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सबने मुझसे मुंह मोड़ लिया, पर सपनों ने नहीं मोड़ा......!!

Bhola Tiwari Nov 08, 2019, 6:20 AM IST कॉलमलिस्ट
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 नीरज कृष्ण

आखिर एक मनुष्य को सिर्फ इसलिए समाज से बहिष्कृत क्यों होना पड़े कि वह लिंग दोषी है? सिर्फ इसी कारण उसकी उम्मीदों, सपनों, आकांक्षाओं, भावनाओं का गला क्यों घोंट दिया जाता है। हममे से ही उत्पन्न हुए ये किन्नर हमारे समाज का एक अभिन्न अंग है और हम ही इन्हें किसी दूसरी ही दुनिया का अजूबा करार दे देते हैं । क्यों हम इन्हें अपना नहीं पाते ? क्यों हम अपने ही शरीर के अंग को काटकर खुद से दरकिनार कर देते हैं ? क्यों इन्हें वो तमान बुनियादी हक़ नहीं मिलते जो एक आम मनुष्य के लिए हैं ? क्यों इन्हें जीवन यापन के लिए सम्मान से जीने का हक़ नहीं है ?

हमारा समाज जब तक यौन केंद्रित बना रहेगा, तब तक यह समस्या बनी रहेगी। 'जननांग विकलांगता एक दोष है, लेकिन इतना बड़ा भी नहीं कि तुम मान लो कि तुम धड़ का मात्र वही निचला हिस्सा हो। मस्तिष्क नहीं हो, दिल नहीं हो, धड़कन नहीं हो, आंख नहीं हो। तुम्हारे हाथ-पैर नहीं हैं। हैं, हैं, हैं, सब वैसे ही हैं, जैसे औरों के हैं। यौन-सुख लेने-देने से वंचित हो तुम, वात्सल्य सुख से नहीं। बच्चे तुम पैदा नहीं कर सकते, मगर एक पिता बन सकते हो, यह किसने नहीं समझने दिया तुम्हें?' शरीर के अन्य किसी अंग से विहीन व्यक्ति जब सम्मानित जीवन जी सकता है तो तुम क्यों नहीं ? क्या फर्क पड़ता है कि तुम शरीर के किस हिस्से से विहीन हो ।

 

स्त्री और पुरूष का अंतर भाषा और विचार के उदय के पहले हुआ था। शरीर को भाषा और विचार के जन्म के पहले रचा गया। स्त्री और पुरूष को समाज निर्मित भूमिकाओं में जब निर्मित किया जा रहा था तब भाषा ने जन्म लिया। स्त्री और पुरूष का प्रकृति से संस्कृति की ओर रूपान्तरण वैसे ही है जैसे लड़का धीरे-धीरे मर्द बनता और लड़की धीरे धीरे औरत बनती है। इसी क्रम में उनकी भूमिकाएं निर्धारित कर दी जाती हैं। इसी क्रम में लिंग के संबंध बनते हैं और प्रभुत्व का उदय होता है। इरीगरी ने लिखा है, '' पुंस वर्चस्व वाली संस्कृति के समाज में पैदा होने वाली लड़की जरूरी नहीं है कि जेण्डर की उपयुक्त अनुभूति से लैस हो, इसमें कोई संदेह नहीं है कि उसके पास औरत की मन:स्थिति होती है। किन्तु अस्मिता नहीं होती। उसे बनाना होता है।''

वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड में स्पष्ट रूप से लिखा हुआ है कि एक बार शिव जी पार्वती को प्रसन्न करने के लिए स्त्री का रूप धारण कर लिए जिसके चलते उनके आस पास जो भी चीजें थीं सभी स्त्री रूप में परिवर्तित हो गयीं । यथा नदी, वृक्ष, आस-पास के जानवर, मनुष्य इत्यादि। ठीक उसी वक्त एक धर्मात्मा राजा ईल भी अपने सैनिकों के साथ आखेट के लिए उन्ही जंगलो में भटक रहा था, दुर्भाग्य से ईल एवं उसके सैनिक स्त्री रूप में परिवर्तित हो गए। दुखी राजा ईल ने शंकर से पुनः पुरुष रूप वापस माँगा तो शंकर ने कहा कि मैं तुम्हे वापस पुरुष बना सकता हूँ पर मेरी शर्त है कि तुम्हे अपने पुरुषत्व का त्याग करना होगा। दुखी ईल वहां से निराश होकर चला गया, परन्तु पार्वती जी से यह आशीर्वाद पाने में सफल रहा कि वह एक माह पुरुष ईल और एक माह वह स्त्री इला के रूप में रह सकता है। परंतु राजा के सारे सैनिक स्त्री रूप में ही रह गए। कहते हैं वो सारे सैनिक एक दिन स्त्री इला के साथ वन में घूमते–घूमते चंद्रमा के पुत्र महात्मा बुद्ध के आश्रम में पहुंच गए। तब चंद्रमा के पुत्र महात्मा बुद्ध ने इन स्त्री रूपी सैनिकों से कहा कि तुम सब किन्न पुरुषी इसी पर्वत पर अपना निवास स्थान बना लो। आगे चलकर तुम सब किन्न पुरुष पतियों को प्राप्त करोगे।

