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अप्प दीपो भवः !!

Bhola Tiwari Oct 27, 2019, 9:27 AM IST टॉप न्यूज़
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 नीरज कृष्ण

दीपावली भारत का राष्ट्रिय पर्व है, इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं और ना ही कोई विवाद। चाहे हिन्दू धर्मावलम्बी हों, चाहे जैन-धर्म का अनुयायी हों और चाहे आर्य-समाज का सदस्य हों, चाहे वे उत्तर भारत में बसने वाले भारतीय हों या फिर दक्षिण-भारतीय हों, चाहे साधारण गृहस्त, चाहे लक्ष्मी के उपासक हों या फिर काली के उपासक, सभी भारतीय किसी-न किसी रूप में दीपावली को बड़े उत्साह और उमंग के साथ मनाते हैं। दीपों, आधुनिक बल्बों की कतार से घर-आँगन-द्वार, खिड़कियाँ, मार्ग-सड़कें, अट्टालिकाएँ तथा भवन सभी सुशोभित हो जाते हैं और दीपावली के इस पवित्र अवसर पर बच्चों में ही नहीं बल्कि युवा, प्रौढ़-सभी में नये वस्त्र पहनने की, अच्छे पकवान खाने की उमंग और चाह बनी रहती है। कोई लक्ष्मी का आह्वान कर समृद्धि और धन की प्रार्थना करता है तो कोई महाकाली का आशीर्वाद प्राप्त कर शक्ति की पूजा-अर्चना करता है। 

दीपावली का अर्थ है ‘दीये’ को जलाना अर्थात् रोशनी करना और अन्धकार को भगाना। बाह्य दृष्टि से तो रोशनी आध्यात्मिक सिद्धान्त का एक प्रतीक है, लेकिन असली उत्सव, असली कार्य है मन के अन्धकार को भगाना। यही दीया हमारे जीवन में रोशनी के अलावा हमारे लिए जीवन की सीख भी है, जीवन निर्वाह का साधन भी है। इस अवसर पर मिट्टी के दीये में ज्योति जलाना इस बात का प्रतीक है कि मिट्टी के दीये में अमृत ज्योति संभाली जा सकती है। क्योंकि मिट्टी पृथ्वी की और ज्योति प्रकाश का प्रतीक है। दीपक जहाँ ज्ञान और प्रकाश का प्रतीक है, वही वह त्याग, बलिदान, साधना और उपासना का भी प्रतीक है। यही नहीं वह तप और त्याग की महत्ता का परिचायक भी है। यह हमारी संस्कृति का मंगल प्रतीक है जो अमावस्या के घनघोर अंधकार में असत्य से सत्य और अंधेरे से प्रकाश की ओर जाने का मार्ग प्रशस्त करता है।

दीपावली का न केवल धार्मिक- दृष्टि से बल्कि आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, भौतिक-दृष्टि से भी विशेष महत्व है। भगवान महावीर का निर्वाण दिवस दीपावली, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का आसुरी शक्तियों पर विजय के पश्चात अयोध्या आगमन का ज्योति दिवस दीपावली, तंत्रोपासना एवं शक्ति की आराधक मां काली की उपासना का पर्व- दीपावली, धन की देवी महालक्ष्मी को आराधना का पर्व- दीपावली, ऋद्धि-सिद्धि, श्री और समृद्धि का पर्व- दीपावली, ज्योति से ज्योति जलाने का पर्व- दीपावली। यह पर्व हमारी सभ्यता और संस्कृति की गौरव-गाथा है। 

  अंधकार से घिरा हुआ आदमी दिशाहीन होकर चाहे जितनी गति करे, सार्थक नहीं हुआ करती। आचरण से पहले ज्ञान को, चरित्र पालन से पूर्व सभ्यकत्व को आवश्यक माना गया है। ज्ञान जीवन में प्रकाश करने वाला होता है। अंधकार हमारे अज्ञान का, दुराचरण का, दुष्ट प्रव्रीतियों का, आलस्य और प्रमाद का, बैर और विनाश का, क्रोध और कुंठा का, राग और द्वेष का, हिंसा और कदाग्रह का अर्थात अंधकार हमारी राक्षसी मनोवति का प्रतीक है।

जब मनुष्य के भीतर असद् प्रवृत्ति का जन्म होता है, तब चारों ओर वातावरण में कालिमा व्याप्त हो जाती है। अंधकार ही अंधकार नजर आने लगता है। मनुष्यता हाहाकार करने लगती है। मानवता चीत्कार उठती है। अंधकार में भटके मानव का क्रंदन सुनकर करुणा की देवी का हृदय पिघल जाता है। ऐसे समय में मनुष्य को सन्मार्ग दिखा सके, ऐसा प्रकाश स्तंभ चाहिए। इन स्थितियों में हर मानव का यही स्वर होता है कि - ' प्रभु, हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। बुराइयों से अच्छाइयों की ओर ले चलो। मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो . . . . ' इस प्रकार हम प्रकाश के प्रति, सदाचार के प्रति, अमरत्व के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त करते हए आदर्श जीवन जीने का संकल्प करते हैं। 

