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दीपोत्सव के पांच दिन-रात

Bhola Tiwari Oct 27, 2019, 9:02 AM IST टॉप न्यूज़
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 ध्रुव गुप्त

दीपपर्व दीपावली भारतीय संस्कृति की पांच बड़ी घटनाओं या परंपराओं का पांच-दिवसीय उत्सव है। इसका आरम्भ कार्तिक कृष्णपक्ष की त्रयोदशी या तेरस से होता है। यह वह दिन था जब समुद्र मंथन के दौरान देवों और असुरों ने समुद्र पार के किसी देश में अमृत घट के साथ आयुर्वेद के जन्मदाता धन्वंतरि की खोज की थी। धन्वंतरि देवताओं के चिकित्सक बने और उन्हें भगवान विष्णु का अवतार तक कहा गया। हजारों वर्षों से उनके प्रकट होने वाले दिन को धन्वंतरि त्रयोदशी, धन्वन्तरि जयंती या धनतेरस के रूप में श्रद्धापूर्वक मनाया जाता रहा। शास्त्रों के अनुसार इस दिन संध्या समय यमराज को दीपदान करने से अकाल मृत्यु से सुरक्षा मिलती है। कालांतर में यह पर्व सर्वाधिक विकृतियों का शिकार हुआ। धनतेरस का वर्तमान स्वरुप बाजार और उपभोक्तावाद की देन है जब हमारी धनलिप्सा ने एक महान चिकित्सक को भी धन का देवता बना दिया। हमें यह बाजार ने बताया कि धनतेरस के दिन सोने-चांदी में निवेश करने, विलासिता के महंगे सामान खरीदने या सट्टा-जुआ खेलने से धन तेरह गुना तक बढ़ जा सकता है। हाल के वर्षों में इसमें यह अंधविश्वास भी जुड़ गया कि धनतेरस की रात उल्लुओं की बलि देने से संपति में बेतहाशा वृद्धि हो सकती है। उल्लुओं की लगातार बढ़ती बलि के कारण हमारे देश में पक्षियों की इस प्रजाति के नष्ट होने का खतरा उत्पन्न हो गया है। 


दीवाली के पांच-दिवसीय आयोजन के दूसरे दिन को हम नरक चतुर्दशी या छोटी दीवाली के रूप में मनाते हैं। इस उत्सव की पृष्ठभूमि में यह पौराणिक कथा है कि प्राग्ज्योतिषपुर के शक्तिशाली असुर सम्राट नरकासुर ने देवराज इन्द्र को पराजित करने के बाद देवताओं तथा ऋषियों की सोलह हजार से ज्यादा कन्याओं का अपहरण कर उन्हें अपने रनिवास में रख लिया था। नरकासुर को किसी भी देवता या पुरूष से अजेय होने का वरदान प्राप्त था। कोई स्त्री ही उसे मार सकती थी। उसके आतंक से त्रस्त देवताओं ने अंततः कृष्ण से सहायता की याचना की। देवताओं की दुर्दशा और कृष्ण की चिंता देखकर कृष्ण की एक पत्नी सत्यभामा सामने आई। कृष्ण के रनिवास की वह एकमात्र योद्धा थी जिनके पास कई युद्धों में भाग लेने का अनुभव था। उन्होंने नरकासुर से युद्ध की चुनौती स्वीकार की। कृष्ण को सारथि बनाकर वीरांगना सत्यभामा युद्ध में उतरीं और नरकासुर को पराजित कर उसे मार डाला। नरकासुर के मरने के बाद सभी सोलह हजार स्त्रियों को मुक्त करा लिया गया। सत्यभामा और कृष्ण के द्वारका लौटने के बाद घर-घर दीये जलाकर स्त्रियों की मुक्ति का विराट उत्सव मनाया गया। नरकासुर की इसी कथा से जुड़ा कृष्ण की सोलह हजार से ज्यादा पत्नियों का मिथक भी है। जब कैद से मुक्त सोलह हजार से ज्यादा स्त्रियों को कृष्ण ने उनके घर भेजने का प्रयास किया तो या तो नरकासुर के रनिवास में लंबे समय तक रही इन औरतों को सामाजिक निंदा के भय से उनके घरवालों ने अपनाने से इंकार कर दिया या औरतें स्वयं तिरस्कार के भय से घर लौटने को तैयार नहीं हुईं। कृष्ण ने इन तिरस्कृत, बेसहारा स्त्रियों को सामाजिक सम्मान और सामान्य जीवन दिलाने के लिए उन्हें अपनी पत्नी का दर्जा दिया। स्त्रियों की मुक्ति का वह उत्सव हजारों साल बाद आज भी ज़ारी है, मगर इसका अर्थ और सबक हम भूल चुके हैं। उत्सव के साथ यह दिन हमारे लिए खुद से यह सवाल पूछने का अवसर भी है कि क्या उस घटना के हजारों साल बाद भी स्त्रियों को अपने भीतर मौजूद वासना और पुरूष-अहंकार जैसे नरकासुरों की कैद से मुक्ति दिला पाए हैं हम ?


