे भी चाहते हैं कि मृतप्राय हो चुकी पार्टी को पुनर्जीवित किया जाय।राज ठाकरे ऐसा अकेले नहीं कर सकेंगे ये तो तीन विधानसभा चुनाव में अकेले लड़कर राज ठाकरे ने देख लिया है।उन्हें मजबूत सहयोगी वो भी उनकी विचारधारा का चाहिए और भाजपा को शिवसेना की काट चाहिए।अगर दो दिलजले एक दूसरे के सहयोगी बन जाते हैं तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है।

व्यक्ति का कद कितना भी बडा हो जाए मगर वह पार्टी से ऊपर कभी नहीं हो सकता।आप कल्याण सिंह का उदाहरण देख सकते हैं।बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद उनका कद अटल-आडवाणी के बराबर पहुंच चुका था।पार्टी में उन्होंने बगावत ये सोचकर करी थी कि वे अपने दम पर अपनी पार्टी को सत्ता में लाएंगे, मगर उनका ये अभिमान विधानसभा चुनाव में टूट गया।उन्हें समझ में आ गया था कि पार्टी का झंडा और समर्पित कार्यकर्ता हीं पार्टी को बनाते-बिगाडते हैं।वो अब उनके साथ नहीं हैं।अपने प्रतिद्वंद्वी मुलायम सिंह यादव के साथ गठबंधन कर चुनाव लडा फिर वे पराजित हुऐ।कारण ये था कि हिंदू जनमानस उन्हें मुलायम सिंह के साथ नहीं देखना चाहता था।अंत में उन्हें अपने कुनबे के साथ भाजपा में आना हीं पडा।

राज ठाकरे की भी यही दशा है,जबतक वे शिवसेना में थे बालासाहेब ठाकरे के छत्रछाया में रहे खूब फले-फूले मगर पार्टी से बाहर आने के बाद उनकी स्थिति ढाक के तीन पात जैसी हो गई।जनता ने उन्हें बिल्कुल नकार दिया है, कारण वही जो कल्याण सिंह के साथ था।

अब शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र विकास अघाडी की सरकार चला रहे हैं।राज ठाकरे के पास एक सुनहरा मौका आया है, वो भाजपा से गठबंधन कर अपनी पार्टी को फिर से खडा करना चाहते हैं।भाजपा और मनसे दोनों हिंदूवादी पार्टी है और दोनों वैचारिक रूप से एक दूसरे के सहयोगी बन सकते हैं और भाजपा उद्धव ठाकरे की काट के रूप में राज ठाकरे को आगे कर सकती है।राज ठाकरे फायरब्रांड नेता रहें हैं और भाजपा के सहयोग से वे शिवसेना का बडा नुकसान भी कर सकते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है।भाजपा का शीर्ष नेतृत्व और देवेंद्र फडणवीस शिवसेना का विकल्प तलाश रहें हैं।उन्हें लगता है कि कट्टर हिंदू जो अभी तक शिवसेना के साथ थे मनसे से जुड सकते हैं।राज ठाकरे बीजेपी के साथ हाथ मिलाकर महाविकास आघाडी के जवाब में हिंदुत्व विचारधारा की राजनीति की जमीन तैयार कर सकते हैं।

महाराष्ट्र की राजनीति पर पैनी नजर रखने वाले पत्रकारों का कहना है कि राज ठाकरे महाअधाडी के शपथ ग्रहण समारोह में काले कपडे एक सुनियोजित प्लान के तहत पहन के आज थे जो ये दर्शा रहा था कि शिवसेना हिंदुत्व को छोड़कर कांग्रेस जैसी मुस्लिमपरस्त पार्टी के गोद में जा बैठी है।

राज ठाकरे अपनी पार्टी के झंडे में भी बदलाव कर रहें हैं।अभी मनसे के झंडे में केसरिया, हरा और नीला रंग था मगर अब शायद उनका झंडा केसरिया रंग में रंगा होगा, जो हिंदूत्व का प्रतीक बन गया है।राज ठाकरे ने 23 जनवरी को एक बड़ी जनसभा करनेवाले हैं,जिसमें वे कुछ महत्वपूर्ण घोषणा करेंगे।भाजपा और शिवसेना का गठबंधन टूटना मनसे के लिए संजीवनी बन सकता है ये राज ठाकरे अच्छी तरह समझ सकते हैं यद्यपि लोकसभा चुनाव में राज ठाकरे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कडी आलोचना की थी।एक समय राज ठाकरे नरेंद्र मोदी के बेहद करीबी माने जाते थे और ये व्यक्तिगत संबंध पार्टी के पुनरूद्धार में काफी महत्वपूर्ण साबित होने वाला है।