यह तभी सम्भव है, जब दीपावली के शुभ संदेश अर्थात् रोशनी से अमावस्या के काले अँधियारे को भगाने या आत्मबोध के ज्ञान द्वारा काम-क्रोध-मोह, लोभ-दम्भ आदि विकारों को एवं दूर करने की प्रवृत्ति को हम जीवन में ढालें। हदय में वास्तविक प्रेम रखना चाहिये तथा द्वेष के स्थान पर मैत्री-भाव और सभी के साथ समुचित भाव रखना चाहिये। जैसे-आर्थिक स्थिति में अपने से बड़ों के प्रति मुदित भाव, बराबर वालों के प्रति मैत्री-भाव और अपने से कमजोर स्थिति वाले और अनुजों के प्रति करुणभाव तथा जो व्यक्ति दुष्ट हैं, उनके प्रति घृणा के स्थान पर उपेक्षा भाव रखकर हम अपना जीवन व्यतीत करें तो हमारे हृदय में, द्वेष और ईष्र्या स्थान पर प्यार, प्रेम, करुणा तथा वात्सल्य आदि भाव जगेंगे तथा हमारे मन और हृदय का अन्धकार दूर होकर उसमें वास्तविक जान का दीपक जलेगा।

जब हमारे मन का अन्धकार मिटेगा तो मन के विकारों पर हम विजय प्राप्त कर सकेंगे। उस दिन, अज्ञानरुपी अमावश्या का अंधकार आत्म-ज्ञान के आलोक से मिट जाएगा फिर बाहर के हजारों-लाखों दीप आलोकित होंगे, बाहर के संसार के लिये और हमें निरन्तर आभाष करायेंगें कि उसका असली प्रतिबिम्ब हमारे मन के अंधेरे को सतत मिटाकर उसमें ज्ञान-रूपी दीपक जला रहा है। यही अमावस्या के दिन दीपोत्सव मनाने का या लक्ष्मी-पूजन करने का सही उद्देश्य है।

महर्षि पतंजलि ने अपने योगसूत्रमें ठीक ही कहा है~ 'अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशा: क्लेशा:' अर्थात मानव जीवन के पाँच मुख्य क्लेश हैं अज्ञान, अभिमान, राग, द्वेष और मृत्यु का भय।

दीपावली मनाने की सार्थकता तभी है, जब भीतर का अंधकार दूर हो। अंधकार जीवन की समस्या है और प्रकाश उसका समाधान। जीवन जीने के लिए सहज प्रकाश चाहिए। अंधकार को परास्त करते हुए यह पर्व संदेश देता है कि अंत:करण को शुद्ध एवं पवित्र रखते हुए और अपनी चेतना, अपनी आत्मा में प्रकाश का संचार करते हुए ज्ञान का, धर्म का और कर्म का दीप जलाओ। तब गहन तमस में जो प्रकाश होगा, उससे अंत:करण में आशा, धैर्य और प्रभुभक्ति के संचार के साथ-साथ हर्ष और उल्लास से हृदय पुलकित हो उठेगा, सत्य और न्याय की चहुं दिशाओं में विजय पताका फहराएगी और धन-धान्य, यश-वैभव की अपार संपदाएं आपके लिए अपने द्वार खोल देंगी। 

हमारे भीतर अज्ञान का तमस छाया हुआ है। वह ज्ञान के प्रकाश से ही मिट सकता है। ज्ञान दुनिया का सबसे बड़ा प्रकाश दीप है। जब ज्ञान का दीप जलता है, तब भीतर और बाहर दोनों आलोकित हो जाते है। अंधकार का साम्राज्य स्वत: समाप्त हो जाता है। ज्ञान के प्रकाश की आवश्यकता केवल भीतर के अंधकार मोह-मूर्छा को मिटाने के लिए ही नहीं, अपितु लोभ और आसक्ति के परिणामस्वरूप खड़ी हुई पर्यावरण प्रदूषण और अनैतिकता जैसी बाहरी समस्याओं को सुलझाने के लिए भी जरूरी है। यथार्थ में सूर्य के उत्तराधिकारी दीपक का इस पर्व पर यही प्रमुख संदेश है।

बाहर का आलोक तो अपने स्थान पर रहेगा ही, लेकिन हम मनन करें, ध्यान करें और थोड़ा विचार करें कि किस प्रकार अपने मन के अन्धकार को हम आत्मज्ञान की रोशनी से 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' की भावना के अनुरूप आलोकित कर स्वयं भी आनन्दित हों और दूसरों को भी आनन्दित करें और दीपावली-पर्व को सही अर्थों में सार्थक बनायें।

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