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मुफ़्त में मिल जाये तो हम सब मीर ज़ाफर ही हैं..

Bhola Tiwari Nov 03, 2019, 12:33 PM IST टॉप न्यूज़
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 राजीव मित्तल

बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला के दरबार में उपस्थित होकर ईस्ट इंडिया कम्पनी का प्रतिनिधि राबर्ट क्लाइव बंगाल में व्यापार करने की अनुमति मांग रहा था.. सिराजुद्दौला ने साफ मना कर दिया और कहा, "मेरे नाना ने कहा है, सब पर विश्वास करना मगर अंग्रेजों पर मत करना, इसलिये आप बाहर जायें.."

क्लाइव ने युद्ध की धमकी दी तो सिराजुद्दौला ने कहा, मुझे युद्ध करना मंजूर है लेकिन तुमको यहां व्यापार करने की अनुमति नही दूँगा.."

बंगाल के पूर्व नवाब अलीवर्दी खाँ को बेटा नहीं था , इसलिये उन्होंने बेटी के पुत्र सिराजुद्दौला को अपना उत्तराधिकारी बनाया था..अलीवर्दी खाँ अंग्रेजों के बहुत खिलाफ थे..

सिराजुद्दौला ने राबर्ट क्लाइव की चुनौती को स्वीकार किया और 23 जून 1757 को प्लासी के मैदान में युद्ध तय हुआ..( प्लासी , बंगाल की तत्कालीन राजधानी मूर्शिदाबाद से 22 की0मी0 दूर नदिया ज़िले में अवस्थित है)

उस लड़ाई में अगर नवाब का मीरबख्शी और रिश्ते में चाचा मीरज़ाफर का एक भी सैनिक गोली दाग देता तो कम्पनी को मद्रास भागने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था या बंगाल के मारवाड़ी साहूकार सेठ अमीचंद और जगतसेठ ईस्ट इंडिया कम्पनी के कारिन्दे रॉबर्ट क्लाइव के लिये अपनी तिजौरी का मुंह न खोल देते तो उसके पास अपने सेना के घोड़ों को घास तक खिलाने के पैसे नहीं थे..।लेकिन सब कुछ पहले से तय था और नवाब की 50 हजार पैदल और 20 हजार घुड़सवार सेना कम्पनी के उन तीन हजार सैनिकों के सामने दुम दबा कर खड़ी रही, जिसके दो हजार जवान भारतीय थे।इतना ही नहीं, पचास बड़ीतोपों का बारूद खुले में 

इस तरह पड़ा था कि बारिश की पहली बौछार में ही भीग कर लुगदी बनगया।इस लड़ाई को भारत के ही नहीं, दुनिया भर के इतिहास में सबसे शर्मनाक युद्धों में शामिल किया जा सकता है।भारतवर्ष के भाग्य को बदल देने वाले इस युद्ध में दोनों तरफ के कुल जमा 523 सैनिक खेत रहे थे।

इतिहासकार पणिक्कर कहते हैं- प्लासी का युद्ध मात्र एक षड्यंत्र और विश्वासघात का घिनौना प्रदर्शन था..हाँ इसको विश्व के निर्णायक युद्धों में से एक इसलिए माना जाता है क्योंकि प्लासी से ही भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव डालने की शुरुआत हुई और एक व्यापारिक संस्था ने एक विशाल देश की किस्मत का ठेका अपने हाथों में ले लिया..

ईस्ट इण्डिया कंपनी का कारिन्दा राबर्ट क्लाइव अपनी डायरी में लिखता है, "जब मैंने मीरज़ाफर को लालच देकर अपनी तरफ कर प्लासी युद्ध जीत लिया तो हमलोग मुर्शिदाबाद की ओर बढ़े.. मैं आगे घोड़े पर सवार, मेरे पीछे मेरे 950 यूरोपियन सिपाही और उसके पीछे बीस हजार भारतीय फौज..उस समय सड़क के दोनोें किनारे खड़े भारतीय तालियां बजा रहे थे..अगर वे विरोध में एक-एक पत्थर भी चलाते तो हम सभी मारे जाते"..

कुल मिला कर हम सब कहीं न कहीं आज भी अपने अन्दर मीरज़ाफर को पाल कर रखे हुए हैं.. पन्द्रह लाख का लालच मिला तो अपनी बुद्धि, विवेक, ज्ञान और नैतिकता पर लोभ की चादर चढ़ा कर कूदने लगे.. आज भी हम मुर्शिदाबाद की सड़क के किनारे खड़े होकर राबर्ट क्लाइव की जीत की खुशी में तालियां ही तो बजा रहे हैं..

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