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जब तक सिस्टम सोया रहेगा....

Bhola Tiwari Dec 08, 2019, 4:11 PM IST टॉप न्यूज़
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रंजन श्रीवास्तव

उन्नाव और हैदराबाद दोनों घटनाओं में एक समानता है कि घटना के वक़्त देश और प्रदेश का सिस्टम सोया हुआ था। और सिर्फ ये दो ही घटनाएं नहीं हैं। ऐसी बहुत सी घटनाएं होती रही हैं, हो रही हैं और होती रहेंगी जब तक सिस्टम सोया रहेगा। कैसे?

क्या निर्भया के बाद आपको लगा नहीं था कि सिस्टम में आमूलचूल परिवर्तन आ जाएगा और घर के बाहर बहू बेटियां अब सुरक्षित रहेंगी? पर क्या हुआ? केंद्र और प्रदेश में क्या सरकार नहीं है? क्या ज्यूडिशियरी नहीं है? या पुलिस व्यवस्था खत्म हो गई है? 

सब कुछ है। पर इसमें सुधार होना था निर्भया के बाद। क्या ये सुधार हुआ? क्या आज सड़क पर बेटियां ज्यादा सुरक्षित हैं। क्या बेटियों के रात में बाहर होने पर अब आपको चिंता या ज्यादा चिंता नहीं होती?

पुलिस अधिकारी और मंत्रीगण अक्सर कहते हैं कि 97 प्रतिशत से ज्यादा बलात्कार वो लोग करते हैं जो पीड़िताओं के परिचित होते हैं। उनके कहने का आशय ये होता है कि वे अक्षम हैं ऐसे बलात्कारों को रोकने के लिए। पर ये शेष 3 प्रतिशत भी तो रोक कर दिखाएं।

हैदराबाद की पशु चिकत्सक तो आरोपियों को दूर दूर तक जानती ही नहीं थी। उस लड़की का स्कूटर पंक्चर किया जाना, अपराधियों का इकट्ठा होना, लड़की को अपहृत करके ले जाना, बलात्कार करना, पेट्रोल खरीदना, फिर उसे जलाकर आराम से अपने अपने स्थानों पर चले जाना। क्या इस पूरे घटनाक्रम में किसी कांस्टेबल, उप निरीक्षक या निरीक्षक या किसी पुलिस पेट्रोल टीम या किसी उच्च अधिकारी की निगाह इन अपराधियों पर या पीड़िता पर पड़ी? या फिर किसी जागरूक अन्य व्यक्ति की ही। 

क्या एनकाउंटर की वाहवाही में ये पता करने की कोशिश की गई की किस पुलिस जवान या अधिकारी की ड्यूटी कहां थी और वो उस समय क्या कर रहा था?

क्या उस असहाय पीड़िता ने बार बार ये नहीं सोचा होगा कि काश किसी एक पुलिस वाले या किसी भी व्यक्ति की निगाह उस पर पड़ जाए और उसकी आबरू और जान बच जाय। पर ऐसा नहीं हुआ। 

चलिए मान लिया कि तेलंगाना में पुलिस बहुत ही सतर्क और काबिल है और जो घटना घटी उसे रोका नहीं जा सकता था। पर उन्नाव में क्या हुआ। रेप हो चुका था। FIR हो चुकी थी। अपराधी पकड़े भी जा चुके थे। पर उन्होंने जमानत पर बाहर आते ही उस लड़की को जलाकर मार डाला। 

क्या हमारी कथित व्यवस्था की निगाह जिसके अनुसार ही आरोपी जेल से बाहर आए होंगे इन आरोपियों पर थी?

क्या पुलिस ने यह मान लिया कि जो आरोपी एक बार गिरफ्तार हो गया वो दुबारा अपराध या उससे ज्यादा घृणित अपराध नहीं करेगा? वह साधु या संत हो चुका है?

और इस अपराध में आरोपी कोई विधायक या सांसद भी नहीं था जिससे पुलिस को उनपर निगाह रखने में कोई दिक्कत होती जैसा की होता है। 

ये घटनाएं अपवाद नहीं हैं। निरंतरता से लगभग हर प्रदेश में घट रही हैं। अभी दो दिन पूर्व ही मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड में एक लड़की ने आत्महत्या कर ली रोजाना के छेड़छाड़ से तंग आकर। ऐसी अनेक घटनाएं हुई हैं जिनमें लड़कियों ने छेड़छाड़ से तंग आकर और अपनी और परिवार की प्रतिष्ठा बचाने के लिए आत्महत्या कर ली।

ऐसी भी घटनाएं हुई हैं जिनमें छेड़छाड़ की शिकायत करने पर भी पुलिस ने कार्यवाही नहीं की और पीड़िता ने आत्महत्या कर लिया।

पर पुलिस और सरकारों के पास इस अनदेखी का भी तर्क मौजूद है। वह है पुलिस बल की और संसाधनों की भारी कमी। 

आज पंजाब में व्यवस्था बनाई जा रही है कि कोई भी महिला रात 10 बजे के बाद पुलिस कंट्रोल रूम को फोन कर सकती है और पुलिस वाहन उसे उसके घर छोड़ेगी और इसके लिए कोई चार्ज नहीं लिया जाएगा। रेलवे ने व्यवस्था की है कि किसी भी महिला कर्मचारी की ड्यूटी रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक नहीं लगाई जाएगी।

अभी आने वाले दिनों में और भी व्यवस्थाएं सामने आएंगी। सवाल ये है कि ये उपाय सरकारों को तभी क्यूं सूझते हैं जब किसी महिला की बलि किसी sex predator के द्वारा कर दी जाती है।

पर ये व्यवस्थाएं आने वाले दिनों में फिर सो जाएंगी अगले किसी हैदराबाद या उन्नाव की घटना की तरह कोई नई घटना होने तक।

निर्भया कांड इस सड़ी गली व्यवस्था का ज्वलंत उदाहरण है। 1090 दिखावा बन के रह गया है। स्वयं लोक सभा के आंकड़ों के अनुसार शायद ही किसी राज्य ने निर्भया फंड का पूरा सदुपयोग किया है व्यवस्था ठीक करने में। कई राज्यों ने तो 25% भी खर्च नहीं किया। निर्भया पेट्रोलिंग ने कम से कम मध्य प्रदेश में नाम कम बदनामी ज्यादा कमाई। अब जाके हर थाने में महिला डेस्क की बात हो रही है। 

नेशनल क्राईम रिकॉर्ड ब्यूरो के इस वर्ष अक्टूबर में जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार पूरे देश में 32559 बलात्कार वर्ष 2017 में घटित हुए। मध्य प्रदेश 5562 बलात्कार के आंकड़ों के साथ चार्ट में सबसे ऊपर है पूरे देश में। 

(शेष बाद में)

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