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सूर्य के प्रति आभार अर्पित करने का पर्व है छठ

Bhola Tiwari Nov 02, 2019, 2:46 PM IST टॉप न्यूज़
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हिमकर श्याम 
महापर्व छठ में भगवान भास्कर की पूजा की जाती है, जो पूरी सृष्टि के जीवनदाता हैं. सूर्य अपनी रश्मियों का विभाजन नहीं करता. सूर्य की दृष्टि में सब एक हैं. सूर्य वर्गों, जातियों व समुदायों के भेद को एक झटके में मिटा देता है. प्राणदायिनी ऊर्जा एवं प्रकाश का एक मात्र स्रोत होने से सूर्य का देवों में सर्वोपरि स्थान है. सूर्य हमारे भीतर और बाहर के अंधकार को दूर करता है. सूर्य हमें रोशनी और गर्मी देता है जिससे यह धरती रहने के लिए एक सुखद और रोशन जगह बनती हैं. छठ पर्व है प्रकाश देनेवाले इस प्रत्यक्ष देव के प्रति आभार अर्पित करने का.
सूर्य परमात्मा का सर्वश्रेष्ठ प्रतीक है. सूर्य देवता का लगभग दस सूक्तों में आह्वान किया गया है. सौर देवताओं में यह साकार देवता हैं क्योंकि यह सूर्यमंडल और सूर्य देवता का द्योतित करता है. देवता का श्रेष्ठ दृष्टिगोचर रूप सूर्य देवता है. सूर्य दूरदर्शी, सर्वदर्शी, सब जीवों को देखनेवाला तथा मानव मात्र के कुकर्मों और सुकर्मों का साक्षी है. वह मानव को कार्य करने के लिए उत्तेजित करता है. 
ऊषा सूर्य की प्रेमिका है, पत्नी है. सूर्य उसके पीछे एक प्रेमी की भांति घूमता है. छठ में सूर्य का आह्वान करते हुए कहा जाता हैं कि हे सूर्य, आज उदय होने पर हमें कठिनाइयों से मुक्त करो, पाप से मुक्त करो, व्याधियों से मुक्त करो. 
सूर्य उपासना सनातन काल से प्रचलित रही है. वेदों में ओजस्, तेजस् एवं ब्रह्मवर्चस् की प्राप्ति के लिए सूर्य की उपासना करने का विधान है. यजुर्वेद में कहा गया है कि सूर्य की, सविता की आराधना इसलिए भी की जानी चाहिए कि वह मानव मात्र के शुभ व अशुभ कर्मों के साक्षी हैं. उनसे हमारा कोई भी कार्य- व्यवहार छिपा नहीं रह सकता. ऋग्वेद में सूर्योपासना के अनेकानेक प्रसंग हैं, जिनमें सूर्य से पाप- मुक्ति, रोग- नाश, दीर्घायुष्य, सुख- प्राप्ति, शत्रु- नाश, दरिद्रता- निवारण आदि के लिए प्रार्थना की गयी है. शास्त्रों की मानें तो सूर्य को अर्घ्य देने से व्यक्ति के इस जन्म के साथ किसी भी जन्म में किए गए पाप नष्ट हो जाते है. 
सूर्य और इसकी उपासना की चर्चा विष्णु पुराण, भगवत पुराण, ब्रह्मा वैवर्त पुराण आदि में विस्तार से की गयी है. उत्तर वैदिक काल के अन्तिम कालखण्ड में सूर्य के मानवीय रूप की कल्पना होने लगी. पौराणिक काल आते-आते सूर्य पूजा का प्रचलन और अधिक हो गया. अनेक स्थानों पर सूर्यदेव के मंदिर भी बनाये गये. छठ पूजा का प्राचीन काल से ही विशेष महत्व रहा है. मध्य काल तक छठ सूर्योपासना के व्यवस्थित पर्व के रूप में प्रतिष्ठित हो गया, जो अभी तक चला आ रहा है. 
