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सरकार को मुमताज़ मिले या नहीं मगर महल जरूर बनायेंगे....

Bhola Tiwari Jan 09, 2020, 8:07 AM IST टॉप न्यूज़
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दिनेश मिश्रा

जमशेदपुर : 9 अप्रैल, 1958 के दिन बिहार विधानसभा में 1958-59 के बजट प्रस्ताव पर बहस चल रही थी. वक्ता थे रामबृक्ष बेनीपुरी जी. उन्होनें उस समय की ब्यूरोक्रेसी और सरकार पर बड़ा महीन कटाक्ष किया था. पढ़िए.

“इतिहास में जहांगीर और शाहजहाँ दोनों ही बादशाह रह चुके हैं. दोनों बाप बेटे थे. वे अलग अलग हुए थे लेकिन यहाँ साथ साथ चल रहे हैं. हमारे शासक जहांगीर और शाहजहाँ भी हैं. जहांगीर के विषय में एक कहावत है जो इस प्रकार है,

“हो आध पाव कबाब मुझको इक पाव शराब हो,

ये सल्तनत नूरजहाँ की खूब हो या खराब हो.” 

“हमारे इलाके की भी यही हालत है. इनके नूरजहां सिविल सर्विसेज़ वाले हैं. एक विचित्र बात यह है कि उस नूरजहाँ के पहले पति दूसरे थे और इस नूरजहाँ के भी पहले पति ब्रिटिश मास्टर्स थे. और जिस तरह नूरजहाँ अपने पहले पति को छोड़ कर जहांगीर के पास आई थी उसी तरह ये सिविल सर्विसेज़ वाले भी अपने पहले मास्टर्स को छोड़ कर मौजूदा मालिक के पास आये हैं. वह नूरजहाँ चाहती थी कि हमारा जहांगीर जिंदा रहे लेकिन यह नूरजहाँ चाहती है कि रोज़-रोज़ हमारा जहांगीर बदले.


“उसी तरह शाहजहाँ की भी बात है. शाहजहाँ महल बनाने का बड़ा शौकीन था. इस मौजूदा सरकार की भी यही हालत है. इस पुराने सेक्रेटेरिएट को आप देखते हैं. इस सरकार को मुमताज़ मिले या नहीं मगर महल जरूर बनायेंगे. नया सेक्रेटेरिएट बनाया गया है और उसमें रंग-बिरंगे पत्थर न मालूम कहाँ कहाँ से लाये गए हैं. और आपने यहाँ अच्छी लकड़ी न होने की वजह से दूसरे देशों से भी मंगाई है. मुझे इस तरह की उम्मीद नहीं है कि शाहजहाँ की तरह इनकी भी कब्र इस ताजमहल में बनेगी लेकिन मुझे डर है कि शायद मड़वा के अन्दर मौत ही न हो जाय क्यों कि जब तक कलश बंधता है तब तक नीचे से नोनी भी लगती जा रही है.”

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