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"लीडरशिप क्वालिटी" थी इंदिरा गांधी में,जो ठान लिया किसी हद तक जाकर पूरा करती थीं इंदिरा

Bhola Tiwari Nov 01, 2019, 5:57 PM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

27 मई 1964 का वो मनहूस दिन,देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू सभी देशवासियों को रूलाकर अनंत में विलीन हो गए।कांग्रेस पार्टी ने लालबहादुर शास्त्री को प्रधानमंत्री बनाया,यद्यपि मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री पद के स्वभाविक उम्मीदवार थे और बहुत से वरिष्ठ नेताओं ने उनका समर्थन भी किया मगर मोरारजी देसाई ने दोस्त से अधिक दुश्मन बनाए थे।मोरारजी देसाई पर सर्वसम्मति से फैसला न हो सका और फिर लालबहादुर शास्त्री का चुनाव किया गया।इंदिरा गांधी ने शास्त्रीजी के मंत्रीमंडल में सूचना एंव प्रसारण मंत्री का कामकाज संभाला।

लालबहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री बनीं मगर उनका बहुत विरोध था।कांग्रेस के अंदर हीं सिंडिकेट इंदिरा गांधी का विरोध कर रहा था तो समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया कांग्रेस की सत्ता को उखाड़ फेंकने का आह्वान कर रहे थे।दरअसल सिंडिकेट रूपये के अवमूल्यन के फैसले को लेकर इंदिरा गांधी से बेहद नाराज था।इंदिरा गांधी ने 06 जून 1966 को रूपये का अवमूल्यन का आदेश जारी किया था।के.कामराज जो सिंडिकेट के नेता थे उन्होंने कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में रूपये का अवमूल्यन वाला आदेश वापस लेने पर दवाब डाला मगर दृढसंकल्पित इंदिरा ने आदेश वापस लेने से इंकार कर दिया।आम चुनाव सर पे था और इंदिरा गांधी ने खूब मेहनत की और उन्होंने फिर से सरकार बना लिया।

इंदिरा गांधी अंदर से कितनी मजबूत थीं ये 1966 में देखने को मिला जब नागा साधुओं ने त्रिशूल लहराते हुए गोहत्या पर तत्काल रोक लगाने की मांग को लेकर संसद में घुसने की कोशिश की।तत्कालीन गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा हिंदू धर्म के कट्टर समर्थक थे और वे गोरक्षा के प्रति प्रतिबद्ध भी थे,वे नागा साधुओं की भीड को रोकने में नाकाम रहे तब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सेना को बुला लिया और स्वविवेक से मामले को हैंडल करने की इजाजत दी।लाख कोशिशों के बावजूद नागा साधू संसद भवन में घुसकर उत्पाद करने लगे फिर सेना ने फायरिंग शुरू कर दी।पाँच या सात नागा साधुओं की मौत पुलिस फायरिंग में हो गई मगर स्थिति को काबू में कर लिया गया।आजादी के बाद पहली बार सेना सडक पर उतरी थी।

इंदिरा गांधी किसी भी नीति को लेकर कितनी दृढता से खडी रहती थी ये 1969 में 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण को लेकर देखने को मिला।कांग्रेस पार्टी में सिंडिकेट और इंडिकेट दो गुट बन गए थे।सिंडिकेट ग्रुप की अगवाई के.कामराज कर रहे थे तो इंडिकेट ग्रुप को इंदिरा गांधी लीड कर रहीं थीं।सिंडिकेट बैंकों का राष्ट्रीयकरण नहीं चाहता था, इस वजह से उसने इंदिरा गांधी का खूब विरोध किया।उस समय मोरारजी देसाई वित्त मंत्री थे और बेहद ताकतवर थे।मोरारजी देसाई बैंकों के राष्ट्रीयकरण की खुली खिलाफत कर रहे थे,एकदिन इंदिरा गांधी ने उन्हें वित्तमंत्री के पद से एकाएक हटाकर अर्श से फर्श पर ला दिया।19 जुलाई 1969 को अध्यादेश पारित कर 14 बैंकों का स्वामित्व राज्य के हवाले कर दिया।उस समय इन बैंकों के पास देश का 70% जमापूंजी थी।

बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद सिंडिकेट पूरी तरह बेअसर हो गया था।

23 जून 1967 में इंदिरा गांधी ने प्रिवीपर्स समाप्त करने की घोषणा कर दी और 1970 में संविधान में चौबीसवाँ संशोधन कर लोकसभा से पारित करा दिया मगर राज्यसभा में यह प्रस्ताव गिर गया तब इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति वीवी गिरी से सारे राजे महाराजाओं की मान्यता समाप्त करने को कहा।राष्ट्रपति ने तत्काल इनकी मान्यता समाप्त कर उन्हें आम इंसान बना दिया।दरअसल इंदिरा गांधी इनसे इसलिए नाराज थीं कि इन्होंने सी.राजगोपालाचारी के नेतृत्व में स्वत्रंत पार्टी का गठन कर लिया था और इस पार्टी में कांग्रेस के बहुत से बागी उम्मीदवार थे जो उन्हें नुकसान पहुंचा रहे थे।हर राजा महाराजाओं को अपनी रियासत का भारत में एकीकरण करने के एवज में उनको सालाना राजस्व की 8.5% राशि भारत सरकार द्वारा हर साल देना बाँध दिया गया था।जब इंदिरा गांधी ने प्रिवीपर्स समाप्त करने की घोषणा की तो सभी रजवाड़े उनके खिलाफ हो गए मगर आयरन लेडी कहाँ झूकने वाली थी।

बांग्लादेश के उदय में भी इंदिरा गांधी की महत्वपूर्ण भूमिका थी।पाकिस्तान के हुक्मरान पूर्वी पाकिस्तान की जनता पर तरह तरह के अत्याचार करते थे।इंदिरा गांधी ने उनकी भावनाओं को समझा और वहाँ सेना भेजकर बांग्लादेश राष्ट्र का उदय करवाया था।इंदिरा गांधी का नाम आज भी बांग्लादेश में बडी इज्जत के साथ लिया जाता है।

अनेकों अच्छाईयां होने के बावजूद इमेरजैंसी उनके दामन पर लगा वो दाग है जिसे आज भी कांग्रेस धुल नहीं पाई है।

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