कार्तिक मास की अमावस्या को मनाई जाने वाली दिवाली देश का अकेला पर्व है जिसकी उत्पति के बारे में भारतीय धर्म-संस्कृति में सबसे ज्यादा मत-भिन्नताएं रही हैं। ज्यादा लोग इस दिन को लंका विजय कर चौदह वर्षों के बनवास के बाद राम की अयोध्या वापसी के उत्सव के रूप में देखते हैं। कुछ लोग इस दिन को महाभारत युद्ध के बाद विजेता पांडवों के कृष्ण के साथ हस्तिनापुर लौटने की घटना का उत्सव मानते हैं। पूर्वी भारत के बंगाल और उड़ीसा की शक्ति-पूजक संस्कृति दिवाली को काली पूजा के रूप में मनाती है। बौद्धों के लिए यह दिन कलिंग युद्ध के रक्तपात से विचलित सम्राट अशोक के बौद्ध धर्म में दीक्षित होने का दिन है। जैन इसे तीर्थंकर महावीर के निर्वाण दिवस के तौर पर देखते हैं। इतनी मान्यताओं के बीच अजीब यह है कि इस दिन राम, कृष्ण, काली, बुद्ध या महावीर की नहीं, परंपरागत रूप से देवी लक्ष्मी और गणेश की पूजा होती रही है। दीवाली की एक प्रमुख कथा देवी लक्ष्मी से भी जुड़ती है। समुंद्र-मंथन में लक्ष्मी के प्रकट होने के बाद उन्हें पाने के लिए देवों और असुरों के बीच संघर्ष हुआ था। आज ही की रात लक्ष्मी ने पति के रूप में विष्णु का वरण किया था। उसी रात की स्मृति में दीये जलाकर देवी लक्ष्मी की दिन पूजा होती है। इस पूजा में उनके साथ विघ्ननाशक गणेश को भी शामिल किया जाता है। व्यवसायी इस दिन देवी लक्ष्मी की आराधना कर अपने नए बही-खातों का श्रीगणेश करते हैं। आज के बाजारवादी समय में इस पर्व का एक बिल्कुल नया रूप ही सामने आया है। अब यह अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का नहीं, अपने वैभव के भोंडे प्रदर्शन, अनियंत्रित आतिशबाजी से पर्यावरण को हानि पहुंचाने, ध्वनि प्रदूषण से बीमारों, बच्चों और छोटे पशु-पक्षियों को आतंकित करने, जुआ-सट्टा खेलने और रात भर मौज-मस्ती करने का अवसर भर है।

दीवाली की अगली सुबह मनाया जाने वाला गोवर्द्धन पूजा, गोधन पूजा या अन्नकूट उत्तर भारत के पशुपालकों का सबसे बड़ा पर्व है। हमारी संस्कृति में सदियों से स्थापित मान्यताओं के विरुद्ध इसे पहला विद्रोह भी माना जाता है। देवराज इन्द्र की निरंकुश सत्ता के प्रतिरोध में इस पर्व की शुरूआत द्वापर युग में कृष्ण ने की थी। पौराणिक कथा के अनुसार एक बार जब अतिवृष्टि से गोकुल और वृंदावन जलमग्न हो गए तो वहां के तमाम निवासियों ने अपनी और अपने पशुधन की रक्षा के लिए वर्षा के देव इंद्र से गुहार की। इन्द्र को प्रसन्न करने के लिए वैदिक अनुष्ठानों का लंबा क्रम भी चला। भरपूर 'हवि' पाने के बावज़ूद भी न इन्द्र मेहरबान हुए और न वर्षा रुकी। जलप्रलय की स्थिति देख कृष्ण ने अहंकारी इंद्र की आराधना और उनको समर्पित तमाम वैदिक अनुष्ठान बंद करा दिए। उस युग के संदर्भ में देखें तो शक्तिशाली इंद्र को उनके गौरव से अपदस्थ कर देना स्थापित सत्ता के विरुद्ध किशोर वय के कृष्ण का बड़ा क्रांतिकारी कदम था। तमाम आशंकाओं के बीच कृष्ण ने गोकुल और वृन्दावन के लोगों को ऊंगली से गोवर्द्धन पर्वत की ओर चलने का संकेत किया। कृष्ण की बात मानकर लोगों ने अपने परिवार, धन-धान्य और पशुओं के साथ गोवर्द्धन पर्वत की शरण लेकर जलप्रलय से अपनी और पशुधन की रक्षा की थी। माना जाता है कि उसी दिन से ऋग्वैदिक ऋचाओं के सबसे शक्तिशाली देवराज इंद्र की पूजा बंद हुई और गोवर्द्धन पर्वत के प्रति कृतज्ञता-ज्ञापन का अनुष्ठान आरम्भ हुआ। इस दिन पशुधन को स्नान कराकर उन्हें रंग लगाया जाता है, उनके गले में नई रस्सी डाली जाती है और गुड़-चावल खिलाया जाता है। गाय के गोबर से घर-आंगन लीपने के बाद प्रतीकात्मक रूप से गोबर से ही गोवर्द्धन पर्वत की आकृति बनाकर उसके प्रति श्रद्धा निवेदित की जाती है।

