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धर्म युद्ध में किसकी विजय, किसकी पराजय

Bhola Tiwari Nov 26, 2019, 6:25 AM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

चार पार्टियों के विलय से "जनता दल" का गठन हुआ था जिसमें जनता पार्टी, जनमोर्चा, लोकदल(ए) और लोकदल(बी) प्रमुख घटक दल थे।1989 का उ.प्र विधानसभा चुनाव "जनता दल" के बैनर तले लडा गया, जिसमें जनता दल सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने आई।उन दिनों केंद्र में जनता दल की सरकार थी जिसका नेतृत्व विश्वनाथ प्रताप सिंह कर रहे थे।कांग्रेस के पतन के बाद बडी मशक्कत से वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने थे वो भी चौधरी देवीलाल की मेहरबानी से।चंद्रशेखर ने उन्हें कडी टक्कर दी थी।

जनता दल ने 208 सीटें जीती थीं और बहुमत के लिए छह विधायकों की कमी थी,जो आसानी से मैनेज हो जाने वाला था।निर्दलीयों ने भी जनतादल को समर्थन देने का ऐलान कर रखा था।दिल्ली में तय हुआ कि चौधरी अजीत सिंह उ.प्र के नये मुख्यमंत्री होंगे।वीपी सिंह, मुलायम के मुकाबले अजीत सिंह को ज्यादा पसंद करते थे।वजह ये था कि वीपी सिंह को डकैत उन्मूलन की नीतियों को लेकर मुलायम सिंह यादव के कड़े विरोध का सामना करना पडा था और ये लडाई वीपी सिंह के मुख्यमंत्री पद के इस्तीफे के बाद हीं खत्म हुई थी।वीपी सिंह के जेहन में ये बात घर कर गई थी कि मुलायम उनके विरोधी हैं।

मुलायम ने अजीत सिंह के विरोध में खुद ताल ठोक दी और कहा कि चूंकि विधायक मेरे साथ हैं इस वजह से मुख्यमंत्री मैं बनुंगा।वीपी सिंह को अपना फैसला वापस लेना पडा और ये घोषणा करनी पड़ी कि मुख्यमंत्री पद का फैसला लोकत्रांतिक तरीके से गुप्त मतदान के माध्यम से होगा।वीपी सिंह ने तीन वरिष्ठ नेताओं को गुप्त मतदान की निगरानी करने के लिए लखनऊ भेजा और उन्हें ये भी हिदायत दी गई थी कि वे किसी भी तरीके से मुलायम को समझाएं कि वे अजीत सिंह के नाम पर राजी हो जाएं।वैसे भी उप मुख्यमंत्री का पद उन्हें हीं मिल रहा था।

केंद्र के नुमाइंदगी करने दिल्ली से वरिष्ठ नेता मधु दंड़वते,मुफ्ती मोहम्मद सईद और चिमनभाई पटेल लखनऊ पहुँचें।

वहाँ माजरा बिल्कुल अलग था विधायक मुलायम के पक्ष में नारेबाजी कर रहे थे।अजीत सिंह के साथ मुठ्ठी भर लोग थे।एक बार फिर वरिष्ठ नेताओं ने मुलायम को समझाने की कोशिश की मगर मुलायम अपनी जीत के प्रति आश्वस्त थे और उन्होंने वरिष्ठ नेताओं की बात को सिरे से खारिज कर दिया।इसी बीच मुलायम के विश्वस्त डीपी यादव और बेनी प्रसाद वर्मा ने बलपूर्वक अजीतसिंह के साथ खडे उनके समर्थक 11 विधायकों अपने पाले में मिला लिया।जहाँ गुप्त मतदान हो रहा था वहाँ दोनों तरफ से खूब हथियारों का प्रर्दशन हुआ।मुलायम सिंह गुप्त मतदान में विजयी हुऐ और मुख्यमंत्री बने।

आज महाराष्ट्र में भी यही परिस्थिति बनी है,भतीजे ने चाचा के हीं खिलाफ बगावत कर दी है।अब ये देखना महत्वपूर्ण होगा कि धर्मयुद्ध में कौन विजयी होगा और किसकी पराजय होगी।शरद पवार ने अपने गुरू बसंत दादा पाटिल के साथ भी यही सलूक किया था जो आज उनके भतीजे अजित पवार उनके साथ कर रहें हैं।

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