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आखिर अयोध्या है किसकी....?

Bhola Tiwari Nov 08, 2019, 9:22 PM IST टॉप न्यूज़
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नीरज कृष्ण

तारीख 16 अक्टूबर 2019, माननीय सर्वोच्च न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यों की खंडपीठ ने अयोध्या में विवादित राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद को लगातार 40 दिनों तक सभी पक्षों को विस्तार पूर्वक सुनने, साक्ष्यों को समझने एवं दर्ज करने के पश्चात माननीय मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट तौर पर कहा कि अब बहुत हो गया, इस मामले में सुनवाई आज ही पूरी होगी और कहा बहुत हो चूका, इस मामले पर अब और सुनवाई नहीं हो सकती। हम समझते हैं कि सभी पक्ष अपनी धर्म बातें कह चुके हैं। आज शाम हम दिन की कार्यवाही खत्म करके ही उठेंगे। 

माननीय सर्वोच्च न्यायलय के इतिहास में अब तक की यह दूसरी सबसे लंबी चली सुनवाई है। सबसे लंबी सुनवाई का रिकॉर्ड 1973 के #केशव भारती मुक़दमे का है, जिसमें 68 दिनों तक सुनवाई चली थी।

इस संविधान पीठ के अन्य सदस्य हैं माननीय न्यायाधीश एस.ए. बोबडे, माननीय न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड, माननीय न्यायाधीश अशोक भूषण और माननीय न्यायाधीश एस. अब्दुल नजीर शामिल हैं। संवैधानिक प्रावधान है कि यदि माननीय मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने किसी मुक़दमे की सुनवाई पूरी कर चुके होते हैं तो फैसला उन्हें ही सुनाना पड़ता है। ज्ञातव्य है कि वर्तमान मुख्या न्यायाधीश 17 नवंबर को सेवा निवृत हो रहे हैं, अतः सेवा-निवृत होने से पूर्व मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ इस मुक़दमे पर अपनी निर्णय / फैसला सुनाएगी।

‘आखिर अयोध्या है किसकी....? बहस की कार्यवाही के अंतिम दिनों में विवादित राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद मुक़दमे में एक अजीब सी घटना तब घटी जब हिन्दू महासभा की तरफ से अपना पक्ष रखते हुए संगठन के अधिवक्ता विकास सिंह ने बिहार के ही सुप्रसिद्ध एवं चर्चित पूर्व आईपीएस अधिकारी श्री किशोर कुणाल की पुस्तक ' अयोध्या रिविजिटेड ' का हवाला देते हुए एक नक़्शे को माननीय न्यायलय के समक्ष प्रस्तुत किया, जो उस पुस्तक का एक अंश है, तब इस मुक़दमे के मुस्लिम पक्षकार एवं वरीय अधिवक्ता राजीव धवन ने इसका यह कहते हुए विरोध करते हुए यह कहा कि किताब कोर्ट के ‘रिकॉर्ड’ का हिस्सा नहीं है और उन्होंने नक़्शे की जो प्रति उन्हें सौपी गयी थी को उन्होंने कार्यवाही सुन रही खंडपीठ के सामने ही उस नक़्शे को फाड़ दिया। 

 पांच जजों की खंडपीठ अपने वरीय अधिवक्ता के इस आचरण को हैरानी से देखती रही। माननीय मुख्य न्यायाधीश ने तब तंज भरे लहजे में कहा ‘इतने ही क्यों, आप और टुकड़े कर दीजिए’।

पहली बार 1813 में हिंदू संगठनों ने दावा किया था कि साल 1528 में बाबर ने राम मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई थी, तब दोनों पक्षों में हिंसा भी हुई थी। 1859 में ब्रिटिश सरकार ने विवादित जगह पर तार की बाड बनवाई थी। 1885 में पहली बार महंत रघुवर दास ने ब्रिटिश अदालत में मंदिर बनाने की अनुमति मांगी थी। उसके बाद वर्ष 1934 में विवादित क्षेत्र में हिंसा हुई थी। पहली बार विवादित हिस्सा तोड़ा गया। 23 दिसंबर 1949 को हिंदुओं ने केंद्रीय स्थल पर रामलला की मूर्ति रखी और पूजा शुरू कर दी। हिंदुओं का कहना था कि भगवान राम प्रकट हुए हैं, जबकि मुसलमानों ने आरोप लगाया कि किसी ने रात में चुपचाप मूर्तियां वहां रख दीं। इसके बाद मुस्लिम पक्ष ने नमाज पढ़ना बंद कर दिया और वह कोर्ट चले गए। वर्ष 1950 में गोपाल सिंह विशारद ने फैजाबाद अदालत से रामलला की पूजा अर्चना की विशेष अनमति मांगी थी। 


तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन #मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभभाई पंत से इस मामले में तत्काल कार्रवाई करने को कहा। यूपी सरकार ने मूर्तियां हटाने का आदेश दिया, लेकिन जिला मजिस्ट्रेट के.के. नायर ने दंगों और हिंदुओं की भावनाओं के भड़कने के डर से इस आदेश को पूरा करने में असमर्थता जताई। बाद में दिसंबर 1959 में निर्मोही अखाड़ा ने विवादित स्थल हस्तांतरित करने और दिसंबर 1961 में उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड ने बाबरी मस्जिद के मालिकाना हक बाद के लिए मुकदमा दायर किया था। 

इस तरह आजाद भारत में यह बड़ा मुद्दा बनना शुरू हो गया था। बाद में वर्ष 1984 में विश्व हिंदू परिषद ने बाबरी मस्जिद के ताले खोलने एवं रामजन्म भूमि को मुक्त कराने और विशाल मंदिर निर्माण के लिए अभियान शरू कर दिया था, जगह-जगह देशभर में प्रदर्शन भी किए गए। भारतीय जनता पार्टी ने भी इस अयोध्या विवाद को हिंदू अस्मिता से जोड़ते हुए संघर्ष शरू किया था। 


नाराज मुस्लिमों ने वर्ष 1986 में बाबरी एक्शन कमेटी गठित की। फैजाबाद जिला न्यायाधीश ने साल 1986 में पूजा की इजाजत दी। रामलला के ताले दोबारा खोले गए इससे नाराज मुस्लिमों ने बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी गठित की। बाद में 6 दिसंबर 1992 को कारसेवकों ने #ढांचा ढहा दिया था और अस्थाई राम मंदिर बनाया गया। इसके बाद पूरे देश में अराजकता जैसी स्थिति बन गई थी। 

अयोध्या विवाद को लेकर वर्ष 1992 में ही लिब्राहन आयोग गठित किया गया। वर्ष 2002 में अयोध्या विवाद की उच्च न्यायलय में सुनवाई शुरू हुई। विवादित स्थल पर मालिकाना हक को लेकर उच्च न्यायलय के 3 न्यायाधीशों की पीठ ने सुनवाई शुरू की मार्च से अगस्त 2003 में न्यायलय के निर्देश पर पुरातत्व सर्वेक्षण ने विवादित स्थल का उत्खनन किया। पुरातत्व विभाग ने दावा किया था कि मस्जिद नीचे मंदिर के अवशेष होने के प्रमाण मिले हैं। 

वर्ष 2011 में हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। इलाहाबाद उच्च न्यायलय की लखनऊ पीठ ने विवादित क्षेत्र को रामलला विराजमान निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड को बराबर तीन हिस्सों में बांटने का फैसला दिया था। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता सी.एस. वैद्यनाथ ने कहा था कि भगवान राम के जन्मस्थान पर संयुक्त कब्जा नहीं हो सकता क्योंकि जन्मस्थान स्वयं देवता हैं। उन्होंने तर्क देते हुए कहा था कि संयुक्त कब्जे से देवता का विभाजन होगा जो संभव नहीं है। 

2011 में उच्च न्यायलय के फैसले को सर्वोच्च न्यायलय में चुनौती दी गई। डिविजन बेंच (दो सदस्यों वाली पीठ) ने अयोध्या विवाद की सुनवाई शुरू की। अयोध्या विवाद की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने मध्यस्थता की भी पहल की थी, जो विफल रही। मध्यस्थता समिति की अध्यक्षता सर्वोच्च न्यायलय के पूर्व न्यायाधीश एफ. एम. आई. कलीफुल्ला कर रहे थे, इसमें आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन के संस्थापक श्री श्री रवि शंकर तथा वरिष्ठ अधिवक्ता और प्रख्यात मध्यस्थ श्रीराम पंचू शामिल थे।

अन्ततः सर्वोच्च न्यायलय ने माननीय मुख्य न्यायाधीश के अध्यक्षता वाली संवैधानिक पीठ ने 06 अगस्त 2019 से राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद की कार्यवाही/सुनवाई प्राम्भ किया, जिसकी सुनवाई 16 अक्टूबर तक अबाद्ध चलती रही और अब फैसले की घड़ी दिनों में सिमट गयी है........’आखिर अयोध्या है किसकी’ ?।

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