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सूर्य से है पृथ्वी की उर्वरता, हरीतिमा और सौंदर्य !

Bhola Tiwari Nov 02, 2019, 9:54 AM IST टॉप न्यूज़
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ध्रुव गुप्त

दीवाली के चौथे दिन से लोक-आस्था के महान पर्व छठ के चार-दिवसीय आयोजन का आरम्भ होता है। छठ सूर्य की उपासना का लोक-पर्व है। हमारे अनगिनत देवी-देवताओं में से एक सूर्य ही हैं जो हमेशा हमारी आंखों के सामने हैं। उनका देवत्व स्वीकार करने के लिए किसी तर्क या प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। अपनी पृथ्वी सूर्य से ही जन्मी है। पृथ्वी पर जो भी जीवन है, उर्वरता है, हरीतिमा है, सौंदर्य है - वह सूर्य के कारण ही हैं। सूर्य न होते तो न पृथ्वी संभव थी, न जीवन और न पृथ्वी का अपार सौंदर्य। चांद का सौन्दर्य और शीतलता भी सूर्य की ही देन है। मुख्यतः बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखण्ड और नेपाल की तराई के कृषक समाज द्वारा मनाए जाने वाले सूर्य की आराधना के चार-दिवसीय पर्व की शुरुआत कार्तिक के शुक्ल पक्ष की चौथी तिथि को तथा समाप्ति कार्तिक शुक्ल पक्ष की सातवीं तिथि को होती है। 'नहाय-खाय' से आरम्भ होने वाले इस महापर्व के दौरान व्रतधारी बिना अन्न-जल के लगातार छत्तीस घंटों का कठिन व्रत रखते हैं। अन्न-जल के त्याग के साथ ही उन्हें सुखद शैय्या का भी त्याग कर फर्श पर कंबल या चादर बिछाकर सोना होता हैं। सरल-सरस और निश्छल लोकगीतों के साथ छठी तिथि की शाम को डूबते सूर्य को और सातवी तिथि को प्रातः उदित होते सूर्य को नए कृषि उत्पादों और दूध के साथ अर्घ्य देने के साथ पर्व का समापन होता है। इन चार दिनों में घर से लेकर देह और मन तक की पवित्रता का जैसा ध्यान रखना होता है, वह बहुत दुःसाध्य है। इस पर्व को हठयोग भी कहा गया है। ऐसा हठयोग जिसमें घर में किसी की मृत्यु के अलावा अन्य किसी भी स्थिति में व्यतिक्रम नहीं आना चाहिए। छठ व्रती के वृद्ध या बीमार होने के बाद व्रत का भार अगली पीढ़ी की किसी विवाहित महिला या पुरुष को हस्तांतरित कर दिया जाता है। 

इस कठिन और पवित्र परंपरा की शुरूआत कब और कैसे हुई, इसके बारे मे कई कथाएं प्रचलित हैं। उनमें सबसे प्रचलित कथा के अनुसार सूर्यवंशी राम ने लंका से लौटकर राज्य का शासन संभालने के पूर्व कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को सीता के साथ सरयू नदी के जल से अर्घ्य देकर अपने कुलदेवता सूर्य की उपासना की थी। त्रेता युग में ही उनकी देखादेखी उनकी प्रजा ने सूर्य की उपासना की परंपरा को आगे बढ़ाया। महाभारत काल में सूर्यपुत्र कर्ण द्वारा सूर्य की पूजा-अर्चना की कथा प्रसिद्द ही है। कर्ण सूर्य के उपासक थे और रोज घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। सूर्य की कृपा से वे महान योद्धा बने। जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गये, तब कृष्ण ने द्रौपदी को छठ का व्रत रखने की सलाह दी थी। द्रौपदी द्वारा कई सालों तक यह व्रत करने के बाद पांडवों की मनोकामनायें पूरी हुईं और उनका खोया हुआ राज्य और वैभव उन्हें वापस मिला। एक कथा यह भी है कि कृष्ण के पौत्र शाम्ब को कुष्ठ रोग हो गया था। इस रोग से मुक्ति के लिए उनके परिवार ने सूर्य की उपासना की थी। 

