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आग, रिस्क और उपाय

Bhola Tiwari Dec 10, 2019, 6:52 AM IST कॉलमलिस्ट
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 प्रवीण झा 

(जाने-माने चिकित्सक नार्वे)

मैं जहाँ रहता हूँ, वहाँ आग लगने का रिस्क और प्रतिशत, दोनों काफी अधिक है। पहाड़ी जंगलों में जो आम होता है कि लकड़ी के बने घर, इमारतें और कारखानें भी। जंगल की आग तो हर साल ही लगती है। घरों में जब आग लगती है तो मिनटों में धू-धू कर सब साफ हो जाता है। पिछले दफ़े जब मुहल्ले में आग लगी तो एक घर का तीस प्रतिशत सात मिनट के अंदर जल गया। लेकिन फिर भी मृत्यु नहीं होते। 

मैं कारक, बचाव और हल पर कुछ बिंदु रखता हूँ। 

कारक: आग के कारक तो तीन ही हैं- स्रोत, ज्वलनशील पदार्थ, और ऑक्सीजन (हवा)। स्रोत अब रसोई से अधिक बिजली के तारों से जुड़े हैं। यह भी बात है कि चुल्हे यहाँ इंडक्शन तवे होते हैं, लेकिन अन्यथा भी। केबल (तार) में भी घरों के अंदर लगे तार तो इन्सुलेटेड हैं, या दीवाल के अंदर से गुजरते हैं। खुली लहराती तारें होती हैं- चार्जरों की। तमाम मोबाइल-लैपटॉपों की। और उसमें भी नकली चाइनीज तारों की। उन तारों का कोई माई-बाप नहीं। और-तो-और वह मुड़ कर, कट कर नंगी हो जाती हैं और सोते वक्त चार्जिंग में लगा कर छोड़ दी जाती है। तो बचाव की पहली सीढ़ी तो यही है कि ऐसे नकली और नंगी तारों से बचें। 

बचाव : बचाव के लिए हर छमाही, सरकार घरों और इमारतों की जाँच करती है। सरकार मुफ्त में इसलिए नहीं करती कि वह कल्याणकारी है या अमीर है, बल्कि सरकारी एजेंसियों को बीमा कंपनी पैसे देती हैं। उनका लक्ष्य सीधा है कि अगर आग लग गयी तो उन्हें मोटी रकम देनी होगी। वे सरकारी एजेंसी को पैसे देकर जाँच कराती रहती है। और वह भी मुफ्त में नहीं देती। उसे प्रीमीयम भरते हैं हम। एजेंसी आती है, एक रिपोर्ट बना कर जाती है, कि फलाँ-फलाँ सुधार करिए कि आग न लगे। वह करनी होती है। जैसे हर घर में एक अग्निशामक कनस्तर का होना, भागने का रास्ता होना, आदि। इसका हर तीसरे साल प्रशिक्षण भी दिया जाता है- जैसे, अग्निशामक कनस्तर के अंदर बहुत ही ठंडा पदार्थ होता है, जो उंगलियों पर पड़ जाए तो आप अकर्मण्य हो जाएँगे। इसलिए, वह ठीक से प्रयोग करना सीखना होगा। 

हल : हल के पूरी दुनिया में तीन स्टेप हैं- खाली कराना, सूचना देना, और आग रोकना। यह नहीं कि पहले बाल्टी लेकर खड़े हो गए। सबसे पहले मकान छोड़ कर भागें, भगाएँ, फिर 101 या 112 नंबर डायल करें। और तीसरा, कि बाहर से आग बुझाने की चेष्टा। हल्के-फुल्के आग को बुझाने की कोशिश की जाती है, जैसे उसके ऊपर चादर डाल देना। (बिजली से लगी आग में पानी डालना ख़ास काम नहीं आता, क्योंकि पानी में भी कई कंडक्टर पदार्थ मिले होते हैं)। अग्निशामक कनस्तर (अथवा रेत या चादर डालना) ही सर्वथा उपयोगी है।

हम जहाँ भी बैठे हों, तीन चीजें पक्की कर लें-

1. भागने का रास्ता हो

2. कोई नंगी तार न हो

3. फोन नंबर 101

(यह अनौपचारिक लेख है। विशेषज्ञ लेख नहीं)

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