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"पुलिस विद्रोह" का इतिहास पुराना है

Bhola Tiwari Nov 07, 2019, 10:38 AM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

अतीत में भी पुलिस विद्रोह हो चुके हैं और जैसे हालात हैं आगे भी काफी गुंजाइश बाकी है।दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट में पुलिस और वकीलों की मारपीट सिस्टम की फेल्योर को हीं दर्शाता है।सिपाहियों का कोई संगठन नहीं है जबकि उनके आका(आईपीएस) अफसरों की एक सशक्त यूनियन है जो केवल और केवल आईपीएस अधिकारियों का हीं प्रतिनिधित्व करता है।वकील इसलिए मजबूत हैं कि बार काउंसिल उनकी हर जायज और नाजायज मांग पर कंधे से कंधा मिलाकर खडी रहती है।पूरे देश में वकील पुलिस प्रशासन पर हावी हैं,वे पीटते भी हैं और उन्हीं पर मुकदमा भी करते हैं।

दिल्ली के हजारों पुलिस और उनके परिवार वालों ने अपने उच्चाधिकारियों से अपने लिए यूनियन बनाने की मांग रखी है।उच्चाधिकारियों ने मौखिक आश्वासन दिया है मगर ये फलीभूत होगी मुझे शंका है।


भारत में पुलिस विद्रोहों में सबसे बड़ा विद्रोह उत्तरप्रदेश में सन् 1973 के मई महीने में हुआ था।ये विद्रोह पीएसी(प्रोवैंसियल आर्म्ड काँम्टैबुलरी)ने किया था, जिसके कारण सेना बुलानी पड़ी थी।सेना की पाँच दिनों की रक्तरंजित कार्रवाई में 30 पीएसी के जवान मारे गए और सैकड़ों घायल हुए थे।अलग अलग पैंसठ केसों में 795 पीएसी के जवानों पर मुकदमे चलाए गए थे।148 पुलिसकर्मियों को दो साल की जेल से लेकर आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।पाँच सौ पुलिसकर्मियों ने अपनी नौकरी खोई और लगभग इतने हीं पुलिसकर्मियों को नौकरी से बर्खास्त किया गया था।

इस पुलिस विद्रोह की जाँच हुई जिसमें पाया गया कि पुलिस के उच्चाधिकारी पीएसी के जवानों को अपने बंगलों में निजी काम के लिए इस्तेमाल करते थे।जवान साहब लोगों के घरों पर पोंछा लगाने से लेकर खाना बनाने तक खटता रहता था।जवानों से जूठे बर्तन साफ कराए जाते थे और उन्हें बुरी तरह गालियां दी जाती थी।

दूसरा कारण पीएसी में पोस्टिंग के लिए अफसरों का गलत तरीके से सलेक्शन।पीएसी बटालियन का गलत तरीके से बनाया गया संगठन, जो अफसरों की जी हजूरी में हीं व्यस्त रहता था।जवानों को रहने और खाने की व्यवस्था बेहद खराब थी,जिससे जवानों में भारी असंतोष था।

इसी विद्रोह के बाद पुलिस संगठन को भंग कर नया संगठन बनाने पर रोक लगा दी गई थी।इस विद्रोह के परिणामस्वरूप तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी को हटा दिया गया था, यद्यपि कारण कुछ और बताए गए थे।

बहुत से लोग 1957 के पुलिस विद्रोह को पहला स्वत्रंत्रता संग्राम कहते हैं मगर उससे पहले 1817 में ओडिशा में हुऐ पाइका विद्रोह ने पूर्वी भारत में कुछ समय के लिए ब्रिटिश राज की जडें हिला दी थीं।मूल रूप से पाइका ओडिशा के उन गजपति शासकों के किसानों का असंगठित सैन्य दल था,जो युद्ध के समय राजा को सैन्य सेवाएं मुहैया करवाते थे और शांतिकाल में खेती करते थे।इन लोगों ने 1817 में बक्शी जगबंधु विद्याधर के नेतृत्व में ब्रिटिश राज के विरुद्ध बगावत का झंडा उठा लिया था।

पाइका विद्रोहियों ने बहुत कम समय में बहुत से क्षेत्रों पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया।पाइका विद्रोहियों ने बहुत से अंग्रेज अधिकारियों की हत्या कर दी थी या उन्हें जगह छोड़ने पर मजबूर कर दिया था।तीन महीने के वर्चस्व के बाद अंग्रेजों ने हथियारों के बल पर इस आंदोलन को कुचलना शुरू किया।बहुत से सैनिक मारे गए और बहुतों को गिरफ्तार कर लिया गया।पाइका विद्रोह के नेता बक्शी जगबंधु को 1825 में गिरफ्तार कर लिया गया और कैद में रहने के दौरान 1829 में उनकी मृत्यु हो गई।

नरेंद्र मोदी की सरकार इतिहास को बदलने की तैयारी में है,केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा है कि 1817 के पाइका विद्रोह को अगले सत्र से इतिहास की पाठ्त पुस्तकों में प्रथम स्वत्रंत्रता संग्राम के रूप में स्थान मिलेगा।सरकार का यह निर्णय सही है या गलत ये तो जनता आकलन करेगी मगर पाइका विद्रोह को इतिहास में उचित स्थान नहीं दिया गया जो दुखद है।

10 मई,1857 को मेरठ से शुरू हुई विद्रोह को भी पुलिस विद्रोह कहते हैं।सैनिकों ने कारतूस की खोल पर गाय और सुअर की चर्बी लगी होने के कारण कारतूस का इस्तेमाल करने से मना कर दिया था।29 मार्च 1857 को मंगल पांडेय नाम के एक सैनिक ने बैरकपुर छावनी में अपने अफसरों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया, लेकिन ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों ने इस सैनिक विद्रोह को सरलता से नियंत्रित कर लिया साथ हीं उसकी बटालियन 34 एनआई को भंग कर दिया।

24 अप्रैल,1857 को नब्बे सैनिकों में से पच्चासी सैनिकों ने नए कारतूस लेने से मना कर दिया।मना करने वाले सैनिकों का कोर्टमार्शल कर उन्हें पाँच साल की कारावास की सजा सुनाई गई।10 मई,1857 की शाम खुला विद्रोह आरंभ हो गया।मंगल पांडेय ने हियरसे को गोली मारी फिर तो अंग्रेज अधिकारियों की शामत सी आ गई।इस विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेजी हुकूमत ने कडा रूख अख्तियार किया और मंगल पांडेय को फांसी पर चढा दिया गया।बाकी सैनिकों को नौ साल की सजा सुनाई गई।

अभी तक इस विद्रोह को प्रथम स्वत्रंत्रता संग्राम या प्रथम पुलिस विद्रोह के नाम से जाना जाता था मगर अब पाइक विद्रोह को सरकार प्रथम स्वत्रंत्रता संग्राम के नाम से पाठ्यपुस्तक में शामिल कर रही है।केंद्र सरकार को पुलिस रिफार्म के विषय पर भी सोचना चाहिए और निरंकुश हुऐ वकीलों पर अंकुश लगाने के लिए कडे कदम उठाना चाहिए।

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