इस पर्व के बारे में लोगों में एक आम जिज्ञासा यह रही है कि सूर्य की उपासना के इस पर्व में सूर्य को अर्घ्य देने के साथ जिन छठी मैया की पूजा होती है और जिनकी अथाह शक्तियों के गीत गाए जाते हैं, वे कौन हैं। छठ एक लोकपर्व है, इसीलिए शास्त्रों में इस देवी का कहीं कोई सीधा उल्लेख नहीं है, हालांकि कहीं-कहीं इसके संकेत जरूर खोजे जा सकते हैं। लोक में प्रचलित कथा के अनुसार सूर्य और षष्ठी या छठी का संबंध भाई और बहन का है। षष्ठी या छठी मातृका शक्ति हैं जिनकी पहली पूजा स्वयं सूर्य ने ही की थी। 'मार्कण्डेय पुराण' के अनुसार प्रकृति ने अपनी शक्तियों को कई अंशों में बांट रखा है। प्रकृति के छठे अंश को 'देवसेना' कहते हैं। प्रकृति का छठा अंश होने के कारण इनका एक नाम षष्ठी भी है। देवसेना या षष्ठी श्रेष्ठ मातृका और समस्त लोकों के बालकों की रक्षिका देवी मानी जाती हैं। पुराणों में निःसंतान राजा प्रियंवद द्वारा देवी षष्ठी का व्रत करने की कथा है जिसके बाद उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई थी। छठी षष्ठी का अपभ्रंश हो सकता है। आज भी छठ व्रती छठी मैया से अपनी संतानों के आरोग्य, सुख, समृद्धि और सुरक्षा का वरदान मांगते हैं। छठी मैया की परिकल्पना की एक आध्यात्मिक पृष्ठभूमि भी है। अध्यात्म और योग के अनुसार सूर्य की सात किरणों का मानव जीवन पर अलग-अलग प्रभाव पड़ता है। उनमें से सूर्य की छठी किरण को आरोग्य और भक्ति का मार्ग प्रशस्त करने वाला माना गया है। यह भी संभव है कि सूर्य की इसी छठी किरण की आराधना छठी मैया के रूप में होती है।

छठ मूलतः कृषक समाज का पर्व है। कृषक इस अवसर पर अपने तमाम कृषि उत्पादों - केला, गन्ना, नारियल, बड़ा नींबू या गागल, सुथनी, केराव, शकरकंद, शहद, नए चावल का अक्षत, दूध, नए बांस की बनी डलिया और दौरा आदि के साथ किसी नदी या तालाब के पानी में खड़े होकर सूर्य का आभार प्रकट करते हैं। यह फसल के उत्पादन में सूर्य के साथ नदियों और तालाबों की भूमिका के प्रति भी आभार-प्रदर्शन है। कुछ दशकों पहले तक यह बेहद कठिन पर्व ज्यादातर स्त्रियों द्वारा ही मनाया जाता रहा था। पुरुषों की भूमिका इसमें सहयोगी की ही रही थी। अब बड़ी संख्या में पुरुष भी यह पर्व मनाने लगे हैं। सूर्य की जीवनदायिनी शक्ति के प्रति कृतज्ञता-ज्ञापन का यह विराट पर्व अब सिर्फ कृषकों तक ही सीमित नहीं रह गया है। इसे समाज के सभी वर्गों ने समान रूप से अपना लिया है। यह पर्व अब लगभग पूरे भारत में तो मनाया ही जाता है, प्रवासी भारतीयों के साथ-इसका विस्तार विश्व भर में हुआ है। इस पर्व के स्वरुप में हाल के दिनों में कुछ बदलाव भी आए हैं। इस पर्व नदियों और तालाबों के तट पर ही सूर्य को अर्घ्य देने का विधान है जहां गांव या शहर के लोग एक साथ एकत्र होते थे। इससे लोगों में सामुदायिकता और सहयोग की भावना मजबूत होती थी। अब बड़ी संख्या में लोग अपने घरों के परिसर में या छतों पर छोटे-बड़े गड्ढे बनाकर सिर्फ अपने परिवार के साथ छठ मनाने लगे हैं। पूंजीवादी संस्कृति के प्रसार के साथ हमारे वैयक्तिक, आत्मकेंद्रित और अकेले होते जाने का एक दुष्परिणाम यह भी है। 

छठ सूर्य के प्रति कृतज्ञता-ज्ञापन तथा समाज में नदियों-तालाबों और कृषि के महत्व को रेखांकित करने की सदियों पुरानी परंपरा है। आज के जटिल होते समय में ऐसी सीधी-सरल परंपराओं की जरूरत पहले से ज्यादा बढ़ गई है। यह परंपरा गांवों से कटी और आधुनिकता की अंधी दौड़ में शामिल हमारी नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से परिचित कराने की कोशिश भी है। यह खूबसूरत परंपरा अंधविश्वास भी नहीं है और इसीलिए यह अनंत काल तक संजोने लायक है।

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