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मोरारजी देसाई मृदुभाषी होते तो देश के दूसरे प्रधानमंत्री बनते

Bhola Tiwari Oct 26, 2019, 8:14 AM IST टॉप न्यूज़
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 अजय श्रीवास्तव

प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद वरिष्ठ कांग्रेस नेता मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री पद के स्वभाविक उम्मीदवार थे।कांग्रेस पार्टी में उनको चाहने वाले बहुत थे मगर उनके दुश्मन उससे भी ज्यादा।दरअसल देसाई मुँहफट थे और किसी को भी कुछ भी कह देते थे।जिद्दी और हठ के कारण पार्टी के बहुत से वरिष्ठ नेता उन्हें नापसंद करते थे और इस वजह से हीं उन्हें बहुत नुकसान उठाना पडा था।वे वरिष्ठ नेता जयप्रकाश नारायण को "भ्रमित" कहते थे तो इंदिरा गांधी को "लिटिल गर्ल", के.कामराज से उनका छत्तीस का आँकडा जगजाहिर था।

पार्टी की एक सशक्त लाँबी लालबहादुर शास्त्री को प्रधानमंत्री बनाना चाहती थी मगर मोरारजी देसाई को हमेशा लगता था कि उनकी काबिलियत के बावजूद उन्हें प्रधानमंत्री नहीं बनाया जा रहा है।वे शास्त्रीजी के खिलाफ मैदान में थे मगर सफलता शास्त्रीजी के हाथ लगी और वे मन मसोस कर रह गए।

लालबहादुर शास्त्री के निधन के बाद भी उन्होंने प्रधानमंत्री पद पर अपनी उम्मीदवारी जताई थी मगर पार्टी ने इंदिरा गांधी का चुनाव किया।

तीसरी बार उन्होंने 1967 में अपनी दावेदारी पेश की जब इंदिरा गांधी के नेतृत्व में आम चुनाव हुआ था और अपेक्षित परिणाम नहीं मिले थे।कांग्रेस को 520 सीटों में से 283 पर विजय हासिल हुई थी।पिछले चुनाव से 78 सीटें कम मिली थीं, साथ हीं पार्टी को आठ राज्यों में बहुमत नहीं मिला था।इंदिरा गांधी की काफी आलोचना हो रही थी तभी मोरारजी देसाई ने पार्टी फोरम में प्रधानमंत्री पद की दावेदारी पेश कर दी।सिंडिकेट नेता के.कामराज ने बडी मानमनौव्वल और मशक्कत के बाद मोरारजी देसाई को मनाया।मोरारजी देसाई को उप प्रधानमंत्री और केंद्रीय वित्त मंत्री बनाया गया।

इंदिरा गांधी सिंडिकेट से बेहद परेशान थीं,सिंडिकेट उनके हर फैसले पर अंगुली उठा रही थी।तब उन्होंने आरपार करने का फैसला कर लिया था।बैंकों के राष्ट्रीयकरण के फैसले ने उन्हें काफी मजबूत कर दिया था।

इसी बीच तत्कालीन राष्ट्रपति डाँक्टर जाकिर हुसैन का निधन हो गया।वीवी गिरी को कार्यवाहक राष्ट्रपति नियुक्त किया गया मगर सिंडिकेट नीलम संजीव रेड्डी को राष्ट्रपति बनाना चाहती थी और इंदिरा गांधी वीवी गिरी को।नीलम संजीव रेड्डी आंध्रप्रदेश के बडे नेता थे और लोकसभा के स्पीकर थे।वीवी गिरी को समर्थन मिलता न देखकर इंदिरा गांधी ने जगजीवन राम को उम्मीदवार बनाया मगर जब वोटिंग हुई तो जगजीवन राम को केवल तीन वोट मिले थे और फैसला नीलम संजीव रेड्डी के पक्ष में आया।रेड्डी कांग्रेस के उम्मीदवार बने और वीवी गिरी स्वत्रंत उम्मीदवार के रूप में चुनाव में उतरे।वीवी गिरी विपक्ष की मदद से जीत गए और वे राष्ट्रपति बनें।

बताते हैं कि इस वाकये ने इंदिरा गांधी का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँचा दिया।उन्होंने फौरन अपने प्रतिद्वंद्वी मोरारजी देसाई से वित्तमंत्रालय वापस ले लिया मगर उन्हें उप प्रधानमंत्री बरकरार रखा।उन्होंने मोरारजी देसाई पर ये आरोप लगाया था कि वे बैंकों के राष्ट्रीयकरण के खिलाफ हैं।

इसके बाद हीं कांग्रेस दो हिस्सों में बंट गई, एक का नेतृत्व इंदिरा गांधी ने किया तो दूसरे का नेतृत्व सिंडिकेट ने,जिसके अध्यक्ष के.कामराज थे।सिंडिकेट ग्रुप में हीं मोरारजी देसाई थे।

साल 1975 में मोरारजी देसाई ने जनता पार्टी ज्वाइन की और 1977 में वे देश के चौथे प्रधानमंत्री बने।कहा जाता है कि वे अगर मृदुभाषी होते तो शायद वे देश के दूसरे प्रधानमंत्री होते।

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