विष्णु सौर ( सूर्यात्मक) देवता है. द्वादश आदित्यों में एक हैं विष्णु. त्रेता युग में विष्णु का प्रतिनिधि अवतार हुआ है रामावतार. बाल्मीकि रामायण का मूल स्वरूप सूर्यात्मक है. यह अपने मूलरूप में एक सूर्य गाथा है. इस महाकाव्य के भीतर निहित सूर्य-प्रतीकों और सूर्योपासना के तत्वों का विवेचन-विश्लेषण किया गया है. छठ व्रत के सम्बन्ध में अनेक कथाएँ प्रचलित हैं. एक मान्यता के अनुसार लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की. सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था.
एक अन्य मान्यता है कि छठ पर्व का आरंभ महाभारत काल में कुंती ने किया था. कुंती जब कुंवारी थीं तब उन्होंने ऋषि दुर्वासा के वरदान का सत्य जानने के लिए सूर्य का आह्वान किया. सूर्य की आराधना से ही कुंती को कर्ण जैसा पराक्रमी और दानवीर पुत्र की प्राप्ति हुई थी. कर्ण भी सूर्य देव का उपासक था. वह प्रतिदिन घण्टों पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देता था. सूर्य की कृपा से ही महान योद्धा बना था. महाभारत की ही एक अन्य कथा के अनुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा. उसकी मनोकामनाएं पूरी हुईं तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल गया. 
छठ सूर्योपासना का महापर्व है. इस पूजा में लोग चार दिनों तक सूर्य देवता की भक्ति में लीन हो जाते है. नहाए खाए से पर्व की शुरुआत होती है, जिसमें व्रती स्नान कर शुद्ध होते हैं. चार दिनों का कठिन तप करके लोग भगवान सूर्य से अपने सारे दुखों का अंत करने की विनती करते हैं. छठ में उगते हुए सूर्य के साथ ही डूबते हुए सूर्य को भी अर्घ्य देने की परंपरा है. यह दुनिया का इकलौता प्रमाण है जिसमें डूबते सूर्य का भी नमन किया जाता है. डूबते सूर्य की आराधना दार्शनिक दृष्टिकोण लिए हुए है जो यह कहता है कि डूबते सूर्य से अपने कुटुम्बियों की तरह व्यवहार करो और उनसे विदाई लेते समय भी उनका अभिवादन करो क्योंकि वह पुनः शीघ्र आने हेतु विदा हो रहे हैं. रात भर विश्राम करके पुनः सुबह नवीनता लिए आएंगे और सारी मनोकामनाएँ पूर्ण करेंगे. सुबह उनके पुनः आगमन पर उनका अभिनन्दन करना. पौराणिक महत्व के अनुसार उगते और डूबते सूर्य के साथ सूर्य की दो पत्नियाँ उषा और प्रत्युषा की अराधना की जाती है. दूसरा दर्शन यह बतलाता है कि अवसान-उदय, जीवन-मृत्यु, इस धरती के समस्त जीवों में और इस ब्रम्हाण्ड के सभी निर्जीवों में भी घटित होते हैं. 
सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा गया है. लोक मातृका षष्ठी की पहली पूजा सूर्य ने ही की थी. छठ पर्व को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो षष्ठी तिथि को एक विशेष खगोलीय परिवर्तन होता है, इस समय सूर्य की पराबैगनी किरणें पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती हैं. छठ पूजा के दौरान होनेवाले अनुष्ठानों में इसके सम्भावित कुप्रभावों से मानव की यथासम्भव रक्षा करने का सामर्थ्य होता है. छठ मनुष्य और प्रकृति के संबंधों पर आधारित पर्व भी है. छठ में सारी सामग्री जैसे फल, बाँस से बने सूप और दऊरा, गाय का दूध, मिट्टी का दीप, कद्दू या अरवा चावल प्रकृति प्रद्दत हैं. प्रकृति के निकट हैं. आधुनिक युग में इस पर्व ने ग्राम्य जीवन और लोक परंपराओं को जीवित रखने में योगदान दिया है. छठ प्रकृति के प्रति कृतज्ञता दिखाने का जरिया भी है. छठ माध्यम है नदियों, तालाबों और जलाशयों की महत्ता समझने, समझाने और पर्यावरण सुरक्षा में योगदान देने का.

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