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क्यों न आपको, रंगा बिल्ला कहें..

Bhola Tiwari Jan 06, 2020, 4:15 PM IST टॉप न्यूज़
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रमेश कुमार रिपु

रायपुर : फै़ज कम्युनिस्ट थे। वे कम्युनिस्ट इसलिए हो गये कि वे पाकिस्तान में थे। पाकिस्तान में फौज का शासन होता है। सरकार तो रबड़ स्टाम्प होती है। फैज़ सरकार से नाखुश थे। और सरकार विरोधी नज़्म लिख दिये। हम देखेंगे ..लाजिम है। फ़ैज की यह नज़्म एंटी इंडिया और हिन्दू विरोधी है। हमारे यहां विपक्ष और जनता बरसों से एक ही नारा लगाती आई है,जो सररकार निकम्मी है,वो सरकार बदलनी है। ताज्जुब होता है कि हमारे यहां के कथित कम्युनिस्ट भारत को पाकिस्तान बताने में लगे हैं। देश में जियाउलहक का शासन नहीं है। पर जियाउलहक के समर्थक हैं। जबकि सरकार की सोच न तो पाकिस्तानी है और न ही तालिबानी। कुछ कथित कम्युनिस्ट सरकार को पाकिस्तानी बताने और फ़ैज की नज़्म को हवा देने में लगे हैं। फै़ज से परेशानी नहीं है,परेशानी तो अहमद से है।

कथित कम्युनिस्ट में कितने लोगों ने अपना नाम रंगा बिल्ला रख लिया है? कोई बतायेगा? अपना पता बदल लिया है। तालिबान या फिर पाकिस्तान लिखा दिया है। जो हिन्दुस्तानी अहमद हैं, उन्हें तो कोई परेशानी नहीं है। परेशानी तो पाकिस्तानी अहमदों को है,और देश को उनसे है। जेएनयू हो या फिर जामिया हो। उनके नारे और उनकी हरकतें बताती हैं कि, वे पाकिस्तानी कम्युनिस्ट हैं। उनकी सोच में तालिबान है। उनके विचारों में पाकिस्तान है। नागरिकता कानून के खिलाफ प्रदर्शन के नाम पर जिस तरह से इस्लामिक नारों का इस्तेमाल हो रहा है, खासकर अल्पसंख्यक संस्थानों में , ये न केवल चिंतनीय है बल्कि,जायज भी नहीं है। अरूंधति राॅय,जावेद अख्तर,और फरहान अख्तर जैसे लोग, शोहरत के नाम पर कलंकित हैं।

वे कौन लोग हैं जो देश की शिराओं में देश भक्ति का लहू नहीं बहने देना चाहते हैं?वो रंगा, बिल्ला ही हैं। देश के रंगा बिल्ला हैं। समाज के रंगा, बिल्ला हैं। विचारों के रंगा, बिल्ला हैं। सोच के रंगा, बिल्ला हैं। यह सवाल तब, तब उठेगा, जब, जब पाकिस्तानी अहमदों के खिलाफ सरकार अपनी आंखें तनेन करेगी। उन्हें डर लगने लगता है। अपने ही देश से। अपने ही लोगों से। अपने चाहने वालों से। लेकिन वे यह क्यों भूल जाते हैं कि, वे कितनी ही बार देश को डरा चुके हैं,अपनी हरकतों से। मुंबई ब्लास्ट हो या फिर संसद भवन कांड, अथवा पुलवामा कांड। तब तो कोई आमिर या फिर शाहरूख अथवा कथित समाजिक कार्य कर्ता अरूंधति राॅय जैसे आकर नहीं कहते कि ऐसे लोगों से डर लगता है। अपना नाम रंगा,बिल्ला बताएं और अपने घर का पता प्रधान मंत्री के घर का बतायें। व्यक्ति की गरिमा को भले नजरअंदाज करें लेकिन, प्रधान मंत्री के पद की गरिमा के साथ ऐसी भद्दी भाषा का इस्तेमाल करने वाले किस तरह के वामपंथी है? कोई कथित कम्युनिस्ट भी देश विरोधी भाषा के लिए रंगा, बिल्ला शब्द का चयन नहीं करता। 31 जनवरी 1982 को तिहाड़ जेल में रंगा, बिल्ला को फांसी दी गई थी। दो किशोर बच्चों की हत्या और लड़की गीता के साथ रेप ने पूरे भारत को हिला दिया था। सवाल यह है कि कथित कम्युनिस्ट का नकाब पहनकर कितने लोग फ़ैज अहमद फै़ज बनने की कतार में हैं? ऐसे लोग बतायें कि, क्या यह देश जियाउलहक का हैं?

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