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जब इक़बाल ने खुद गाया था सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा

Bhola Tiwari Nov 10, 2019, 10:07 AM IST टॉप न्यूज़
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राजीव मित्तल

यह तस्वीर 1910 की है, जिसमें अल्लामा इक़बाल गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर में अपने साथियों और शागिर्दों के साथ हैं..यही वो जगह है जहाँ इक़बाल ने ग़दर पार्टी के संस्थापक और अपने प्रिय शागिर्द लाला हरदयाल के कहने पर पहली बार अपनी रचना “सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा” तरन्नुम में सुनाई थी..

हुआ यूं था कि बचपन से मज़हबी घराने में पले बढ़े लाला हरदयाल भारतीय भूमि से निकले हर धर्म, सम्प्रदाय और महापुरूष में काफ़ी आस्था रखते थे.. उन्हे भारतीय परम्पराओं से ख़ासा लगाव था.. शुरुआती तालीम कैम्ब्रिज मिशन स्कूल से हासिल करने के बाद सेंट स्टीफ़ेंस कालेज, दिल्ली से संस्कृत में स्नातक किया और इसके बाद पंजाब यूनिवर्सटी, लाहौर से संस्कृत में ही एम.ए. करने लगे.. उस समय गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर में अल्लामा इक़बाल प्रोफ़ेसर थे, जो वहाँ दर्शनशास्त्र पढ़ाते थे..

उन दिनों लाहौर में नौजवानों के मनोरंजन और तफ़रीह के लिये एक ही क्लब हुआ करता था जिसका नाम था “यंग्समैन क्रिश्चियन ऐसोसिएशन” .. उसे वाई.एम.सी.ए के नाम से भी जाना जाता था..किसी बात को लेकर लाला हरदयाल की क्लब के सचिव से बहस हो गई.. बात देश की इज़्ज़त की थी, लाला जी ने तुरंत ‘वाई एम सी ए’ के समानान्तर “यंग्समैन इण्डिया ऐसोसिएशन” यानी ‘वाई एम आई ए’ की स्थापना कर डाली..

जब लाला जी ने अपने प्रोफ़ेसर इक़बाल को सारा माजरा बताया और उनसे ऐसोसिएशन के उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता करने को कहा तो वोह फ़ौरन तैयार हो गये.. इस समारोह में इक़बाल ने अपनी प्रसिद्ध रचना “सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा” सुनाई..एैसा शायद पहली बार हुआ कि किसी समारोह के अध्यक्ष ने अपने अध्यक्षीय भाषण के स्थान पर कोई तराना गाया हो.. इस रचना का श्रोताओं पर इतना गहरा प्रभाव हुआ कि इक़बाल को समारोह के आरम्भ और समापन दोनों ही अवसरों पर ये गीत सुनाना पड़ा..

यह तराना पहली बार मौलाना शरर की हफ़्तावार पत्रिका "इत्तेहाद" में 16 अगस्त 1904 को इस टिप्पणी के साथ प्रकाशित हुआ था की एक क्लब की स्थापना हुई है, जिसका सबसे महत्वपूर्ण कार्य यह है कि हिन्दोस्तान के सभी समुदायों में मेलजोल बढ़ाया जाए ताकि वे सब एकमत से देश के विकास और कल्याण की और आकर्षित हों..इस समारोह में पंजाब के प्रसिद्ध और कोमल विचार वाले शायर मुहम्मद इक़बाल ने एक छोटी और पुरजोश कविता पढ़ी, जिसने श्रोताओं के दिलों को जीत लिया और सबके आग्रह पर इसको समारोह के प्रारंभ और समापन पर भी सुनाया गया। इस कविता से चूंकि एकता के उद्देश्य में सफलता मिली, अतः हम अपने पुराने दोस्त और मौलवी मुहम्मद इक़बाल का शुक्रिया अदा करते हुए 'इत्तेहाद' में इसे प्रकाशित कर रहे हैं…”

15 अगस्त 1947 को जब हिन्दुस्तान आज़ाद हुआ तो मध्यरात्रि के ठीक 12 बजे संसद भवन समारोह में इक़बाल का यह तराना समूह में गाया गया था..आज़ादी की 25वीं वर्षगांठ पर सूचना एंव प्रसारण मंत्रालय ने इसकी वर्तमान धुन तैयार की.. 1950 के दशक में सितारवादक पंडित रविशंकर ने इसे सुर-बद्ध किया..जब इंदिरा गांधी ने भारत के प्रथम अंतरिक्षयात्री राकेश शर्मा से पूछा कि अंतरिक्ष से भारत कैसा दिखता है, तो शर्मा ने कहा था-सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा..

21 अप्रैल, 1938 को अल्‍लामा इक़बाल का इंतक़ाल हो गया..उनकी मौत के बाद दिल्ली की "जौहर" पत्रिका के इक़बाल विशेषांक में महात्मा गांधी का एक लेख छपा था, जिसमें उन्होंने लिखा था-डॉ. इक़बाल मरहूम के बारे में क्या लिखूं, लेकिन मैं इतना तो कह सकता हूं कि जब उनकी मशहूर नज़्म "हिन्दोस्तां हमारा" पढ़ी तो मेरा दिल भर आया और मैंने पूणे की जेल में सैकड़ों बार इस नज़्म को गाया होगा.

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