कार्तिक शुक्ल पक्ष की दूसरी तिथि यम द्वितीया दीपोत्सव के पांच-दिवसीय आयोजन की आखिरी कड़ी है। लोक भाषा में इस दिन को भैया दूज भी कहा जाता है। दीपोत्सव का यह दिन भाई-बहनों के आत्मीय रिश्ते के नाम समर्पित है। जहां रक्षा बंधन या राखी सभी उम्र की बहनों के लिए अपने भाईयों के लिए प्रार्थना का पर्व है, भैया दूज की कल्पना मूलतः विवाहित बहनों की भावनाओं को ध्यान में रखकर की गई है। इस दिन भाई बहनों की ससुराल जाकर उनसे मिलते हैं, उनका आतिथ्य स्वीकार करते हैं और बहनें उनकी लम्बी आयु की प्रार्थना करती हैं। हमारी संस्कृति में किसी भी रीति-रिवाज या रिश्ते को स्थायित्व देने के लिए उसे धर्म और मिथकों से से जोड़ने की परंपरा रही है। यम द्वितीया के लिए भी पुराणों ने एक मार्मिक कथा गढ़ी है। कथा के अनुसार सूर्य के पुत्र और मृत्यु के देवता यमराज का अपनी बहन यमुना से अपार स्नेह था। यमुना के ब्याह के बाद स्थितियां कुछ ऐसी बनीं कि बहुत लम्बे अरसे तक भाई-बहन की भेंट नहीं हो सकी। यमुना भाई को बराबर निवेदन भेजती रही कि वह किसी दिन उसके घर आकर उसका आतिथ्य स्वीकार करे। कार्य की व्यस्तता के कारण यम कभी बहन के लिए समय नहीं निकाल सके। अंततः कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को यम एक बार बहन के घर पहुंच ही गए। यमुना ने दिल खोलकर भाई की सेवा की। उन्हें तिलक लगाने के बाद अपने हाथों का बनाया भोजन कराया। प्रस्थान के समय स्नेह और सत्कार से अभिभूत यम ने बहन से कोई वरदान मांगने को कहा। यमुना ने अपने लिए कुछ नहीं मांगा। उसने दुनिया की तमाम बहनों के लिए यह वर मांग लिया कि आज के दिन जो भाई अपनी बहन की ससुराल जाए और यमुना के जल में या कम से कम या बहन के घर में स्नान कर उसके हाथों से बना भोजन करे, उसे यमलोक का मुंह कभी नहीं देखना पड़े। यम और यमुना की यह पौराणिक कथा काल्पनिक ही सही, लेकिन इस कथा में अंतर्निहित भावनाएं काल्पनिक कतई नहीं है। इस कथा के पीछे हमारे पूर्वजों का उद्देश्य निश्चित रूप से यह रहा होगा कि भैया दूज के बहाने ही सही, भाई साल में कम से कम एक बार अपनी प्रतीक्षारत बहन की ससुराल जाकर उससे जरूर मिलें। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में इस दिन बहनें भाईयों को तिलक लगाने के बाद मिठाई के साथ 'बजरी' अर्थात कच्चे मटर या चने के दानें भी खिलाती हैं। बिना दांतों से कुचले सीधे-सीधे निगल जाने की सख्त हिदायत के साथ। ऐसा करने के पीछे बहनों की मंशा अपने भाईयों को बज्र की तरह मजबूत बनाने की होती है। भाई दूज के दिन विवाहित स्त्रियों द्वारा गोधन कूटने की प्रथा भी है। गोबर की मानव मूर्ति बनाकर स्त्रियां उसे मूसलों से तोड़ती हैं। यमराज और यमुना की पूजा करती हैं। दोपहर तक यह सिलसिला चलता है। संध्या के समय यमराज के नाम से दीप जलाकर घर के बाहर रख दिया जाता है। यदि उस समय आसमान में कोई चील उड़ता दिखाई दे तो माना जाता है कि भाई की लंबी उम्र के लिए बहन की दुआ कुबूल हो गई है। जैसा कि हर पर्व के साथ होता आया है, कालांतर में भैया दूज के साथ भी पूजा-विधि के बहुत सारे कर्मकांड जुड़ गए, लेकिन इन्हें नजरअंदाज करके देखें तो लोक जीवन की सादगी और निश्छलता के प्रतीक इस पर्व की भावनात्मक परंपरा सदियों तक संजोकर रखने लायक है।

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