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बेटी बचाओ...

Bhola Tiwari Nov 09, 2019, 8:08 AM IST टॉप न्यूज़
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कबीर संजय

नई दिल्ली : नीचे की दो तस्वीरों को ध्यान से देखिए। पहली तस्वीर देहरादून स्थित महंत इंदिरेश अस्पताल की है। दूसरी देहरादून स्थित कैलाश अस्पताल की है। ये दोनों चार्ट अस्पताल की महिला एवं प्रसूति विभाग के बाहर लगे हुए हैं। बेटियों की हत्या कैसे कोख में ही की जा रही है, दोनों चार्ट से बाखूबी स्पष्ट है। 

महंत इंदिरेश अस्पताल में माह अप्रैल, मई, जून, जुलाई, अगस्त, सितंबर और अक्तूबर के दौरान कुल 942 लड़के पैदा हुए और 836 लड़कियां पैदा हुईं। यानी यहां पर लड़कों की तुलना में 106 लड़कियां कम पैदा हुईं। जबकि, कैलाश अस्पताल में इसी अवधि में 103 लड़के पैदा हुए और 56 लड़कियां पैदा हुईं। यानी यहां पर लड़कों की तुलना में 56 लड़कियां कम पैदा हुईं। 


क्या यह कोई छिपा हुआ सवाल है कि लड़कियां कम क्यों पैदा हुईं। अगर केवल इन्हीं दोनों अस्पतालों को देखें तो यहां पर लड़कों की तुलना में 162 लड़कियां कम पैदा हुईं। अगर इस तरह की तुलना पूरे शहर भर के अस्पतालों के आंकड़ों को सामने रखकर किया जाए तो मेरे खयाल से इस भयावह स्थिति को पूरी तरह समझा जा सकता है। जैविक या प्राकृतिक सिद्धांतों के अनुसार मेल और फीमेल की संख्या में अंतर नहीं होना चाहिए। इसलिए इतनी कम अवधि में यह अंतर दिखता है तो इसका मतलब है कि प्रकृति के नियम में हस्तक्षेप किया जा रहा है। 

पता नहीं किसकी बेटियां होंगी वे जिन्होंने उन्हें पैदा होने से पहले ही मार दिया। कहा जाता है कि सीता को भी किसी घड़े में बंद करके जमीन में गाड़ दिया गया था। जहां पर हल चलाते हुए वह राजा जनक को मिली थी।  

खैर, इस तरह का बोर्ड मैंने पहली बार देहरादून में देखा है। अगर आप लोगों की निगाह से भी कहीं किसी अस्पताल में लगा हुआ ऐसा बोर्ड गुजरे, तो कृपया उसकी फोटो साझा करें। ताकि, इसे समझा जा सके। क्या कोई ऐसा शहर भी है जहां पर लड़कियां ज्यादा पैदा हो रही हैं। जहां पर लोग अपनी बेटियों की हत्या कोख में न कर रहे हों। 

मेरी राय से तो इस तरह के बोर्ड हर शहर और हर अस्पताल में लगाया जाना चाहिए। ताकि, हम इस आईने में अपनी शकल देख सकें। आखिर भ्रूण हत्या करने वाले कहीं चांद से नहीं आ रहे हैं। वो हमारे बीच मौजूद हैं। हमारे भाई-बहन और दोस्त हैं। लेकिन, हम इनका सामाजिक बहिष्कार भी नहीं कर पा रहे हैं। खुलकर उन पर यह आरोप भी नहीं लगा पा रहे हैं कि बेटे की चाहत में उन्होंने अपनी बेटी की हत्या की है।

पैसा इसमें बड़ी भूमिका अदा कर रहा है। तभी तो निजी मालिकाने वाला और अमीरों के कैलाश अस्पताल में लिंगानुपात में अंतर धार्मिक ट्रस्ट के अधीन चलने वाले महंत इंदिरेश अस्पताल के लिंगानुपात से ज्यादा है। पैसे वाले और पढ़े-लिखे लोग अपनी बेटियों की ज्यादा हत्याएं कर रहे हैं। 

आपसे निवेदन है कि जहां कहीं भी ऐसा बोर्ड देखें, कृपया उसे साझा करें और बताएं कि बेटों की तुलना में कितनी बेटियों हत्या की गई।  ताकि कम से कम आईने में हम अपनी शकल तो देख सकें।  

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