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कर्ण ! काश तुम होते

Bhola Tiwari Nov 13, 2019, 10:11 AM IST टॉप न्यूज़
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निशिकांत ठाकुर

नई दिल्ली : कर्ण कैसे बताता कि सिंहासन उसकी प्रतीक्षा में था और यदि वह नरेश बनने की हामी दे दे, तो यह युद्ध यही थम सकता था। यह द्वापर युग में घटित महाभारत काल की है , लेकिन सत्ता कि कुर्सी पर बैठने के लिए आज के राजनितिज्ञ किस किस प्रकार की संधि अथवा गठबंधन करते हैं, यह बात अब किसी से छिपी नहीं है। सत्ता के लोभ में गठबंधन अथवा दोस्ती करना और उसे पलक झपकते ही तोड़ देना यह तो कोई आज के राजनीतिज्ञों से सीखे। 

महाराष्ट् की सियासी उठापटक आप और हम बीते कुछ दिनों से देख रहे हैं। इससे पहले हमने जम्मू-कश्मीर मेें बेमेल गठबंधन होते देखा, फिर उसके अंजाम से भी परिचित हुए। कर्नाटक में कुमारस्वामी प्रकरण आज भी जेहन में है। सत्रह वर्ष पुरानी दोस्ती अर्थात राजनीतिक समझौतों को एक मिनट में जदयू ने भाजपा के साथ पिछले विधानसभा चुनाव बिहार में तोड़ दिया और तुरंत अगले ही पल राजद से समझौता करके सरकार का गठन कर लिया। फिर जदयू और राजद की बात नहीं बनी तो वापस भाजपा के साथ समझौता कर लिया। यह सब बिहार की जनता और पूरा देश देख चुका है। 

बिल्कुल उसी प्रकार जिस तरह से अभी महाराष्ट्र में शिव सेना और भाजपा के साथ हुआ। वहां भी तीस वर्ष पुराने संबंधों को शिव सेना ने भाजपा से तोड़ दिया। यह सच है कि चुनावी राजनीति कुर्सी के लिए होती है। लेकिन, इसके साथ सवाल यह भी है कि क्या सत्ता ही सबकुछ है ? पिता की नीयत और सिद्धांत कहां गई ? पिता की विरासत को जब पुत्र की महत्वाकांक्षा कुलांचे मारती है, तो कभी कुमारस्वामी और अभी उद्धव-आदित्य जैसे किरदार सामने आते हैं। 

 और हद तो तब हो गईं जब कोई भी दल सरकार बनाने के लिए बहुमत से दूर है। अभी भी क्या स्थिति बनेगी यह कुछ कहा नहीं जा सकता। क्योंकि महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया है । इस मामले मंे हरियाणा ने बहुत ही तेजी से अपने विरोधी दल के साथ मिलकर राजनीतिक समझौता किया और सरकार का गठन कर लिया ।अब देखना यह है कि महाराष्ट्र में सरकार बनती भी है अथवा राष्ट्रपति शासन ही लगा रहेगा । 

वैसे यह कोई पहली बार नहीं हुआ है । पिछले लगभग दस वर्षों में कई राज्यों में ऐसा हुआ है , जहां अनिर्णय की स्थति में राष्ट्रपति शासन लागू हुआ हो और कुछ दिनों बाद फिर से चुनाव कराकर एक स्थाई सरकार का गठन न किया गया हो । लेकिन अब जो हो रहा उसमे चर्चा का विषय यही होता है कि इस बीच खरीद फरोख्त करके सत्ता की कुर्सी हथिया ली जाएगी । 

जो भी हो अभी तो देश की जनता को बहुत कुछ देखना बांकी है क्योंकि कई राज्यों में इसी साल के अंत में अथवा अगले साल कई राज्यों में चुनाव है। वैसे झारखंड के चुनाव की घोषणा कर दी गई है। एनडीए के तमाम घटक दल झारखंड में अपने अपने दम पर चुनावी ताल ठोंक चुके हैं। जब चुनाव कई कोणों के होने लगे, तो चुनाव परिणाम की आशंका हमें सशंकित ही करती है। अब तक के चुनावी परिणाम इसी ओर इशारा करते हैं। ऐसे में यदि महाराष्ट् की राह पर कुछ दिनों बाद झारखंड जाता दिखे तो आश्चर्य मत कीजिएगा ?

अभी जैसे ही चुनाव की घोषणा हुई तथाकथित गठबंधन टूटने लगे है । वैसे वहां भी अभी केंद्र की भाजपा सरकार ही सत्तारूढ़ है । कोई भी सरकार हो उत्साह में जनमत को गुमराह किया जा सकता है , लेकिन बार बार ऐसा नहीं होता । जनता थक जाती है लेकिन ऐसा अब लगने लगा है कि जनता अब बदलाव चाहने लगी है और सत्ता के लोभी उसे बरगला नहीं सकते । इसलिए अब लगता है कि कर्ण जैसा को राजनेता आएगा जिसे स्वयं का सत्ता का लोभ नहीं होगा और वह जानता कि भलाई के लिए अपने जीवन को न्योछावर करेगा ।

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