 परन्तु किन्नरों की उपस्थिति का प्रथम स्पष्ट प्रमाण महाभारत काल में प्रमाणिक तौर पर मिलता है जब अर्जुन बृहनलला के नाम से किन्नर रूप में छद्म वेश में रह रहे थे। इस किन्नर रूप में उन्होंने स्त्री के कपड़े पहनना चुना। जिस कारण आज भी किन्नर स्त्री के वस्त्र पहनते हैं।

किन्नर ना तो पूरे स्त्री होते हैं और ना तो पूरे पुरुष। फिर भी वह स्त्री के ही कपड़े पहनते हैं। ऐसा नहीं है कि इनकी शादी नहीं होती। ये दुल्हन भी बनते हैं और वैध्वय रूप भी धारण करते हैं । लेकिन यह किसी पुरुष से नही बल्कि अपने भगवान इरावन से विवाह करते हैं। यह विवाह तमिलनाडु के छोटे से गाँव कुग्नाम नाम के गाव में होता है। तमिलवर्ष के पहली पूर्णिमा पर हजारो किन्नर सामूहिक रूप से विवाह करते हैं। इस विवाह में सामान्य विवाह की तरह हर रस्म होती है जैसे हल्दी, मेहँदी, संगीत आदि।

किन्नर समुदाय हिन्दू धर्मावलम्बी होते हैं परन्तु उनके गुरु मुस्लिम होते हैं। मुगल शासन के समय किन्नरों को सबसे ज्यादा सम्मान प्राप्त हुआ था। किन्नरों को महिलाओं के हरम की रक्षा की जिम्मेदारी दी जाती थी, तो कई रानियों के व्यक्तिगत सुरक्षाकर्मी भी होते थे। हालाँकि कुछ इतिहासकारों का इस पर मत है कि मुग़ल बादशाह अपने हरम में किन्नरों की नियुक्ति इसलिए करते थे कि वे योनिक सुख का आनंद सुरक्षाकर्मियों से न ले सकें। मुगल साम्राज्य का मानना था कि किन्नर हमारे समाज का एक अहम हिस्सा हैं और इसलिए उन्हें इतनी बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई। किन्नर उनकी कई सेनाओं के जनरल भी हुआ करते थे और उसी बल की बदौलत इतिहास में किन्नर सेना द्वारा बहुत सी जंगे भी लड़ी गयीं ।

 भारतीय किन्नर और उनके अधिकार

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने 19 जुलाई 2016 को ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) बिल 2016 को मंजूरी दे दी। भारत सरकार की कोशिश इस बिल के जरिए एक व्यवस्था लागू करने की है, जिससे किन्नरों को भी सामाजिक जीवन, शिक्षा और आर्थिक क्षेत्र में आजादी से जीने के अधिकार मिल सके। यह उम्मीद की जा रही है कि यह विधेयक भारतीय किन्नरों के लिए मददगार साबित होगा। इस विधेयक का मुख्य प्रयास है कि किन्नरों के साथ अपमानजनक और भेदभाव वाले व्यवहार में कमी लाने के साथ ही साथ किन्नरों को मुख्य धारा से जोड़ने की कोशिश की जाए, जिसके लिए वे लंबे समय से प्रयत्नशील हैं।

1871 के विवादास्पद कानून के तहत किन्नरों को आपराधिक समुदाय माना जाता था। इस कानून में कुछ जाति समुदाय के लोगों को परंपरागत तौर पर आपराधिक माना गया था, जिनमे किन्नर समुदाय भी शामिल था। भारत में किन्नरों को सामाजिक तौर पर बहिष्कृत ही कर दिया जाता है। उन्हें समाज से अलग–थलग कर दिया जाता है। इसका मुख्य कारण यह है कि उन्हें न तो पुरुषों में रखा जा सकता है और न ही महिलाओं में, जो लैंगिक आधार पर विभाजन की पुरातन व्यवस्था का अंग है। यह भी उनके सामाजिक बहिष्कार और उनके साथ होने वाले भेदभाव का प्रमुख कारण है। इसका नतीजा यह है कि वे शिक्षा हासिल नहीं कर पाते। बेरोजगार ही रहते हैं। भीख मांगने के सिवा उनके पास कोई विकल्प नहीं रहता। इस पर भी चर्चा की कि इन लोगों को बंधुआ मजदूरी या भीख मांगने के लिए क्यों मजबूर किया जाता है।

