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और.. उल्लू बना अपना !

Bhola Tiwari Oct 27, 2019, 10:12 AM IST टॉप न्यूज़
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भूपेश पंत

नई दिल्ली :  इसी तरह वो भी दीवाली की एक रात थी। बच्चों के साथ मुहल्ले में ग्रीन पटाखे जला कर पर्यावरण को नुकसान न पहुंचाने की शांति से मन ओत प्रोत था। ज्यादातर पटाखे बच्चों ने मुँह से अजीब अजीब आवाज़ निकाल कर फोड़े। जिस बच्चे ने जितनी अच्छी आवाज़ का प्रदर्शन किया उसे मैंने मन ही मन पुलिस अधिकारी या नेता बनने का आशीर्वाद दिया और घर आ गया। 

घर के चारों ओर रोशनी उतनी ही थी जितनी जेब के लिये मुनासिब थी। लिहाज़ा मालाओं से ज्यादा दीयों और मोमबत्ती की रोशनी पर भरोसा किया गया था। बीबी सज संवर कर तरह तरह के पकवान और फल सजाये लक्ष्मी माता की तस्वीर के आगे बैठी थी। उसे बताया गया था कि पैसा ही पैसे को खींचता है इसलिये खून पसीने की सारी कमाई एक छोटी सी पोटली की शक्ल में सामने धरी थी। चंचल लक्ष्मी को साधने की उसकी इस मासूम सी कोशिश को माता के पांव के पास बैठे उलूक राज घूर रहे थे। बीबी की इस निस्वार्थ पूजा को देख कर मुझे अच्छे दिनों की तरह ही ये यकीन होने लगा था कि आज माता लक्ष्मी मुझ आम इंसान के घर पर जरूर पधारेंगी। 

दिमाग़ में अचानक घुस आये इस वहम पर भरोसा करके मैंने घर की खिड़की खोल दी। ठंडी हवा भीतर तक काटने लगी पर सोचा क्या पता माता लक्ष्मी रात के बारह बजे दरवाज़ा खटखटाने में संकोच करें। मैंने रजाई उठा कर खिड़की के पास पड़े तख्त पर ही उनका इंतज़ार करने का फैसला किया। मेरी आँख कभी खिड़की पर जाती और कभी दीवार घड़ी पर। ये सिलसिला शायद बारह बजने से एक दो मिनट पहले तक चलता रहा। मेरे कान अच्छे दिनों की आहट सुनने को बेताब थे और मन जुमलों से खेल रहा था। 

अचानक खिड़की पर किसी पक्षी के पंख फड़फड़ाने जैसी आहट हुई। मुझे एकबारगी लगा कि कहीं कोई चोर तो नहीं लेकिन जब मैंने अपने सामने रोशनी के एक पुंज को माता लक्ष्मी के वाहन उल्लू में बदलते देखा तो मेरी हैरानी की सीमा ही नहीं रही। उलूक शिरोमणि को साक्षात सामने देख कर मन भाव विभोर होने ही वाला था कि मेरे दिमाग़ ने उसे पॉज कर दिया। अरे ये तो सिर्फ गाड़ी है इसका मालिक कहां है। मतलब लक्ष्मी माता इनके ऊपर बैठी क्यों नहीं हैं ये तो पूछ। 

मैंने उल्लुओं के ह्रदय सम्राट को सादर प्रणाम कर पूछा कि अच्छे दिनों की तरह माता लक्ष्मी भी आपके ऊपर से अंतर्धान क्यों हो गयीं। आपके होते हुए कहीं वो पैदल तो नहीं हो गयीं। उल्लू महाराज ने अपनी चिर परिचित घुर्रन आंखों में वात्सल्य लाने की नाकाम कोशिश करते हुए चोंच खोली। वत्स मैं तो स्वभाव से फकीर हूँ और मुझमें लक्ष्मी को लेकर कोई अनुराग या विराग नहीं है। माता मेरी सवारी करें या न करें पर उन्हें उनकी मंजिल तक मैं ही पहुंचाता हूँ। ये कह कर उल्लू शिरोमणि ने गर्व से अपनी गर्दन तीन सौ साठ डिग्री घुमा दी। उनके पास दिखाने को शायद यही एक डिग्री थी। 

मैंने पूछा, महाराज निश्चित तौर पर आपने जब उड़ान भरी होगी तो माता लक्ष्मी आपके ऊपर ही सवार रही होंगी। लेकिन अब वो वहां नहीं हैं। इसलिये कृपा करके अपनी उड़ान के बाद का पूरा वृत्तांत सुनाने की कृपा करें। 

उलूक महाराज अपनी वाह वाह करने की मुद्रा से बाहर निकले और बोले, वत्स माता लक्ष्मी के कई प्रतिरूप इस वक्त उस जगमगाहट का हिस्सा बन चुके हैं जहां के लिये वो बने थे। 

मैंने कहा, अरे वो माता हैं कोई एनपीए नहीं कि उन्हें किसी के लिये बनाया गया हो। लगता है उन्हें मार्ग से भटकाने में आपका ही हाथ है।

उलूक महाराज ने पहले अपनी प्रकृति प्रदत्त कर्कश आवाज से मुझे मित्रवत संबोधित किया फिर बोले, तुम्हें मालूम है कि माता लक्ष्मी को लोग रोशनी में नहीं रखते इसलिये वो जब भी जगमगाहट देखती हैं उसी में खोकर रह जाती हैं। वैसे जगमगाहट तो तुम्हारे यहां भी है लेकिन कई कोने अभी भी अंधेरे में हैं। और मुझे ये अंधेरे पसंद हैं। मैं अगर माता को तुम्हारे घर में प्रेम, भाईचारा, आपसी विश्वास और ईमानदारी के दीयों की जगमगाहट दिखा देता तो वो यहीं रुक जाती। फिर वो यहां पर अशिक्षा, अज्ञानता, बीमारी, लाचारी, भुखमरी और पिछड़ेपन के अंधेरे कोनों को भी रहने नहीं देतीं। इसलिये मैंने अपनी उड़ान का वही रास्ता चुना जो बड़ी बड़ी आलीशान इमारतों से होकर जाता है। ताकि वहां की शानोशौकत माता लक्ष्मी को वहां ठहरने पर मजबूर कर दे। 

तो क्या माता लक्ष्मी मेरे भाग्य में नहीं, मैं बोल पड़ा।

उलूक राज ने गंभीर होते हुए कहा, देखो वत्स। एक गोपनीय बात बताता हूँ। अव्वल तो इसे किसी से कहना नहीं क्योंकि लोगों में इतनी समझ भी नहीं। फिर भी जरूरी हुआ तो मुझे क्रेडिट देना मत भूलना। बुद्धिमान लोगों को अति बुद्धिमान नेतृत्व मिलता है जबकि मूर्खों को महामूर्ख नेतृत्व मिलता है। तुम्हारे भाग्य में जो तुमने लिखा वही तुमको मिला है, यानी मैं। माता लक्ष्मी को भूल जाओ और वही करो जो एक उल्लू के राज में तुम्हें करना चाहिए।

इतना कह कर उल्लू शिरोमणि एक बार फिर उड़ गये। मैंने पाया कि बीबी इस दीवाली की मेहनत भी बेकार जाने पर फिर से मुझे कोसने लगी थी और मैं हर बार की तरह फिर से उसे काठ के उल्लू की तरह देख रहा था। पार्श्व में कहीं कोई माता गा रही थी।

मैं क्या करूं राम मुझे उल्लू मिल गया...!

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