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गंदगी के ढेर पे बैठा समाज और छठ..

Bhola Tiwari Nov 02, 2019, 3:10 PM IST टॉप न्यूज़
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राजीव मित्तल

मुज़फ्फरपुर में गुजारे पांच वर्षों में छठ का महत्व समझ में आ गया था..और अब तो ये महा-लोकपर्व बिहार से निकल देश भर में पूजा जाने लगा है...फेसबुक जैसी सोशल साइट और अखबार-चैनल सब छठ की छठा में रंगे हुए हैं..हिंदुस्तान में तो पूरा संपादकीय पेज ही छठ और उसके महत्त्व पर है...ऐसे में अब कुछ कड़वे सचों से भी आमना सामना कर लें...

--छठ जीवित देवताओं का पर्व है..यह सिर्फ सूर्योपासना का ही पर्व नहीं है, जल धाराओं की उपासना का भी पर्व है.. तभी तो पिछ्ले तीन चार दिनों से नदियों, तालाबों और उसके घाटों की सफाई का अभियान चल रहा है..सिर्फ उपवास ही नहीं, यह साफ-सफाई भी इस पर्व का हिस्सा है..दीवाली के बाद अगले चार-पांच दिन तक बिहार की नदियों और तालाबों के किनारे इतने साफ सुथरे होंगे कि वहां गिरने वाले प्रसाद के कण को भी निसंकोच उठा कर खाया जा सकेगा.. परंतु तीन नवम्बर के बाद फिर हम इन घाटों को भूल जायेंगे पूरे एक साल तक के लिए..

पटना में रहने वाले दूसरे राज्यों के लोग चकित होकर कहते हैं कि बारह महीने आकन्ठ गन्दगी में डूबा रहने वाला यह प्रांत महज छठ के चार दिनों के लिए इतना साफ सुथरा कैसे हो जाता है और फिर कैसे अगले ही दिन से वह फिर वैसा का वैसा गंदगी का ढेर बन जाता है.. उनकी बातें सुनकर सोचता हूं कि अगर यह पर्व हर महीने हुआ करता तो कितना अच्छा होता..ताकि हम स्वच्छता और पर्यावरण के प्रति सचेत होने को अपनी आदत में शामिल कर लेते..


बेहद दुःखद स्थिति यह है कि छठ के लिए अब घाटों की कमी होने लगी है..लोग दरवाजे और छतों पर हौदा बनाकर छठ मनाने लगे हैं मगर यही लोग छठ के बाद पोखरों, तालाबों और छोटी नदियों की जमीन कब्जाने में नहीं हिचकते..बिहार में जैसे जैसे छठ का प्रचलन बढ़ रहा है, पोखरों और छोटी नदियों की संख्या घट रही है..कभी बिहार में दो लाख से अधिक तालाब हुआ करते थे, अब सिर्फ 98 हजार बचे हैं..यह संख्या भी 5 साल पुरानी है..


बिहार में छोटी नदियों की संख्या 200 से अधिक थी, 80 नदियों का नाम हवलदार त्रिपाठी जी ने अपनी किताब में दर्ज किया है..महज 50 साल पहले.. अब कितनी नदियां बची हैं? इनमें से आधी से अधिक धाराएं खेतों और बस्तियों में बदल दी गयी हैं.. इसी साल मार्च महीने में ऐशिया की सबसे बड़ी गोखुर झील कांबर पूरी तरह सूख गयी थी..लेकिन उस झील का सूख जाना स्थानीय लोगों के लिए खुशी बन गयी क्योंकि उन्हें खेती के लिए ढेर सारी जमीन जो मिल गयी थी..


बाद में पता चला कि खुद बिहार सरकार काबर, कुशेश्वर आदि झीलों का विस्तार घटाना चाहती है.. बिहार सरकार ने जल जीवन हरियाली अभियान शुरू किया है, मगर हाल के 7-8 सालों में उसने खुद शहर के कई तालाबों को मौत के मुँह में पहुंचा दिया..

दरभंगा शहर में अब गर्मियों में टैंकर से पानी की सप्लाई होने लगी है, क्योंकि पिछ्ले 25 सालों में आधे से अधिक तालाब लापता हो चुके हैं.. वहां तालाब के किनारे की जमीन सोने के भाव बिक रही है.. मोतिहारी की प्रसिद्ध मोती झील का वही हाल है.. गया के ऐतिहासिक तालाब भी मौत के घाट उतारे जा रहे हैं..गांव से लेकर शहर तक एक ही कहानी है..

मुज़फ्फरपुर में जिस ब्रह्मपुरा इलाके में सड़क के किनारे गड्ढे खोद खोद कर उनमें पानी भर सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है ठीक वहीँ ब्रह्मपुरा पोखरा बरसों से ओपन संडास बना हुआ है..और मोतिहारी में 17 साल पहले जब शानदार मोती झील देख कर चौंका तो वहां हिंदुस्तान के ब्यूरोचीफ संजय उपाध्याय को उसकी कोई जानकारी नहीं थी..गया शहर के बीचोबीच फैला बड़ा तालाब भूमाफिया के हाथों मारा गया सरकारी अमले की मिलीभगत से..

कहने को बहुत कुछ है लेकिन गंदगी ढेर पे बैठे समाज को छठ मना लेने दीजिये क्योंकि इस समाज ने अपन को हर साल खूब ठेकुए खिलाये..

अब आप जी भर के खुश हो लीजिये कि यह सब उसी राज्य में हो रहा है जहां छठ सबसे बड़ा त्योहार है.. हम प्रकृति के पर्व के रूप में इसकी ब्रांडिंग करते हैं.. लोगों को लगता है कि सिर्फ नेम निष्ठा से खरना करने और सुबह शाम सूर्य को जल चढ़ा देने से ही छठी मैया खुश हो जायेंगी और उनकी मन्नत पूरी हो जायेगी!! वे यह नहीं सोचते कि छठी मैया और सूर्य की आराधना के नाम पर यह पर्व हमें जो सिखाना चाहता है, वह प्रकृति का स्वरूप बचाए रखना है ... क्योंकि अन्ततः प्रकृति ही सभी जीवों की रक्षा करती है .. काश हम भारतीय कभी यह भी सीख पाते।

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