एक साल पहले राज्यसभा ने निजी विधेयक पारित किया था– द राइट्स ऑफ ट्रांसजेंडर्स पर्सन्स बिल 2014, जो किन्नरों के अधिकारों की बात करता था। डीएमके सांसद तिरुचि शिवा ने 2015 में यह विधेयक प्रस्तुत किया था। उस समय यह पूर्व अपेक्षित नहीं था और उस विधेयक को ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) बिल 2016 का पहला वर्जन माना गया। उसी को आधार बनाकर नया विधेयक तैयार किया गया है। सामाजिक न्याय मंत्रालय ने इसे तैयार किया है। हकीकत तो यह है कि चार दशक में पहली बार ऊपरी सदन में किसी निजी विधेयक को मंजूरी दी गई है।

विधेयक के अनुसार किन्नरों का उत्पीड़न या प्रताड़ित करने पर किसी भी व्यक्ति को 6 महीने की जेल हो सकती है। ऐसे मामलों में अधिकतम सजा कुछ वर्षों की भी हो सकती है। विधेयक के मुताबिक, किन्नरों को ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) में शामिल करने का प्रस्ताव है। हालांकि, यह तभी लागू होगा, जब वे अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति में शामिल नहीं होंगे। यानी यदि वे अजा–अजजा का हिस्सा हैं तो उन्हें उसका ही लाभ मिलता रहेगा।

अप्रैल 2014 में भारत की शीर्ष न्यायिक संस्था– सुप्रीम कोर्ट ने किन्नरों को तीसरे लिंग के रूप में पहचान दी थी। नेशनल लीगल सर्विसेस अथॉरिटी (एन ए एल एस ए) की अर्जी पर यह फैसला सुनाया गया था। इस फैसले की ही बदौलत, हर किन्नर को जन्म प्रमाण पत्र, राशन कार्ड, पासपोर्ट और ड्राइविंग लाइसेंस में तीसरे लिंग के तौर पर पहचान हासिल करने का अधिकार मिला। इसका अर्थ यह हुआ कि उन्हें एक–दूसरे से शादी करने और तलाक देने का अधिकार भी मिल गया। वे बच्चों को गोद ले सकते हैं और उन्हें उत्तराधिकार कानून के तहत वारिस होने एवं अन्य अधिकार भी मिल गए। परन्तु नई व्यवस्था देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि एन ए एल एस ए का फैसला लेस्बियन, बाईसेक्सुअल्स और गे पर लागू नहीं होगा क्योंकि उन्हें तीसरे लिंग के समुदाय में शामिल नहीं किया जा सकता।

धीरे-धीरे समाज में किन्नरों की परिस्थितियां बदली है। 14 से अधिक भारतीय भाषाओं की जानकार शबनम देश की पहली निर्वाचित जन प्रतिनिधि थी जिसने मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के सोहागपुर निर्वाचन क्षेत्र से वर्ष 2000 के उपचुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में शानदार जीत दर्ज कर देश की राजनीति के इतिहास में नया पन्ना जोड़ दिया। 2001 के नगर निगम चुनाव में गोरखपुर की जनता ने तमाम राजनैतिक पार्टियों और दिग्गजों को दर-किनार कर किन्नर आशा देवी उर्फ अमरनाथ को अपना प्रतिनिधि चुन कर इतिहास रचा। संत समाज ने भी उनके लिए अखाड़ा गठित किया है। कुंभ के दौरान महामंडलेश्वर की पदवी मिलने के पश्चात मां भवानी नाथ बाल्मीकि का कहना है, 'हम संन्यासी हैं, हमारा भरण-पोषण जनता करती है। जनता के लिए हमारा भी कुछ कर्तव्य बनता है।' किन्नरों को वोट का अधिकार है। थर्ड जेंडर के रूप में समाज में पूर्णरूपेण मान्यता दी गई है।

इतिहास को टटोलिये, सबल हमेशा निर्बलों पर जुल्म करता रहा है। इस जुल्म का शिकार महिला और दलित दोनों हुए, पर भेदभाव के चलते महिलाओं, दलितों को कभी घर से नहीं निकाला गया, जबकि किन्नरों के मां-बाप ही उन्हें घर से निकला देते हैं। समाज ने इनको इस दशा में क्यों रखा, ये भी एक सवाल है। किन्नर भी एक इन्सान है। भले ही उनका लिंग आमलोगों के तरह ना हो। लेकिन वो भी एक इंसान है। उन्हें भी जीने का अधिकार है। हमे कभी भी उन्हें नीचा नही समझना चाहिये। वो भी समाज का एक अंग ही है। किन्नरों को भले ही आज के समय में थर्ड जेंडर का दर्जा मिल गया हो लेकिन फिर भी उन्हें समाज में वो इज्जत नहीं मिल पाई है जिसके वह हकदार हैं।

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