आपको बता दें राज ठाकरे बालासाहेब ठाकरे के भाई श्रीकांत ठाकरे के पुत्र हैं।बचपन से हीं बालासाहेब ने उन्हें अपने पुत्र की तरह पाला और राजनीति का ककहरा उन्होंने हीं सिखलाई थी।बालासाहेब ठाकरे ने शिवसेना 1966 में बनाई और सत्तारूढ़ होने का सौभाग्य पहली बार 1995 में मिला।ये चुनाव शिवसेना और भाजपा दोनों मिलकर लड़े थे और शिवसेना बडे भाई की भूमिका में था।महाराष्ट्र की जनता चाहती थी कि बालासाहेब ठाकरे मुख्यमंत्री बनें मगर उन्होंने ये प्रस्ताव ठुकरा दिया और अपने साथी मनोहर जोशी को मुख्यमंत्री बनाया।शिवसेना की सफलता के पीछे युवा नेता राज ठाकरे का महत्वपूर्ण योगदान रहा।उन दिनों राज ठाकरे के पास स्टूडेंट यूनियन की कमान थी।वे और उनके युवा साथियों ने खूब प्रचार किया।दरअसल बालासाहेब उन्हें हर रैली और मीटिंग में साथ ले जाते थे, इस वजह से उनकी भाषण देने की शैली चाचा बालासाहेब से खूब मिलती भी थी।चाल-ढाल में भी वे बालासाहेब जैसे हीं लगते।शिवसेना में वे बालासाहेब ठाकरे के वास्तविक उत्तराधिकारी थे,ये सभी जानते थे।

1994 में बालासाहेब की पत्नी मीना ताई के हस्तक्षेप से शिवसेना में उद्धव ठाकरे की एन्ट्री होती है।वह चाहतीं थीं कि बालासाहेब का उत्तराधिकारी उद्धव बने।एक तरफ प्यारा भतीजा था दूसरी तरफ पत्नी और बेटा।जैसा कि हर घर में होता है बालासाहेब ठाकरे ने पत्नी की जिद्द के आगे घुटने टेक दिए और उद्धव को आगे करने लगे थे।1997 के बीएमसी चुनाव की जिम्मेदारी उद्धव ठाकरे को मिली और उन्होंने हीं टिकट बांटे।राज ठाकरे के समर्थकों को किनारा कर दिया गया।राज ठाकरे ने एक इंटरव्यू में ये स्वीकार भी किया कि हाँ मैं नाराज हूँ।शिवसेना बीएमसी चुनाव में जीत गई और सफलता का पूरा श्रेय उद्धव ठाकरे को मिला।

बालासाहेब ठाकरे उनके बाहर बयान देने पर काफी नाराज थे और उन्होंने पहली बार अपने भतीजे को कडी फटकार भी लगाई।राज ठाकरे ये समझ गए थे कि अब शिवसेना में उनका रहना मुश्किल है।2002 के बीएमसी चुनाव में भी उद्धव की हीं चली,राज ठाकरे को एक सुनियोजित तरीके से शंट किया जा रहा था।2003 में महाबलेश्वर में पार्टी के अधिवेशन में उद्धव ठाकरे को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष चुन लिया गया, बालासाहेब के आदेश पर राज ठाकरे ने उनका नाम प्रस्तावित किया, जिसपर सर्वसम्मति से मुहर लग गई।

2004 का चुनाव उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में लडा गया और उसमें पार्टी की बुरी हार हुई।कद्दावर नेता नारायण राणे उद्धव ठाकरे से बेहद नाराज थे और उन्होंने 2005 में बडी बगावत कर 12 विधायकों के साथ शिवसेना छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए।राज ठाकरे ने भी 2006 में शिवसेना छोडकर अपनी पार्टी बना ली।

राज ठाकरे में वो सबकुछ था जो बालासाहेब ठाकरे में था मगर वो अपनी पार्टी को वो मुकाम न दिला सके जिसके वे वास्तविक हकदार हैं।शिवसेना-भाजपा गठबंधन टूटने के बाद आज फिर एक बार राज ठाकरे को मौका मिला है और वो इस मौके को हर हाल में भुनाना चाहते हैं।बीजेपी के सहयोग से उसे संजीवनी मिल सकती है और राज ठाकरे की पार्टी मनसे हो सकता है कि शिवसेना का विकल्प बन जाए।

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