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पाकिस्तान ने "यूनाइटेड नेशंस" में एकबार फिर कश्मीरियों के "आत्मनिर्णय के अधिकार" का राग अलापा

Bhola Tiwari Nov 02, 2019, 6:40 PM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन की प्रथम सचिव पाँलोमी त्रिपाठी ने बुधवार को "लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार" पर महासभा की तीसरी समिति की चर्चा में कहा,"यह प्रतिनिधिमंडल क्षेत्रीय फायदे के लिए सिरफिरे कदम उठा रहा है और भारत के अभिन्न हिस्से जम्मू कश्मीर का जिक्र करके इस महत्वपूर्ण एजेंडे को कमजोर करने में भी उसने कोई संकोच नहीं किया।"

भारत की प्रथम सचिव ने कहा,"सच यह है कि जम्मू-कश्मीर का मामला कभी संयुक्त राष्ट्र के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार के एजेंडे का हिस्सा नहीं रहा।"आत्मनिर्णय के लिए लोगों के अधिकार के सार्वभौमिक बोध पर महासचिव की रिपोर्ट का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, ए/74/309 में निहित दस्तावेज क़ सतही तौर पर देखने से यह स्पष्ट होता है कि संयुक्त राष्ट्र के उल्लेख किए गए खुद निर्णय लेने के एजेंडे में जम्मू-कश्मीर शामिल नहीं है।

गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की निवर्तमान राजदूत मलीहा लोधी ने महासभा समिति के समक्ष एक बार फीर कश्मीर का राग अलापते हुऐ कहा था कि कश्मीरी खुद निर्णय लेने के अपने अधिकार का इंतजार कर रहे हैं, जिसका सुरक्षा परिषद के 11 प्रस्तावों में वादा किया गया है।

संयुक्त राष्ट्र महासचिव अंतोनियो गुतरेस ने भारत और पाकिस्तान से कश्मीर मुद्दे को आपस में बातचीत करके सुलझाने की अपील की है।उन्होंने दोनों देशों से मानवाधिकारों को पूरी इज्ज़त दिए जाना सुनिश्चित करने को कहा है।

अब ये प्रश्न उठता है कि क्या वाकई भारत ने कश्मीर मामले में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों का उल्लंघन किया है?इसे जानने के लिए हमें अतीत में जाना होगा।ब्रिटिश हुकूमत ने भारत से जाते समय सभी रियासतों को ये अधिकार दे दिया था कि चाहे वो भारत में अपनी रियासत का विलय करें या पाकिस्तान में या स्वत्रंत रियासत के रूप में काम करें।सभी छोटी रियासतों ने जिनकी सरहद भारत या पाकिस्तान से छूतीं थी विलय कर लिया था मगर दो बडी रियासतें जम्मू कश्मीर और हैदराबाद ने स्वत्रंत रहने का फैसला लिया।

जम्मू कश्मीर में राजा हरिसिंह का शासन था,1947 में पाकिस्तान के कबाइलियों ने जम्मू कश्मीर पर आक्रमण कर दिया।जब वे हरिसिंह के नजदीक पहुँचने वाले थे तब महाराज ने भारत सरकार से मदद मांगी।सरदार पटेल ने महाराज हरिसिंह को स्पष्ट कह दिया था कि मदद उन्हें उस शर्त पर दी जाएगी जब वे रियासत का विलय भारत में करने को तैयार हो जाएं।महाराज हरिसिंह ने विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिये फिर भारतीय फौजों ने पाकिस्तानी कबाइलियों को बाहर खदेड दिया मगर फिर भी उनके कब्जे में एक तिहाई जमीन रह हीं गया।वही पाक अधिकृत कश्मीर कहलाता है।

युद्ध जीतकर भी भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद गया और वहां पाकिस्तान की शिकायत की।भारत जीतकर भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद क्यों गया, इसकी सटीक जानकारी कहीं नहीं मिलती है।खैर 1948 में संयुक्त राष्ट्र की तरफ से कश्मीर मुद्दे पर पहला प्रस्ताव आया।संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सूची में यह था प्रस्ताव नं 38।इसके बाद इसी साल प्रस्ताव 39,47 और 51 के रूप में तीन प्रस्ताव और आए।

प्रस्ताव 38 में ये कहा गया था कि दोनों पक्ष हालात को और न बिगडऩे दें।सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष दोनों पक्षों को बुलाएंगे और उनकी राय लेंगे।

प्रस्ताव 39 में कहा गया कि सुरक्षा परिषद ने तीन सदस्यीय आयोग बनाने का फैसला किया है, जिसमें दोनों देशों के एक एक सदस्य होंगे और एक सदस्य दोनों चुने हुए सदस्यों की ओर से नामित होंगे।ये आयोग मौके पर पहुँचकर तथ्यों की जाँच करेगा।

21 अप्रैल 1948 को प्रस्ताव संख्या 47 में जनमतसंग्रह पर सहमति बनीं।प्रस्ताव में कहा गया कि भारत और पाकिस्तान दोनों जम्मू कश्मीर पर नियंत्रण का मुद्दा जनमत संग्रह और निष्पक्ष लोकत्रांतिक तरीके से तय होना चाहिए।इसके लिए एक शर्त तय की गई थी कि कश्मीर में लडने के लिए जो पाकिस्तानी नागरिक या कबायली लोग आए थे,वे वापस चलें जाएं।


1950 के आसपास भारत को ये एहसास हुआ कि जनमतसंग्रह से जम्मू कश्मीर भारत के हाथ से निकल सकता है तब भारत ने संयुक्त राष्ट्र में ये दलील दी कि तयशुदा समय पर पाकिस्तानी फौज कश्मीर से हटीं नहीं हैं इस वजह से हम जनमतसंग्रह की मांग को नकारते हैं।

संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की निवर्तमान राजदूत मलीहा लोधी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 47 का हीं जिक्र किया है,जो सही है।

कश्मीरियों के लिए पाकिस्तान हमेशा जनमतसंग्रह की मांग करता रहा है और आगे भी करेगा,क्योंकि वो जानता है कि जिस दिन कश्मीर में जनमतसंग्रह हो जाएगा।कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा बन जाएगा।आज भी वहां के लोगों के जेहन में भारत के लिए बारूद भरी पडी है।सच बेहद कडवी है मगर ये सौ फीसदी सत्य है कि कश्मीर के लोग धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से पाकिस्तान के बेहद करीब हैं और वे उन्हीं के साथ जाना चाहते हैं।

युद्ध जीतकर भारत को संयुक्त राष्ट्र में नहीं जाना चाहिए था, वो कौन सी परिस्थिति थी जिसकी वजह से भारत सरकार यूएन गई, शायद हीं इसका खुलासा अब हो पाएगा मगर पूर्वजों की एक गलती से जम्मू कश्मीर विवादित क्षेत्र बन गया, ये तो स्वीकार करना हीं होगा।

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